Saturday, 30 May 2020

जीवन के रंग- अपनों के संग- बर्फ के गोले बनाम आइसक्रीम पार्लर (30/05/2020)


गर्मी की अलसायी दोपहरी में बाहर सड़क पर 'फटाक' की आवाज़ से हमें पता चल जाता था कि आइस-क्रीम वाला फेरी लगाने के क्रम में उधर से गुज़र रहा है। दरअसल उन दिनों उस क़स्बे में दो ही कंपनियां थी जो गर्मियों में आइस-क्रीम या यों कहें बर्फ के गोलों का व्यापार करती थीं। इन में से एक था 'राजा आइस-क्रीम' और दूसरा 'डीलक्स आइस-क्रीम' डीलक्स आइस-क्रीम की वजह से हम बहुधा आइस-क्रीम को डीलक्स नाम से ही सम्बोधित करते थे। 'डीलक्स खाना है क्या?'- यह सामान्य प्रश्न होता जिसका मतलब था कि क्या आइस-क्रीम खानी है? ये आइस-क्रीम वाले दो पहियों की एक बक्सानुमा ठेले पर आइस-क्रीम बेचते थे। इस बक्से के ढक्कन को ही ये जोर से बजरते थे जिससे 'फटाक' की आवाज़ आती और हम समझ जाते कि आइस-क्रीम वाला फेरी पर है। हम दबे पाँव बाहर निकल आते। हमें पापा के डांट का डर हमेशा बना रहता था तथापि इन बर्फ के गोलों के प्रति लोभ संवरण करना मुश्किल होता। घर के बड़े-बुजुर्ग आइस-क्रीम के नाम पर इन बर्फ के रंगीन गोलों के सख्त खिलाफ थे।


आइस-क्रीम का व्यापार करने वाली इन दोनों कंपनियों में से एक 'राजा आइस-क्रीम' हमारे स्कूल में मेरी ही कक्षा में पढ़ने वाला राजेंद्र सलूजा के पापा का था। हम बच्चों को राजेंद्र सलूजा की किस्मत से बड़ा रश्क होता। उसे आइस-क्रीम खाने के लिए पैसे नहीं लगते थे। और यही एक वजह थी कि कई बच्चों की राजेंद्र सलूजा से अच्छी दोस्ती थी। जब तक अर्ध-वार्षिक परीक्षाओं के बाद स्कूल ग्रीष्मावकाश के लिए बंद नहीं हो जाता था, ये आइस-क्रीम के ठेलेवाले स्कूल के बाहर भी ठेला लगाते थे जिनसे हम लंच-टाइम में आइस-क्रीम खरीद कर खाते थे। कभी-कभार हमारे पास भी पैसे नहीं होते तो ऐसे वक़्त में राजेंद्र सलूजा की मित्रता का लाभ उठाते थे और उधार की आइस-क्रीम खाने में भी संकोच नहीं करते थे। बचपन की मित्रता ऐसे संकोचों और व्यवहारों से ऊपर होती है।

भीषण गर्मी के मौसम में प्रचंड लू की वजह से जब स्कूलों में गर्मी की छुट्टियां घोषित हो जाती थी, ताकि बच्चे लू की वजह से बीमार न पड़ जाएँ, तब भी हम बच्चे मौसम और लू की जरा भी परवाह नहीं करते और भरी दोपहरी में इन आइस-क्रीम वालों के गिर्द जमा हो जाते थे। आइस-क्रीम के ठेले के बक्से पर ही सभी आइस-क्रीम का रेट-चार्ट लगा होता था। पांच पैसे के बर्फ के गोले से लेकर दस पैसे की दूध की आइस-क्रीम, पच्चीस पैसे की ऑरेंज फ्लेवर की आइस-क्रीम, तीस पैसे की कोका कोला फ्लेवर की आइस-क्रीम और पचास पैसे में कपवाली मिल्क आइस-क्रीम- बहुत ज्यादा वैरायटी नहीं होता था इन ठेलों पर। पर हमें इन्हीं सीमित वैरायटी से संतोष करना आ गया था। गरीब और समृद्ध घराने के बच्चे एक ही ठेले पर अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार आइस-क्रीम खरीदते और इनका मजा लेते। कभी-कभी जब हमारे पास पैसे कम पड़ जाते तब हम भी पांच अथवा दस पैसे के आइस-क्रीम से ही संतोष करते और तब अमीरी-गरीबी की दीवार दरक जाती। आज दिल्ली में आइस-क्रीम इन गरीब बच्चों की पहुँच से बाहर हो गया है क्योंकि यहाँ बिकने वाली आइस-क्रीम महंगी होती हैं। कभी-कभी जब सामने की मंदिरों में भंडारा होता है तब न केवल दान देने वाले खीर पूरी और सब्जी वरन फ्रूट-जूस और आइस-क्रीम भी बाँटते हैं। ये ऐसे बिरले दिन होते हैं जब इन मंदिरों में खेल रहे कामवालियों के बच्चों के दिन बन जाते हैं। 




