Friday, 23 October 2020

जीवन के रंग-अपनों के संग : वह क़स्बा और क़स्बे का वह दुर्गापूजा


उस छोटे से क़स्बे में मनोरंजन के साधन सीमित थे। इन साधनों में सबसे सामान्य था रेडियो सीलोन और विविध भारती पर फ़िल्मी गीतों के लिए फरमाइशें भेजना और रेडियो पर अपने नाम की घोषणा सुनना। जाने क्या सुकून मिलता था यहाँ के बाशिंदों को प्रतिदिन रेडियो पर अपने नाम की घोषणा सुन कर। दूसरा साधन हिंदी फिल्में देखना था। उस क़स्बे में दो सिनेमा हाल भी थे -वृन्दावन टाकीज़ (बाद में जवाहर) और पूर्णिमा टाकीज़। किन्तु सिनेमा देखने पर कई बंदिशें थीऐसा माना जाता था सिनेमा का समाज पर गलत प्रभाव पड़ता हैबच्चों के लिए तो सिनेमा देखना एकदम ही वर्जित थासिनेमा देखने के लिए उस क़स्बे के बच्चे क्या-क्या जुगत बिठाते थे यह कहानी फिर कभीमनोरंजन के इन सामान्य साधनों के अलावे उस क़स्बे के लोग मनोरंजन के लिए विभिन्न त्योहारों को बड़ी धूम-धाम से मनाते थे- त्यौहार उनके लिए मनोरंजन का सबसे सशक्त माध्यम थात्योहार चाहे जिस किसी भी धर्म का हो इस क़स्बे के बाशिंदे बिना किसी भेद-भाव के समान रूप से इन त्योहारों को मनाते थेसाथ त्योहारों को मनाने की वजह से उस क़स्बे में साम्प्रदयिक सौहार्द बना हुआ था अथवा सांप्रदायिक सौहार्द की वजह से उस क़स्बे के बाशिंदे सभी धर्मों के त्यौहार साथ मनाते थे- यह बता पाना कठिन था। ऐसा सांप्रदायिक सद्भाव आज के दौर के लिए मिसाल साबित हो सकते हैं। इस देस की बहुत सारी अच्छी परम्पराओं की तरह यह परंपरा भी आज अतीत की बातें बन कर रह गयी हैं 

बहरहाल प्रत्येक त्यौहार पर इस क़स्बे की रौनक देखते ही बनती थीवर्ष में आने वाले पर्व त्योहारों का इंतज़ार बच्चे तो बच्चे, बुजुर्ग भी बेसब्री से करते और बिना किसी जाति-धर्म का विभेद किये हर त्यौहार को दिल खोल कर मनाते थे- फिर चाहे वो होली हो अथवा ईद, दिवाली हो या फिर क्रिसमस- उस क़स्बे में प्रत्येक त्यौहार जुनूनीयत की हद तक मनाया जाता थाधर्म के चंद ठेकेदार सत्तर के दशक में उस दौर में भी थे किन्तु वे चाहे कितना ही जोर लगा लेते पर उस क़स्बे के विभिन्न सम्प्रदायों के बीच दीवार खड़ी करने में वे कभी सफल नहीं हो पाएसमय के साथ-साथ कालांतर में ये त्यौहार अमीरों के लिए ऐश्वर्य प्रदर्शन के अवसर और गरीबों के लिए एक मजबूरी का सबब मात्र बन गए, जिससे ये रस्म अदायगी के तौर पर निबट लेते हैं, किन्तु इस क़स्बे में सदा से ऐसा नहीं थासत्तर के दशक में सभी त्योहारों का इस क़स्बे में जोरदार स्वागत हुआ करता था क्योंकि तब अभ्रख के फलते-फूलते खनन और व्यापार से समाज का हर व्यक्ति लाभान्वित थाऐसे ही त्योहारों में एक था दुर्गा-पूजाइस त्यौहार को लेकर कुछ ऐसी बातें हैं जो अब फिर लौट कर नहीं आनी। अभ्रख के व्यापार के ठप्प पड़ने के साथ ही इस क़स्बे में मनाये जाने वाले दुर्गापूजा की रौनक भी धूमिल पड़ती चली गई

