
बिहार में दो त्योहारों का विशेष महत्व है - एक होली और दूसरा
छठ। दोनों ही पर्व ऐसे हैं जब बिहारी अपने देस गांव घर की ओर
लौटता है- चाहे इसके लिए उसे कितनी भी जुगत बिठानी क्यूँ न पड़े। छठ
व्रत के प्रति बिहारियों के प्रेम का आलम यह है कि बिहार जाने वाले भारतीय रेल के किसी
भी ट्रेन में चार महीने पहले टिकट बुक हो जाते हैं। दिल्ली रेलवे
स्टेशन पर पटना और दरभंगा के लिए सामान्य टिकट का अलग से काउंटर खोल दिया जाता है। सारे के सारे एयरलाइन्स इस समय पटना के फ्लाइट के टिकट के दाम बढ़ा
देते हैं ताकि आर्थिक नुकसान की भारपाई हो सके। बिहार अपने घर
इस पर्व को मनाने के लिए बिहारी किसी भी साधन का इस्तेमाल करता है- चाहे वह बस हो अथवा
फिर कोई अन्य साधन जिसमे बेशक उसे अपनी यात्रा तोड़-तोड़ कर पूरी करनी पड़े-वह ऊफ्फ तक
नहीं करता। इसे ही बिहारी जीवटता कहते हैं। इसी
जीवटता का तो कमाल है कि संघ लोक सेवा आयोग की सबसे कठिनतम परीक्षा यानि सिविल सर्विसेज
परीक्षा में भी इस प्रान्त के युवा सदा हर साल अव्वल आते रहे हैं। बिहारी
ने एक बार ठान लिया तो बस ठान लिया।
मेरा मानना है छठ व्रत वस्तुतः एक सामुदायिक अनुष्ठान है। यह एक ऐसा व्रत है जिसे प्रधानतः महिलाएं आपस में मिलजुल कर करती
हैं; हालाँकि पुरुषों द्वारा इस पर्व को करने में कोई निषिद्धिता
नहीं है। एक समय किसी भी गांव में चंद छठव्रती ही होती थी और
पड़ोस के शेष घर इनकी मदद करता था। एक-एक व्रती के ऊपर पड़ोस के
चाचा-ताऊ के घर की सूप का भी जिम्मा रहता था। प्रत्येक व्रती
दर्जनों सूपों के साथ सूर्य-देवता के अर्घ्य की तैयारी करती जिसे विधिपूर्वक संपन्न
कराने में पड़ोस की चाची-ताई आदि का 24X7 का सहयोग रहता था। अब
यह पर्व घर-घर में मनाने का रिवाज़ सा चल पड़ा है। ऐसा संभवतः इसलिए
हुआ क्योंकि गत कुछ वर्षों में छठ व्रत करने के नियम और परम्पराओं में आमूल-चूल परिवर्तन हुए हैं- इस हद तक कि छठ
का वास्तविक स्वरुप ही बदल गया है। अब यह आस्था का वह कठिन पर्व
नहीं रह गया है जिसे हमने बचपन में माँ को करते देखा था। संभव
है मैं अपने विश्लेषण में कुछ कटु लगूँ पर जिस प्रकार आजकल लोगों ने इस पर्व को सोशल
मीडिया तक घसीट लिया है, लगता ही नहीं यह वही छठ पर्व है जिसे हम बचपन से देखते और
मनाते आये हैं- न वह सादगी और सरलता रही है न वह संयम और संयतता। वक़्त के साथ छठ पर्व करने में बहुत बदलाव हुआ है जिसे
सुधि पाठकगण जैसे-जैसे इस संस्मरण को पढ़ते जायेंगें, महसूस करेंगें।
मगध, मिथिला और भोजपुर के ग्रामीण अंचल से निकल कर यह पर्व पहले बिहार के विभिन्न
शहरों में फैला और अब यह न केवल देश के विभिन्न राज्यों में वरन विदेशों तक फ़ैल गया
है- 'चाहें रहब देसवा बिदेसवा, छठ करब हम हर बार,छठ
करब हम हर बार’- छठ के एक लोक-गीत की यह पंक्तियाँ छठ के
प्रति बिहारियों के इसी श्रद्धा भाव को दर्शाता है। मेरी समझ से यह इसलिए संभव भी हो पाया
क्योंकि एक ओर जहाँ बिहारियों का अपने राज्य से पलायन जारी रहा वहीं इसे मनाने की रीति-रिवाज़ों
में इतने परिवर्तन हुए कि अब यह वह कठिन व्रत नहीं रह गया है जिसे महिलाएं सामुदायिक