Sunday, 24 May 2020

जीवन के रंग- अपनों के संग- ईद मुबारक! (25/05/2020)


नन्हें नवाब 

आज ईद है। पिछले दिनों फेसबुक पर एक पोस्ट के जरिये जब मेरी बहन ने ईद के अवसर पर पुरानी दिल्ली की तंग-गलियों की ईद के अवसर पर व्याप्त रौनक की तस्वीरें साझा की तो मेरे मन-मस्तिष्क पर उस क़स्बे में मनाये ईद के त्यौहार की यादें एक पार पुनः ताज़ी हो गई।

'रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आयी है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है'

-मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचना 'ईदगाह' की इन्हीं पंक्तियों को पढ़ते हमारा बचपन बीता है। ह्रदय पर इस कहानी और इन पंक्तियों का प्रभाव इसलिए भी अधिक था क्योंकि बचपन में उस क़स्बे में पापा के कई अभिन्न मित्र और मददगार मुस्लिम संप्रदाय से थे जहाँ हम पापा के साथ ईद के अवसर पर जरूर जाते थे- अपने मुस्लिम मित्रों को ईद की मुबारकबाद देने। बचपन में गले मिलकर मुबारकबाद देने का एक तय तरीका ईद के त्यौहार से सीखा।

ईद की ख़ुशी का वर्णन करते हुए मुंशी प्रेमचंद लिखते हैं 'किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईद की खुशी उनके हिस्से की चीज है।'- इसी तर्ज़ पर बचपन में मैंने पापा को हर वर्ष जुमा अलविदा का रोज़ा करते अवश्य देखा है। पूरे साल में ऐसे दो ही अवसर होते थे जब वे उपवास रखते थे- एक शिवरात्रि पर और दूसरा जुमा-अलविदा का रोज़ा। सेहरी तो नहीं करते थे किन्तु इफ्तार में सामुदायिक रूप से भाग लेते थे- नमाज़ी टोपी पहने बिना। कहने का मतलब यह कि जुमा अलविदा का रोज़ा और इफ्तार उनके लिए एक राजनैतिक दिखावा नहीं वरन एक आस्था का विषय था और वे उसी आस्था से जुमा अलविदा का रोज़ा रखते थे जिस आस्था से वे शिवरात्रि के अवसर पर उपवास रखते थे अपने इष्टदेव शिव को प्रसन्न करने के लिए। इन यादों को और कुरेदता हूँ तो पाता हूँ  प्रातः न उठने वाले पापा को प्रत्येक रविवार सुबह चर्च में होनेवाले मास के लिए संत जोसफ स्कूल के हमारे टीचर्स को स्वयं जीप चलाकर चर्च ले जाते हुए। इसी प्रकार इकतीस अक्टूबर चौरासी को इंदिरा गाँधी की निधन के दूसरे दिन उस क़स्बे (झुमरी-तिलैया) की सडकों पर मैंने उन्हें शांति-मार्च करते हुए भी देखा है। उन्हें सबका साथ प्राप्त था क्योंकि मेरा मानना है कि उनपर सबों का विश्वास था। यह साथ और यह विश्वास उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा था उनका जीवन दर्शन था। यह उनकी सहज जीवन शैली थी जो अनायास उनके व्यक्तित्व में समाया था। इसके लिए उन्हें कभी अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ा क्योंकि यही साथ और विश्वास ही उनके व्यक्तित्व का सच था आज की तरह कोई स्वार्थगत मुखौटा नहीं। 'वसुदेव कुटुम्बकम' के यही संस्कारगत बीज उन्होंने बचपन में हमारे कोमल मन-मस्तिष्क में भी बोये जो आज एक विशाल वट-वृक्ष का रूप ले चुका है। यही वजह थी कि जहाँ रामनवमी के अवसर पर महावीरी झंडा के जुलूस का समापन हमारे घर के सामने के मैदान में होता, वहीं मुहर्रम के ताज़िये का जुलूस भी हमारे घर पर प्रदर्शन के बाद ही बगल में संत जोसफ स्कूल के पीछे बने कर्बला पर जाकर तिरोहित होता था। यह स्वीकार करने में आज मुझे जरा भी गुरेज़ नहीं है कि बचपन में पापा द्वारा पढ़ाये 'सेक्युलरिज़्म' के इस व्यवाहरिक पाठ पर मुझे आज भी गर्व है।
मिल के होती थी कभी ईद भी दिवाली भी
अब ये हालात हैं कि डर-डर के गले मिलते हैं।