उस छोटे से क़स्बे में और इसके सरहद से लगे गाँवों को लगा कर सत्तर के दशक में तक़रीबन छह स्थानों पर दुर्गापूजा मनाया जाता था। खेतों की क्यारियों और तालाबों के तटों पर खिलने वाले कांस के फूल जहाँ बरसात की विदाई की सूचना देते थे वहीँ ये इस बात की भी सूचना देते थे कि आश्विन माह का पदार्पण हो चुका है और माँ दुर्गा का अवतरण होने ही वाला हैरामचरित मानस में भी लिखा है ‘फूले कांस सकल महि छाई, जिमि वर्षा रितु प्रगट बुढ़ाई’-यानि कांस में फूल आ गए तो बरसात खत्म हो गई। सारा क़स्बा माँ दुर्गा की स्वागत को तत्पर हो उठता थाजातिगत आधारित द्वारा दुर्गापूजा समिति के गठन का चलन नहीं थासभी जाति के लोग किसी एक मंडप के पूजा अनुष्ठान से जुड़े होते थेगाँवों में गुमो और चंदवारा के अलावे चाराडीह, अड्डी बांग्ला, कला मंदिर (बेलाटांड़) और डॉ दत्तो (मडुवाटांड़) द्वारा दुर्गापूजा आयोजित किया जाता थाइन छह मंडपों के गिर्द ही बच्चे, बुजुर्ग और क़स्बे की समस्त औरतें पूजा मनाया करतेगुमो और चंदवारा में नवमी के दिन बलि देने की प्रथा थीप्रायः हर मंडप में पूजा सञ्चालन की ज़िम्मेदारी क़स्बे के ही गणमान्य बुजुर्गों के हिस्से थागोमो में पूजा सञ्चालन ठाकुर भगत सिंह और दुर्गा सिंह देखते थेचंदवारा में यह ज़िम्मेदारी ठाकुर कामेश्वर सिंह के हिस्से थीडॉ दत्तो के दुर्गापूजा आयोजन का तरीका एकदम नायाब थावे वर्ष भर अपने घर पर इलाज़ करवाने आये मरीजों की फीस से जमा-राशि से पूजा का आयोजन करते थेप्रातः अपने घर पर इलाज़ कराने आये मरीजों को देखने के लिए कोई तय फीस नहीं लेते थे वरन उनके टेबल पर रखे डब्बे में जिस किसी ने जो भी राशि रुपये  दो, चार, पांच, दस डाल दी उसी राशि से वे हर वर्ष दुर्गापूजा का आयोजन किया करते थेडिस्पेंसरी में आने वाले मरीजों से ही उनके घर के खर्चे निकलते थेआज डॉ दत्तो नहीं हैं और ये सब अब अतीत की यादें बन कर रह गयी हैंडॉ दत्तो के पूजा मंडप की यह विशेषता थी कि परंपरागत बंगाली स्टाइल में माँ दुर्गा और साथ के सभी देवी-देवता यानी सरस्वती, लक्ष्मी, गणेश और कार्तिकेय की मूर्तियों को एक ही तख़्त पर गढ़ा जाता था जबकि अन्य स्थानों पर ये अलग-अलग तख़्त पर गढ़े होते थेहम बच्चों में मूर्ति निर्माण को देखने की बड़ी लालसा रहती थी पर ऐसा करना निषेध थाअभिवावकों की सख्त हिदायत रहती थी कि ऐसा करने से पाप लगता है और बाल मन पाप का भागी होने से घबड़ाता था 

बचपन में हमें बताया जाता था कि देवी माँ इस वर्ष किस वाहन पर आरूढ़ हो कर आ रही हैंकभी हाथी, कभी शेर, कभी मोर तो कभी नाव पर सवार हो कर देवी के आने की बात हमारे बुजुर्ग हमें बताते थेहम बच्चों को यह सुन कर अजीब लगता कि देवी नाव से क्यों आ रही हैंफिर खुद ही मन को समझा लेते कि संभवतः बाढ़ की वजह से ऐसा होहम ये भी सोचते कि जब देवी माँ शेर की सवारी करती है तो इस बात के क्या मायने हुएकिन्तु इन बातों पर हमारा ध्यान अधिक देर तक नहीं टिकताजो बात महत्वपूर्ण होती वह यह कि दुर्गापूजा के आगमन के साथ ही अगले पांच-छह दिनों के लिए स्कूल और पढ़ने-लिखने से छुट्टी मिल जाती थी जिसका हमें इंतज़ार रहता थाऔर वर्ष भर इंतज़ार रहता था इस अवसर पर विभिन्न मंडपों में जा कर देवी के दर्शन करना और मंडपों से लगे मेले का आनंद उठाने का