रूप से ही निभा पाती थीं। पहले यह पर्व ग्रामीण पृष्ठभूमि की
महिलाएं ही निभा पाती थीं किन्तु आज इसे शहरों में भी आसानी से किया जा रहा है क्योंकि
अब यह पर्व निभाया नहीं वरन अन्य पर्वों की तरह ही धड़ल्ले से मनाया जाता है। मुझे आज भी याद है इस व्रत को उठाने से पहले माँ पड़ोस में गंगा बाबू
के घर भाभियों से मदद के लिए कह कर रखती थी। जब दीदी का विवाह
हुआ तब भी माँ उनकी सास से आज्ञा लेकर बेटी-दामाद को छठ पर बुलाती ताकि दीदी की मदद
पूजा में मिल सके। सबों के सहयोग से ही यह पर्व विधि-विधान पूर्वक
संपन्न हो पाता था। छठ के इस पर्व से ही बचपन में सामुदायिक ज्ञान
का पहला पाठ हमने पढ़ा।
बचपन में देखता था माँ छठ की तैयारी दीवाली के दूसरे दिन से
ही शुरू कर देती थी। ऊ-डेरा
(बाउजी/ताऊजी का घर) में बड़ी माँ भी छठ पूजा रखती थी। यह
समय ऐसा होता जब स्कूल में बिलकुल मन नहीं लगता था और घर में पूजा की तैयारियां देखने
की ललक बनी रहती थी। पूजा रूम के बगल वाले कमरे को छठ पूजा के
लिए खाली कर दिया जाता था। पूजा का सामान इसी कमरे में रखा जाता
था। सबसे पहले पूजा में प्रयुक्त होने वाले विशेष बर्तनों को
अटारी से उतारा जाता- पीतल अथवा कांसे के गगरी, परात, बाल्टी, लोटा, कड़ाही, कड़छुल,
थाली, कटोरे, साँचा आदि आदि, साल में सिर्फ इसी मौके में प्रयुक्त होते थे। घर के अन्य बर्तनों का प्रयोग पूजा में वर्जित था।
इन बर्तनों को धो-धा कर पूजा रूम के बगल वाले कमरे में रखा जाता। पूजा में प्रयुक्त होने वाले अन्य सामान यथा सूप और गेहूं आदि की
खरीदारी माँ बीते रविवार को ही कर लेती थी। इस कमरे में ही एक
ओर एक चौकी डाल दी जाती थी। अगले पांच दिन माँ इसी कमरे में रह
कर पूजा की समस्त तैयारी करती और तैयारियां भी कितनी सारी। इस
रूम में दो-पाटों वाली चक्की को बिठाया जाता गेहूं पीसने के लिए और मिटटी के गिलावे
और ईंट से एक अस्थायी चूल्हा तैयार किया जाता। दिवाली के बाद
से हम बच्चों का पूजा कक्ष में और साथ वाले कमरे में जाना निषिद्ध था। पता नहीं अपने मैले हाथ से हम पूजा की किस वस्तु को छू दें। बिना स्नान किये इस कमरे में घुसना तो सख्त मना था।
छठ पूजा में साफ़-सफाई और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
छठ पर्व में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है ताकि भगवान् रुष्ट न हो जाएँ। हर समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि कहीं कोई बिना हाथ-पैर
धोये पूजा की सामग्रियों को छू न दे। छठ से हमने जो दूसरा पाठ
सीखा वह था स्वच्छता की महत्ता का।
पहले दिन माँ छठ के लिए खरीदी गयी सूती साड़ी और अन्य कपड़ों
को धोती और सुखाती। नहाय-खाय से लेकर पूजा की समाप्ति तक सिलाई-मशीन
से बिना सिले वस्त्र ही धारण करती थी। इसी दिन वो गेहूं बीनती
और कंकड़-पत्थर हटाती। इस काम में पड़ोस की महिलाएं, जिनके सूप
का जिम्मा भी माँ के पास ही होता था, माँ की मदद करती थी। अब
गेहूं में कंकड़-पत्थर पड़े होने की कल्पना नहीं की जा सकती किन्तु उस ज़माने में गेहूं