बहरहाल सियासी सेक्युलरिज़्मको परे रखते हुए हम वापस ईद का त्यौहार मनाने के तौर-तरीको पर आते हैं। यह वह अवसर होता था जब हम पापा के साथ क़स्बे के चंद गणमान्य मुस्लिम घरों में ईद-मुबारक देने जाते थे -हाकिम साहब और रमजान अली शाह कुछ ऐसे ही घर थे। पापा के गया वाले साथी नौशाद अली ईद के अवसर पर कुछ न कुछ सौगात अवश्य भेजते थे। इसी तरह हज़ारीबाग के हाफ़िज़ुर रहमान, जो कुछ समय स्थानीय विधायक भी रहे, के दौलतखाने से भी ईद का न्योता अवश्य आता था। ईद के अवसर पर हम इन घरों में जाते और तमाम लज़ीज़ व्यंजनों का लुत्फ़ उठाते- बिरयानी, केसर पुलाव, कोरमा, गोश्त, कबाब, शीर खुरमा और न जाने क्या-क्या। अंत में मीठी सेवइयां पाते जो हमें विशेष प्रिय थी।

पापा क़स्बे के अपने समस्त मुस्लिम अंसारों (मददगारों) को इस अवसर पर 'ईदी' अवश्य देते - जीप मैकेनिक शीराज़ मिस्त्री, जीप ड्राइवर चिमटू, टिप-टॉप टेलर मास्टर मल्लन मियां, मुर्गी बेचने वाले ज़ीनत मियां, गोश्त बेचने वाले इजराइल मियां और नईम मियां, सब्ज़ी और फल बेचने वाले खटीक बादल मियां, रिक्शा वाला शेख राशिद, बचपन में कितनी ही बार अपने हाथों की करतब से हमारे मोच को ठीक करने वाले शेख दिलावर खान आदि आदि। इतने वर्षों बाद आज के हालातों को देखते हुए कभी-कभी जेहन में ये सवाल उठता है कि क्या यह महज़ इत्तेफ़ाक़ था कि ये सभी शख्स मुस्लिम संप्रदाय से थे। आज मुझे यह इत्तेफ़ाक़ नहीं लगता। सबको साथ लेकर चलना उनका जीवन-दर्शन था जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण था वो छोटा सा क़स्बा जहाँ अपने जीवन-काल में सबको साथ लेकर चलने में वे खासे सफल भी रहे।

ये अपनी यादें मैंने संभाली हैं,
जैसे ईदी हो मेरे बचपन की।

Saturday, 16 May 2020

जीवन के रंग- अपनों के संग: 25: आम की कुछ बातें खास (16/05/2020)

आम का बहार                                                   फोटो सौजन्य: श्वेता मेहता  

मौसम करवट ले चुका है और गर्मी ने दस्तक दे दी है। यह मौसम है फलों के राजा आम का जिसका हमें सदा बेसब्री से इंतज़ार रहा करता था। हममें से ऐसे बहुत कम शरीफ़ रहे होंगें जिसने अपने बचपन में परिवार के नाम और यश को ताख पर रखकर आस-पास के बागान से चोरी कर कच्चे आम नहीं खाये हों। कम से कम मैं तो उन शरीफ़ बच्चों में से तो नहीं ही था। गर्मियों में स्कूल में बारह बजे ही छुट्टी की घंटी बज जाती थी। गांधी स्कूल से घर आते हुए रास्ते में पी.डब्लू.डी. के ऑफिस के पीछे का दीवार पड़ता था जिसके समानान्तर चलते हुए हम बाई-पास के पास मुख्य सड़क पर आते थे। पीछे के इसी दीवार के अंदर एक ओर था इन्सपैक्शन बंग्ला और दूसरी ओर था आम का बागान। बचपन से मैं ही जरा स्थूल शरीर का था किन्तु मेरा छोटा भाई और दो –तीन अन्य मित्र बहुत चपल और चंचल थे। बुट्टन या बूटना कद में था तो छोटा किन्तु था इतना चपल कि जब तक अन्य साथी दीवार फांदने के उपक्रम ही कर रहे होते तब तक वो पी.डब्लू.डी. की सात-आठ फीट ऊंची दीवार फांद जाता और पेड़ पर चढ़ पलक झपकते टीकोले (कच्चे आम) तोड़ कर दीवार की दूसरी ओर फेंकना शुरू कर देता। दीवार की दूसरी ओर मेरा काम इनके फेंके टीकोले चुनने और एक नज़र माली पर भी रखने का था। माली के देखते ही हम रफू-चक्कर हो जाते। वो बूढ़ा माली डंडे लेकर दीवार तक आता और ऊंचे स्वर में हमें भद्दी-भद्दी गालियां देता। हम भी जवाब देने में और उसे चिढ़ाने से नहीं चूकते, ‘बूढ़ा झामलाल पान खाये दाँत लाल, बीड़ी पिये आंत लाल जेनेरेशन नैक्सट क्या यह सोच भी सकती है और बतौर अभिभावक क्या हम अपने बच्चों को ऐसी खुराफात अंजाम देने की छूट दे भी सकते हैं? 