दुर्गापूजा का त्यौहार एक ऐसा अवसर होता था जब इस क़स्बे के सेठ खुल कर चंदा देते थे- लगभग एक दूसरे के प्रतिद्वंदिता में- अभ्रख के व्यापार में जाने कितने ही व्यापारी लगे थे- छट्ठू राम, होरिल राम, दर्शन राम, चांडक परिवार, कंधवे परिवार, कपसिमे, खाटूवाला, झांझड़ी, टुपलाल बाबू, केदार बाबू, सुरेश जैन, जगन्नाथ जैन, भदानी परिवार, वैश्कयार परिवार, आदि आदिहर कोई अपने व्यापारिक लाभ के अनुपात में चंदा देता थाअतः कौन कितने लाभ में चल रहा है इसे दिखाने के क्रम में बहुदा  एक स्वस्थ प्रतियोगिता सी हो जाती थी और इन व्यापरियों में एक होड़ सी लग जाती थीआज अभ्रख का व्यापार ठप्प है और ये सब भी अब अतीत की बातें बन कर रह गई हैंऐसे ही अतीत की बातें बन कर रह गईं हैं कला-मंदिर (बेलाटांड़), डॉक्टर दत्तो (मण्डुवाटांड़) और बंगाली समाज द्वारा अड्डी बांग्ला में मनाया जाने वाला दुर्गापूजा महोत्सव जहाँ के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का इंतज़ार लोग वर्ष भर करते थेजहाँ बंगाली समाज द्वारा गीत-संगीत के कार्यक्रमों का आयोजन होता वहीं कला-मंदिर द्वारा अष्टमी और नवमी को नाटकों का मंचन कराया जाता थानाटकों का यह मंचन जिसे यहाँ के लोग 'ड्रामा खेलना' कहते थे उस काल में इतने लोकप्रिय थे कि इन्हें देखने आसपास के तमाम गाँवों और कस्बों के लोग मंडप से सटे ‘ओपन एयर थिएटर’ में हाज़िर होते और सारी रात खेले जाने वाले ड्रामे का आनंद लेते। 'ओपन एयर थिएटर’ से यह मंतव्य कदापि न निकाले कि उस छोटे से क़स्बे में उस दौर में भी सचमुच यह सुविधा उपलब्ध थीनहींयह थिएटर एक चबूतरा मात्र था जिसे पूजा के समय बांस, बल्ली और तिरपाल से ढँक दिया जाता था, कनात से घेर कर सामने एक भाग में कुर्सियां और दूसरे में दरी बिछा दी जाती थीदर्शकों की सुविधा के लिए. यही था उस क़स्बे का अस्थायी ओपन एयर थिएटरइस काम में उस क़स्बे का मुस्लिम समाज, जो सामान्यतः टेंट हाउस चलाते थे, सहयोग करते थेइनमें से ही कोई जनरेटर की व्यवस्था करता, कोई साउंड सिस्टम उपलब्ध कराता तो किसी के जिम्मे ड्रामे के दौरान प्रयुक्त होने वाली रंग-बिरंगी रौशनी की व्यवस्था की रहती तो कोई अन्य मंच से जुडी छोटी-मोटी जिम्मा संभालताअष्टमी और नवमी ये दो दिन ऐसे होते थे जब लोग सिनेमा हॉल में सिनेमा देखना पसंद नहीं करते थेकला-मंदिर के मंच पर खेले जाने वाले ये ड्रामे इतने प्रचलित और प्रभावशाली माध्यम थे कि दोनों ही टाकीजों में इन दिनों नए फिल्म नहीं लगाए जाते थेकिसी भी भक्ति फिल्म को दिखाया जाता था और पर्याप्त मात्रा में दर्शक न पहुँचने पर कभी- कभी तो शो ही रद्द कर दिया जाता थाआज यह सब सुनने में थोड़ा अजीब अवश्य लगे किन्तु उस दौर में उस छोटे से क़स्बे में खेले जाने वाले ड्रामों के इतने कद्रदान हुआ करते थे

