तो बस के खुलने के इंतज़ार में, मेरा ध्यान इन घुमंतू
रेहड़ीवालों की मार्केटिंग ‘स्किल’ पर केन्द्रित हो गया। यकीन मानिए इनका ‘मार्केटिंग स्किल’ ‘मार्केटिंग मैनेजमेंट’ के गुरुओं के लिए भी सबक है! सबसे पहले एक ‘झाल-मूड़ी’ वाले का पदार्पण हुआ। ‘झाल-मूड़ी’ सा ही उसका स्वर भी तीखा था- ‘मेरा मूड़ी बना है झाला, जिसको खाये साहब आला, खाके याद आवे खाला, खाले मूड़ी मेरा झाला’ –फिल्म ‘क्रांति’ के लोकप्रिय गीत ‘चनाजोर गरम’ की तर्ज़ पर ‘झाल-मूड़ी’ का बखान करता वो पत्ते के दौने
में ‘झाल-मूड़ी’ देता बस की अंतिम सीट तक चला
गया और फिर लौटते हुए पैसे वसूलता हुआ उतर गया। आधे फांक नींबू में ही उसने कम से
कम दस पुड़िया ‘झाल-मूड़ी’ बेच डाला। जाने उस आधे फांक नींबू का क्या प्रताप था
कि इन दसों पुड़ियों में रस निचुड़ता चला गया किन्तु फिर भी वो नहीं सूखा। सीमित
संसाधनों का इससे बेहतर इस्तेमाल ‘मार्केटिंग मैनेजमेंट’ के किसी भी क्लास में नहीं सिखाया जाता होगा। इतना
रसदार नींबू हमने अपनी जीवन में पहली बार देखा।
अब खीरा और ककड़ी वाले का नंबर था
‘आ गया भैया! गर्मी का हीरा, मेरा मीठा खीरा! जो ले उसका भी भला
जो न ले उसका भी भला। खीरा खाओ भैया सेहत बनाओ सैयां’!
‘ए भाई तितुवा तो नहीं निकलगेगा’?-एक प्रश्न।
‘निकलेगा तो हम यहीं है। बदल
देंगें’। ‘कस्टमर सेटिसफेकसन’ का उत्कृष्ट उदाहरण जहां वारंटी नहीं गारंटी का
आश्वासन था।
सत्तू बेचने वाला अलग ही आवाज़
लगा रहा था –‘पी लो भाई पी लो! पी लो सतुवा पी लो! भैया, ‘लू’ के बयार है, सतुवा के बहार है, जे न पिये सतुआ। से न पहुंचे घरवा!’ यानि सत्तू का घोल पी कर चलिये और
लू के इस मौसम में सुरक्षित घर पहुंचिए। थोड़ी ही देर में वह सत्तू के इतने ‘औषधीय’ गुण का बखान कर गया कि बाबा
रामदेव भी दातों तले उंगली दबा लें। आपको आपके स्वास्थ्य के बारे में चेता कर ही तो
करोड़ों का साम्राज्य खड़ा हुआ है। यह सतुवा वाला भी तो यही भय दिखाकर सतुआ बेच रहा है।
तभी सतुवा का बाप यानि चनावाला चने
बेचने आ गया। सस्वर चना का गुण-गान करने लग गया
‘यही रहिला की पूरी कचौरी, यही रहिला की दाल।
यही रहिला के खाई खिरौरा, खूब मोटेहें गाल’।
चने की तारीफ में ग्रामीण यात्री
ऐसे चमत्कृत हुए जैसे कभी शहँशाह शाहजहाँ हुआ था। इसकी भी उतनी ही बिक्री हुई जितनी
‘झाल-मूड़ी’ वाले की हुई थी।
चाय बेचने वाला तो बिलकुल ही
निराला था ‘ आ गया आ गया! दुनिया का सबसे बेकार चाय आ गया! पीजिए और पीने के बाद पैसे
दीजिये’!- अनायास ‘नेगेटिव मार्केटिंग’ में ओनिडा टेलिविजन कंपनी का प्रचार याद हो आया
जिसमें एक सिंघों वाला दानव ओनिडा टेलिविजन की तारीफ करता हुआ कहता था -‘ओनर्स प्राईड नेबर्स एनवी’। करोड़ों खर्च कर जिस ‘मार्केटिंग स्ट्रेटजी’ को ओनिडा ने अपनाया उसका नायाब
उदाहरण यहाँ बिना मोल चुकाए देखने को मिला।
गया-पटना रेलखंड पर भी एक चायवाले को इसी तरह बोली लगाते सुना करता था-‘आ गया आ गया-
गया का ‘राम-पियारी' चाय आ गया’। जिसने भी गया का वो प्रसिद्ध ‘राम-पियारी’ चाय पी होगी ताउम्र उसका स्वाद
उसके तालु में बैठा रहेगा। खूब औंट कर जलाए हुए दूध में बिना पानी मिलाये ‘राम-पियारी’ चाय बनती है। जब औसतन चाय 2-3
रुपये की आती थी ‘राम-पियारी’ सात रुपये के कुल्हड़ में आती थी। एक बार पीए तो बार-बार
पीने की इच्छा होगी। ‘सस्ता रोये बार-बार महंगा रोये एक बार’- क्वालिटी प्रॉडक्ट बेचने वाले
प्रायः इस कहावत की ओर ध्यान दिलाते हैं जो गया-पटना रैलखंड पर ‘राम-पियारी’ चायवाले को बिना किसी मैनेजमेंट
के स्कूल में दाखिला लिए पता था।
इसके बाद पत्रिका बेचने वाले का
नंबर आया।
‘ए भईयवा! बचवा के पढे खातीर
जरनैल नोलेज का किताब लेते जावा – दो सौ से अधिक सवाल उत्तर सहित’। और सवाल भी कैसे-कैसे? ‘किस नेता का कोट इंग्लैंड से धुलकर और आइरन होकर आता
था? किस देश में सूर्यास्त नहीं होता? दुनिया में वह कौन सा देश है
जहां मच्छर नहीं होता?’
उसके तीसरे सवाल ने मेरा ध्यान
आकर्षित किया। मैंने उस किताब वाले से उसका उत्तर पूछा तो उसने बताया था ‘फ़्रांस’ – यह सही था अथवा गलत मालूम
नहीं किन्तु उस समय यह अवश्य सोचने पर मजबूर हुआ था कि क्या गजब का देश है जहां एक
भी मच्छर नहीं। आज जब इन देशों को ‘चाइनिज वाइरस कोरोना’ से लड़ने के लिए भारत से मलेरिया मच्छर के काटे की दवा
‘हाईड्रोक्सी क्लोरोकूईनिन’ के लिए मदद की गुहार लगाते देखता
हूँ तो मच्छर न होने की निरर्थकता समझ में आई।
बस रांची के खादगढ़ा बस अड्डे से
खुल चुकी थी।




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