आम को फलों का राजा कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है। एक यही फल है जो इतने नैसर्गिक स्वाद और खुशबू में विधमान हैं कि सबों का स्वाद ले पाना तो शायद एक जन्म में संभव ना हो- मौसम की शुरुआत बिजुवा से होता था। इसकी छोटी गुठली और भरपूर रस इसकी खासियत थी। सैकड़े के हिसाब से यह बेचा जाता था और बिना गिनती के इसे खाया जाता था। बाल्टी में पानी कर इसे उसमें डाल दीजिये ऊपर का रस चुआ कर बाकी रस का आनंद उठाइए। इसके बाद बाज़ार में बंबइया उतरता था जिसका स्वाद एकदम भिन्न हुआ करता था। इसी प्रकार कलकत्ता का हिमसागर, लखनऊ का दशहरी, मालदा का लंगड़ा, दीघा का दूधिया मालदा, सफेदा, सीपिया, गुलाबखास, आम्रपाली, चौसा, तोतापुरी, केसर और कितने ही भिन्न-भिन्न प्रकार के आम-हर एक के रस की मिठास और गूदे का स्वाद एकदम फर्क। अलफाँसो (हाफुस) के बारे में तो केवल सुना ही करते थे।   

इस मौसम में माँ प्रत्येक वर्ष आम का अचार जरूर डालती और उसकी बड़ी हिफाजत करती। ऐसे वैसे हाथों से अचार के बुयाम (बर्नी) को छूना मना रहता था। वर्षों का संचा अचार एकदम ताज़ा बनाए रखती थी। अचार जितना ही पुराना होता वो उतना ही स्वादिष्ट होता जाता। ज्यादा पके आमों का अमावट लगाती थी। इन सभी व्यंजनों का लाभ यह था कि आम का मौसम जाने के बाद भी आम का मजा मिलता रहता था। कच्चे आम का ही गुडम्मा (गुड में कच्चे आम को पका कर तैयार किया गया व्यंजन) बनाती थी। जब दिल नहीं चाहता तो रोटी साथ गुडम्मा खाकर डिनर हो जाता था। दूध रोटी में आम कुच कर खाइये- जैसा द्वारकाधीश को माता यशोदा उनके बचपन में खिलाती थी- ऐसा शाही भोजन कोई दूसरा न होगा।

पड़ोस में प्रिन्सिपल साहब रमाशंकर वाजपेईजी का घर था जिनके यहाँ आम का बागान था। प्रत्येक वर्ष चाची नौकर के मार्फत टोकड़े में करके बागान के रसीले आम हमारे घर अवश्य भिजवाती। महानगरों में ऐसे सम्बन्धों और सुविधाओं के बारे में तो केवल कल्पना ही कर सकते हैं। बाद में पापा ने बड़े शौक से पीछे बागान में बाउंडरी से लगाकर आम के कुछ पेड़ लगाए जिनकी वो खूब तीमारदारी भी करते थे – वो कहा करते थे पेड़ पिछली पीढ़ी लगाती है और उसका फल अगली पीढ़ी पाती है- हर पीढ़ी को अपनी अगली पीढ़ी के लिए कुछ ना कुछ करके ही धरती से रुखसत होना जाना चाहिए- जीवन की यही रीत है- जीवन का यह मूल-मंत्र मैंने उनसे ही सीखा।     

Sunday, 10 May 2020

जीवन के रंग- अपनों के संग- रविवार का दिन यानि हैयर-कट का दिन (10/05/2020)