भादो माह के आगमन के साथ ही दुर्गापूजा की सुगबुगाहट शुरू हो जाती थी और बेलाटांड़ कला मंदिर दुर्गापूजा समिति क्रियाशील हो जातीकुमारटुली, कलकत्ता के कारीगर आकर देवी दुर्गा एवं अन्य देवताओं के मूर्ति निर्माण में लग जाते थेपूजा की विभिन्न व्यवस्थाओं के लिए गठित समितियां अपने-अपने काम पर लग जातीएस. एस. नाग, बोस बाबू, दिगंबर बाबू, बद्री बाबू, आदित्य बाबू, अयोध्या बाबू, मणि बाबू, खोखा बाबू एवं देवी-मंडप रोड में रहने वाले अन्य बंगाली भद्रजनों के जिम्मे पूजा की ज़िम्मेदारी होती थीपूजा में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों से जुड़े क़स्बे के छोटे और फुटकर व्यापारी आगे आकर पूजा में सहयोग करतेहर दृष्टि से दुर्गापूजा का आयोजन उस क़स्बे में एक सार्वजनिक आयोजन होता जहाँ हर जाति और धर्म के लोग यथोचित सहयोग करतेढाक वाले से ढाक के लिए रजामंदी ले ली जाती थीकुम्हार पूजा में प्रयुक्त होने वाले समस्त बर्तन यथा कुल्हड़, खप्पर, कटोरी आदि गढ़ने में लग जातेप्रायः देवी दुर्गा के प्रति अगाध श्रद्धा स्वरुप बहुत ही कम राशि पर ये लोग अपनी-अपनी सेवाएं ख़ुशी-ख़ुशी देते थेइस प्रकार सार्वजनिक सहयोग से हर व्यवस्था चाक चौबंद की जाती थी 

दूसरी ओर इस अवसर पर मंचित किये जाने नाटकों के बारे में भी चर्चाएं शुरू हो जातीजहाँ पूजा की संपूर्ण व्यवस्था के लिए अलग टीम गठित हो जाती वहीं ड्रामों के लिए अलग दल बन जाताउस दौर में नाटक एक विशिष्ट विधा थी जिस पर बंगाली समाज की बड़ी ज़बरदस्त पकड़ थीकहते हैं ये जिस प्रदेश में भी गए नाटक मंचन की कला साथ लेकर गएलखनऊ में दुर्गा पूजा एवं काली पूजा की शुरुवात बादशा नसीरुद्दीन हैदर (1827-1837) के ज़माने में कालीचरण चट्टोपाध्याय द्वारा शुरू की गयीबंगाल की प्रसिद्द नाट्य मंडली 'ग्रेट नेशनल' संवेदनशील सामाजिक विषय यथा सती प्रथा पर नाटक का आयोजन कर ब्रिटिश हुकूमत के कोपभाजन भी बनेकई बार इन नाट्यमंडिलियों को उनके नाटकों की वजह से प्रतिबंधित भी कर दिया जाता थानाटक के इसी परंपरा का एक सूत्र उस क़स्बे में भी देखने को मिलता थाड्रामों के मंचन के लिए कला-मंदिर पूजा आयोजन समिति के तीन सदस्य, जो नाटकों में भाग भी लिया करते थे, के जिम्मे ख़ास कर इन नाटकों के सफल मंचन का सारा दारोमदार छोड़ दिया जाता थाइन तीन कलाकारों, जिनके नाम क्रमश गुतुलजी सहाय, राणा हरिहर सिंह, भूषण सिन्हा थे, ने वर्षों इस ज़िम्मेदारी का निर्वहन सफलतापूर्वक कियाइनमें से भूषण सिन्हा तो एक दफा हिंदी फिल्म में क़िस्मत आजमाने बॉम्बे भी जा पहुंचे थे किन्तु असफल हो कर लौट आये थे

कला मंदिर के मंच से खेले जाने वाले इन ड्रामों का विषय-वस्तु कभी भी रामलीला का मंचन नहीं रहादशहरा के अवसर पर रामलीला का आयोजन उत्तरी भारत में लोकप्रिय अवश्य हैं किन्तु उस छोटे से क़स्बे में लोगों की दिलचस्पी के विषय ऐतिहासिक थेअतः नाटकों के मंचन के लिए प्रायः ऐतिहासिक विषय चुने जाते थे यथा मुग़ल-ए-आज़म, चित्तौड़ का शेर, कलिंग-विजय, पाटलिपुत्र गौरव अशोक, पृथ्वीराज चौहान, सिकंदर-पोरस आदि आदिइन नाटकों की किताबें बनारस में मिलती थी और बनारस से ही इन नाटकों में प्रयुक्त होने वाले पार्श्व-परदे, और कॉस्ट्यूम आदि भी मंगाए जातेएक बार नाटक की किताब और सज्जा-सामग्री का इंतज़ाम हो जाने के बाद कला-मंदिर की सांस्कृतिक आयोजन समिति इन नाटकों के विभिन्न किरदारों के लिए कलाकारों का चयन करतीनिश्चय ही गुतुल बाबू, राणाजी और भूषण जी को मुख्य भूमिकाएं मिलतीदिक्कत महिला किरदारों को लेकर होतीपुरुष कलाकार ही महिला किरदार निभातेमहिला किरदारों के लिए सुन्दर पुरुषों को किरदार निभाने के लिए मनाया जाता और यह ध्यान रखा जाता कि रिहर्सल के दौरान कोई उनका मजाक नहीं बनायेहर कलाकार को अपने-अपने डायलॉग रटने होतेइसके लिए हममे से ऐसे बच्चों का सहयोग लिया जाता जिनकी लेखनी सुन्दर थीप्रत्येक बच्चा एक-एक किरदार के पूरे डायलाग, दूसरे किरदार के क्यू के साथ लिखकर देताक्यू दूसरे कलाकार के डायलाग का वह अंतिम शब्द होता है जिसके बाद इस कलाकार को अपने डॉयलाग बोलने होतेफिर शुरू होता प्रत्येक रात्रि इन नाटकों के रिहर्सल (अभ्यास) का सिलसिला जो दुर्गा-पूजा तक चलतायह अपने आप में एक रोचक अनुभव था क्योंकि प्रत्येक कलाकार अपने किरदार में फ़िल्मी किरदार के तौर-तरीके अपनाने की कोशिश करता ताकि उनकी अदायगी अधिक से अधिक सजीव और सटीक लगेमसलन यदि मुग़ल-ए-आज़म नाटक खेला जा रहा हो तो अकबर और शहज़ादा सलीम का किरदार निभाने वाले कलाकार पृथ्वीराज कपूर और दिलीप कुमार की नक़ल करने की कोशिश करतेया फिर उस दौर के किसी अन्य फ़िल्मी कलाकार की नक़ल उतारने की कोशिश करतेरिहर्सल के लिए किसी ऐसे स्थान को चुना जाता जहाँ आम लोगों का आना-जाना न होता होयह आवश्यक था ताकि संभावित दर्शक पहले से ही नाटक न देख लेगाँधी स्कूल इसके लिए सबसे माकूल स्थान था क्योंकि स्कूल शाम को बंद हो जाता था और बाद में पूजा के लिए पूरे तौर ही बंद हो जाता थानाटक के प्रति आमजन की उत्सुकता बनी रहे, इसलिए रिहर्सल स्थान की गोपनीयता बनाये रखी जाती थीपूजा के लिए उगाहे गया चंदा प्रायः पूजा के लिए ही कम पड़ जाते थेऐसे में बतौर पैट्रन गुतुल बाबू रिहर्सल के दौरान चाय-नास्ते के खर्च का निर्वहन भी करतेयह नाटक के प्रति इन कलाकारों की प्रतिबद्धत्ता का द्योतक माना जा सकता हैमंचन से दस दिन पहले ही बनारस से पार्श्व परदे और कॉस्ट्यूम आ जातेअंतिम पांच छह दिन कॉस्ट्यूम के साथ रिहर्सल हुआ करता     