इस लॉकडाउन के दरम्यान जो समस्या धीरे-धीरे सुरसा की मुंह की भांति बढ़ती जा रही है वो है सिर के बाल। प्रायः महीने का अंतिम रविवार हैयर-कट का होता था। किन्तु महीने के अंतिम सप्ताह में ही यकायक लॉक-डाउन की घोषणा हो गई। अब यह लॉक-डाउन एक महीने से ऊपर होने को आया। इन दो महीने में खरावा-खरावा बढ़ रहे बाल इतने बढ़ गए कि सिर पर अब ये ऐसे दिखते हैं जैसे हरियाणा राज्य में नेवार से लदे ट्रैक्टर-ट्रेलर जिसमे नेवार की मात्रा इतनी अधिक होती है कि ट्रेलर उसी में छिप जाता है। इसी तरह सिर के बालों में चेहरा छिप गया है। मेरा मानना है कि हैयर कटिंग एक कला है और इसे स्टाइल में काटने वाले नाई एक हुनरमंद कलाकार। यदि गाँव-देहात में रहते तो हमारा भी बचपन का बिल्लू जैसा कोई दोस्त घर पर आकर बाल बना जाता, किन्तु महानगरों में यह फैसिलिटी उपलब्ध नहीं है। महानगर में रहने के कुछ लाभ हैं तो कुछेक हानियाँ भी। आज के दौर में महानगरों में बाल बनवाना एक ट्रीट से कम नहीं। महानगरों में सैलून सिर्फ आपके बाल नहीं बनाते वरन आपके व्यक्तित्व का सम्पूर्ण मेकओवर करते हैं, - लो फेड, हाइ फेड, मिड-फेड, क्रू-कट, टेपर, कुईफ़्फ़, स्पाइक्स और कितने ही स्टाइल आज आपको देखने को मिल जाएगें। पुरुष प्रसाधन पर इतने प्रयोग पहले कभी नहीं हुए। महानगरीय जीवन जितना पेचीदा है उतना ही पेचीदा है यहाँ के हैयर-स्टाइल। अब तो यह रोग गाँव-देहात तक फैल गया है। अब वहाँ भी ब्रिक सैलून देखने को नहीं मिलते। ईंट पर बिठाकर, आईना ग्राहक के ही हाथ में दे, हजामत बनवाने का चलन अब नहीं रहा। अब कोई फिल्मों के सुपर स्टार के हैयर स्टाइल पर अपना हैयर सेट करवाना नहीं पसंद करता है, जो कि पहले बड़ी आम बात थी। 

बचपन में हैयर-कट एक समय नष्ट करनेवाला काम जान पड़ता था। दस-पंद्रह मिनट तक स्थिर बैठे रहना काफी कष्टप्रद होता था- किसी सजा से कम नहीं। अतः बाल न बनवाने के कई बहाने होते थे। किन्तु पापा भी हमें छोड़ने वाले नहीं थे। घर पर सुबह-सवेरे ही नाई चला आता और शुरू हो जाता हम तीनों भाइयों का हैयर-कट। वो दौर हिप्पियों का था जिनके लंबे-लंबे बाल हुआ करते थे। किन्तु हमें लंबे बाल रखने की इजाजत नहीं थी। नाई का बड़ा मान-मन्नौवल करते कि हमारे लूक को वो खराब न करे। पर वो भी परले दर्जे का ही दुष्ट था। ऐसा कटोरी कट बाल बनाता कि अगले एक सप्ताह तक चेहरा फूटबाल की तरह गोल-मटोल दिखता। आज के दौर में तो वो पारंपरिक नाई भी लुप्त होता जा रहा है। मुझे याद है बचपन में जब कभी घर पर कोई अनुष्ठान यथा सत्यनारायण की पूजा अथवा कोई और जलसा होता और पास-पड़ोस में न्योता आदि भेजना होता तो माँ नाई को बुलवाती और उसे एक कागज़ पर संदेश लिखकर दे देती थी। उसी कागज़ पर नीचे आमंत्रित अतिथियों के नाम लिखे रहते थे। वो नाई घर-घर जाकर सभी आमंत्रित अतिथियों के हस्ताक्षर करवा कर वो कागज़ के हवाले कर जाता था। बदले में माँ उसे कुछ अनाज और कुछ रुपये देती थी। और पीछे जाएँ तो नाई कितनी ही शादियाँ तय करवाता था। जजमानी व्यवस्था का यह एक अदद उदाहरण था। किन्तु स्व-सम्पूर्ण गाँव के नष्ट होने के साथ ही जजमानी व्यवस्था नष्ट हो गयी और गाँव के विभिन्न वर्गों का एक दूसरे पर निर्भरता भी खत्म हो गयी। बाजारवाद ने भारतीय जीवन शैली को पाश्चात्य जीवन शैली में ढाल दिया और पारंपरिक गँवईं अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दिया।