षष्ठी पूजा के दिन विभिन्न पंडालों में माँ दुर्गा एवं अन्य मूर्तियों के अनावरण के साथ दुर्गा-पूजा का शुभारम्भ होतामंडप के आस-पास अच्छा खासा मेला लग जाता और उमड़ पड़ता पूजा और मेले का आनंद लेने के लिए भीड़ का रेलमपेलकुछ-कुछ प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' में वर्णित गांव के मेले की तरह ही उस क़स्बे का दुर्गापूजा का मेला हुआ करता था- एक ओर हलवाइयों की दुकानें सज जाती थी तो दूसरी ओर खिलौनों की दुकाने बच्चों को लुभाती थीकुछ दुकाने रोजाना इस्तेमाल की वस्तुओं की होती थीकुछ महिलाओं के श्रृंगार की वस्तु बेचतेकहीं मुर्गे लड़ाने का दांव खेला जाता तो कहीं झूले लग जातेउस क़स्बे के छोटे और सीमान्त व्यापारियों के लिए दुर्गापूजा का यह मेला अतिरिक्त कमाई का देवी प्रदत्त अवसर होता था

षष्ठी के पूजा के साथ ही सिनेमा हाल के प्रचार रिक्शे पर माइक और लाउडस्पीकर ले सप्तमी, अष्टमी और नवमी को मंचित किये जाने वाले नाटकों का प्रचार सारे क़स्बे में शुरू हो जाताजिस किसी भी गली से यह प्रचार रिक्शा गुजरता गली के बच्चे उसके पीछे-पीछे उसका अनुसरण करते और सूचना इकट्ठी करतेलोगों को भी तभी पता चलता कि किस दिन कौन सा ड्रामा खेला जाना हैलोग विभिन्न मंडपों में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों की जानकारी लेते और फिर यह निर्णय लेते कि रात किस कार्यक्रम का आनंद लेना है 

यों तो नाटक का समय तय कर दिया जाता था जो प्रायः रात्रि आठ बजे का होता था किन्तु ये नाटक कभी भी आठ बजे नहीं शुरू होते थेसंध्या आरती के बाद लोग-बाग़ अपने-अपने घरों से रात के खाने-पीने से फारिग हो कर जुटतेआयोजन समिति के सदस्य भीड़ के जुटने का इंतज़ार करते और इस बीच आये हुए लोग बोर हो कर लौट न जाए, स्थानीय गायकों को गायन का मौका देतेदो-चार कलाकारों को मौका मिलता और उनके गाने के बाद बहुत ही जोर-शोर के साथ नाटक के आरम्भ होने की घोषणा की जाती मानो कोई गोल्डन जुबली फिल्म शुरू होने वाली होइन घोषणाओं के लिए जत्ती बाबू यानी जतिंद्र प्रसाद स्थानीय अमीन सयानी का रोल अदा करतेबाद में वे नाटक के दौरान प्रॉम्प्टर की ज़िम्मेदारी भी निभातेप्रॉम्प्टर वह शख्स होता था जो नेपथ्य से धीमी आवाज़ में डॉयलाग बोलता जाता था ताकि यदि कोई कलाकार ऐन मौके पर अपने डायलॉग भूल जाए तो प्रॉम्प्टर की मदद से स्थिति को संभाला जा सकेकिन्तु कभी-कभी स्थिति तब हास्यास्पद हो जाती जब प्रॉम्प्टर की आवाज़ दर्शक दीर्घा तक पहुँच जाती और दर्शक भी प्रॉम्प्टर की तरह आगे-आगे डायलॉग बोलने लग जातेकितनी ही दफा ऐसा होता कि कोई नवोदित कलाकार सामने इकट्ठी भीड़ को देख नर्वस हो जाता और अपने रोल तक भूल जाताऐसे में गुतुल बाबू अथवा राणा हरिहर सिंह जैसे वरिष्ठ कलाकारों के हिस्से स्थिति संभालने की ज़िम्मेदारी आन पड़ती जिसे वे बखूबी निभा जाते

उस दौर में ये नाटक इतने लोकप्रिय थे कि मैदान का कोना-कोना दर्शकों से भर जाताइसे देखने उस क़स्बे के न केवल आम ग्रामीण वरन संभ्रांत घराने के लोग भी सपत्नीक पधारते और इसका आनंद बराबर उठाते थेकुर्सियां और जाजिम भर जाते तो लोग पीछे खड़े होकर अथवा अपने साथ लाये वाहन यथा बैलगाड़ी, साईकिल  आदि पर बैठ कर ड्रामा का आनंद उठातेअगले तीन से चार घंटे तक सफलतापूर्वक ड्रामा खेला जाता और ब्रह्म मुहूर्त में जब पंडितजी अगले दिन की पूजा की तैयारी शुरू करने के लिए उठते तभी यह सभा विसर्जित होती थीदूसरे दिन समस्त क़स्बे में नाटक के विभिन्न कलाकारों के अभिनय की चर्चा होती और चर्चा होती कि किसका अभिनय सबसे उम्दा थायह बहस भी काफी रोचक होती और लोग-बाग़ हर कलाकार के एक-एक मूव की या तो तारीफ़ करते या बखिया उधेड़ देतेउस क़स्बे का हर कलाकार एक दिन के लिए 'सेलिब्रिटी' बन जाता था

देवी दुर्गा को समर्पित इन समर्पित कलाकारों के इस आख्यान की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम हैवर्षों कला-मंदिर की यह परंपरा बनी रहीकिन्तु हर अच्छी परंपरा की तरह इस परंपरा का भी एक दिन अंत होना ही थायह परंपरा तभी जा कर टूटी जब ये कलाकार वृद्ध हो गए और नाटक की ज़िम्मेदारी उठाने में स्वयं को अशक्त महसूस करने लगेनयी पौध, जिसने पूजा की ज़िम्मेदारी संभाली, के लिए नाटकों का मंचन एक फजीहत भरी ज़िम्मेदारी थी जिसकी अपेक्षा हिंदी फिल्म का प्रदर्शन अधिक सुविधाजनक और सरल थावो इसलिए क्योंकि बहुधा हिट हिंदी फिल्मों को उस क़स्बे तक पहुँचने में काफी समय लग जाता थाऐसे में इनमें से किसी हिट फिल्म की प्रदर्शनी दर्शकों को अपनी और खींच लेती थीआज के दौर में जब हिंदी फिल्में एक साथ पूरे देश में रिलीज़ हो जाती हैं यह विकल्प भी ख़त्म हो गया हैआज देवी दुर्गा के स्वागत में कोई कलाकार रात भर 'ड्रामा नहीं खेलता'आज देवी दुर्गा रात्रि प्रहर में अकेलेपन का दंश झेलने को मजबूर हैआशा है इसका कोई हल भी अवश्य ही निकलेगा 

विजयादशमी के दिन विसर्जन के साथ ही दुर्गापूजा का यह वार्षिक त्यौहार संपन्न हो जाता थाविसर्जन के लिए पंजाबी मोहल्ला का पंजाबी समाज के लोग अपने ट्रक मुहैया कराते थेयह पंजाबी समुदाय यहाँ विभाजन के बाद आकर बस गया था और बाद में यहीं का होकर रह गया थातीन-चार ट्रकों का यह काफिला देवी दुर्गा एवं अन्य देवी-देवताओं के विसर्जन से पहले समस्त क़स्बे का एक चक्कर लगाता थाइससे पहले उस क़स्बे की औरतें देवी दुर्गा के 'खोइछा भर्ती' थी और देवी से अपने खोइचे के भरे-पूरे होने का आशीर्वाद पाती थीबंगाल में इस परंपरा को 'सेनूर खेला' कहते हैं जब विदाई की बेला में औरतें देवी दुर्गा से अपने अमर सुहाग का आशीर्वाद पाती हैंविसर्जन के वक़्त समस्त क़स्बा मंडप पर उमड़ आता थादेवी को विदा करते औरतों की आँखों से आंसू बेतरह बह चलतेबुजुर्गजन देवी को ऐसे विदा करते मानो वे अपनी बेटी को ही विदा कर रहे होसमस्त माहौल ग़मगीन हो जाता थाहम बच्चों को यह सोच कर बेहद दुःख होता कि मस्ती के इन चार-पांच दिनों के बाद अगले दिन से पुनः स्कूल जाना होगा, जो पूजा के दूसरे दिन खुल जाते थेचार दिन पहले मेले से खरीदे अपने-अपने ‘रिवाल्वर’ के लिए अगले एक साल के लिए कारतूस की अतिरिक्त लड़ियाँ खरीदते और देवी से परीक्षा में अच्छे अंक के लिए आशीर्वाद लेतेविसर्जन के जुलूस पर उमड़ती भीड़ की वजह से बच्चों को कभी भी विसर्जन में नहीं ले जाया जाता था और हम बच्चे मजबूरन माँ के साथ घर लौट आतेइस विसर्जन में भी सभी संप्रदाय के लोग भाग लेते

कई बार इन पर्वों के बीच दूसरे संप्रदाय के पर्व पड़ जाते थेमसलन एक साल ऐसा हुआ कि विजयादशमी के दिन ही मुहर्रम का पर्व भी पड़ गयामुहर्रम के अवसर पर भी उस क़स्बे में धूम-धाम से ताज़िये निकाले जाते थे जो जुलूस का रूप ले लेते थेमुहर्रम से पहले एक माह तक पैक कर्बला की दौड़ लगाते थेजिनके कोई काम बिगड़े होते वे इन पैकों के रास्ते पर लेट जाते थेऐसी मान्यता थी कि ऐसा करने से बिगड़े काम बन जाते हैंउस क़स्बे के गरीब हिन्दुओं और मुसलमानों में यह विश्वास समान रूप से गहरे बैठा थाकोई संगठन किसी भी हिन्दू को ऐसा करने से नहीं रोक पाता थाबहरहाल, बिना किसी पुलिस गश्त और शासकीय एहतियात के उस वर्ष भी दोनों ही जुलूस धूमधाम से निकाले गए और दोनों ही संप्रदाय के त्यौहार सफलतापूर्वक संपन्न हुएइसका श्रेय निश्चय ही क़स्बे के विभिन्न सम्प्रदायों के उन बुजुर्गों के आपसी समझ-बूझ को था जिसकी वजह से यह संभव हो पाया थायह संभव इसलिए भी हो पाया था क्योंकि यह उन दिनों की बात है जब गाँवों के बुजुर्गों के लिए उनके रहते उनके गांव में पुलिस का कदम रखना उनकी इज़्ज़त पर बट्टा लगने के समान थायह उन दिनों की बात है जब इन बुजुर्गों को अपने सामाजिक दायित्यों का बोध थाअतः वे सामने आकर समाज में आपसी सौहार्द बनाने का प्रयास करते थे न कि वातानुकूलित ड्राइंगरूम में बैठ कर सोशल-मीडिया पर ट्वीट कर अपने सामाजिक दायित्यों से फारिग हो लेते थेयह उन दिनों की बात है जब समाज के बुजुर्गों ने अपने बचपन में साम्प्रदायिकता के ज़हर का दंश झेला था और वे नहीं चाहते थे उनकी अगली पीढ़ी भी उसी दंश को झेलने को मजबूर होअतः वे इस दिशा में सक्रियता से प्रयासरत रहते थे न कि निट्ठले बैठे हर काम की ज़िम्मेदारी सरकार के जिम्मे डाल स्वयं फुर्सत पा जाते थेयह उन दिनों कि बात है जब देशभक्ति का मतलब था सभी धर्मों के त्योहारों को समान रूप से मनाना न कि संकीर्ण राष्ट्रवाद की आड़ में सांप्रदायिकता के विषबेल को फलने-फूलने देनायह उन दिनों कि बात है जब समाज का मतलब समाज होता था न कि ‘सेल्फी’ वाला सेल्फिश समाजयह उन दिनों कि बात है जब कानून के रखवाले भी त्योहारों पर त्यौहार का आनंद उठा पाते थे क्योंकि देशवासियों का जमीर जागता था न कि आज की तरह स्व-केंद्रित हो कर रह गया थाये उन दिनों कि बात है जब अपना देस आज की तुलना में बेशक पिछड़ा था, जब देस की आधी जनता को दो वक़्त का खाना बेशक नहीं नसीब होता था और जब देस का एक बड़ा तबका बेशक 'अनपढ़ गंवार' था, किन्तु यह निश्चय के साथ कहा जा सकता था कि इन 'अनपढ़ गंवारों' को भी अपने दायित्यों का बोध था - यह बोध था कि उनके क़स्बे में रहने वाले अपने ही देसवासी हैं और लिंचिंग किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकताऐसा था वह क़स्बा और उस क़स्बे में मनाया जाने वाला दुर्गापूजाबरबस कवीन्द्र रविंद्रनाथ टैगोर की कुछ पंक्तियाँ याद हो आती हैं - जहाँ मन भय से मुक्त हो और मस्तक सम्मान से उठा हो, उस स्वतंत्रता के स्वर्ग में, हे परमपिता! मेरे देश को जागृत कर दे!