और चावल में कंकड़ पत्थर के कण होना यह सामान्य सी बात थी। फिर
माँ इसे धोती और धुले गेहूं को छत पर सूखने के लिए डाल दिया जाता था।
हम बच्चों को इसकी निगरानी की ड्यूटी लगती थी ताकि कोई पंछी इसमें चोंच न मार
दे।
ऊ जे केरवा
जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥
ऊ जे नारियर जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥
अमरुदवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥
शरीफवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥
ऊ जे सेववा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥
सभे फलवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥
-छठ के लोकगीत में यह प्रसंग आता है जब पंछी से पूजा के फल
और अन्य सामग्रियों की सुरक्षा की बात आती है। गेहूं के सूख जाने
के बाद घर पर ही इसे पीसा जाता था। कमरे में बैठाया गया चक्की
इस काम आता था और इस काम को अंजाम देने में सहयोग करते थे हम सब बच्चे।
परन्तु इससे पहले भाई-दूज के बाद माँ नहाये-खाय की तैयारियां
करती थी। नहाये-खाय का शाब्दिक अर्थ होता है नहा कर खाना। इस दिन जो पहला निवाला व्रती के कंठ के नीचे उतरता है उसे वह खुद
नहा कर तैयार करती है। चूँकि माँ सुबह से ही पूजा की तैयारी में
लग जाती थी अतः
हम बच्चों को सुबह का नाश्ता देने की ज़िम्मेदारी पड़ोस में गंगा
बाबू के घर की बहुरानियों में से किसी का होता था जो यह काम सुबह-सवेरे कर जाती थी। नहाये-खाय की सुबह माँ मिटटी के गिलावे और ईटों की मदद से बने अस्थायी
चूल्हे को आम की लकड़ी से चूल्हा जोड़ती। अन्य किसी भी पेड़ की लकड़ी
इस पर्व में वर्जित है। आजकल पूजा के सारे पकवान गैस स्टोव पर
बनाये जाने लगे हैं। इस अवसर पर शुद्ध वैष्णव भोजन बनता है जिसमे
अरवा चावल, लौकी युक्त चने की दाल, लौकी का ही बचका और घी होता है। लहसून
प्याज का उपयोग सर्वथा वर्जित था। इसी प्रकार सामान्य नमक का
प्रयोग पूजा में वर्जित था। केवल सेंधा नमक (पहाड़ी नमक) का ही
उपयोग पूजा में किया जाता था। पूजा में इस्तेमाल किये जाने वाले
कुएं के पानी में गंगाजल छोड़ कर उसे पवित्र किया जाता था। इसी
प्रकार हर प्रसाद में तुलसी पत्र छोड़ना अनियार्य था। यह सब करते-करते
दोपहर का एक बज जाता था। माँ के भोजन कर लेने के बाद हम लोग उसी
थाली में भोजन करते थे। आम की लकड़ी से जोड़े चूल्हे पर बने इस
प्रसाद रुपी भोजन का स्वाद लाजवाब होता था।
नहाये-खाय के बाद का दिन 'खरना' अथवा 'लोहंडा' का होता है। इनके शाब्दिक अर्थ क्या हैं नहीं मालूम पर इस दिन हर व्रती पूरे दिन
उपवास रखती है और शाम को पूजा के बाद ही प्रसाद ग्रहण करती है। इस
दिन सुबह से ही माँ शाम की पूजा के प्रसाद की तैयारी में लग जाती जिसमे खीर और चावल
के रोट मुख्य प्रसाद होते हैं। पूजा के खीर में गुड़ डलती थी। चीनी को अशुद्ध माना जाता है अतः छठ के प्रसाद में इसका उपयोग वर्जित
होता है। गांव के कुछ कोइरी-किसान जिनका घर में आना-जाना रहता
था, पूजा में उपयोग के लिए बाल्टी-बाल्टी गन्ने का रस घर पर पहुंचा जाते थे। इस रस में चावल को छिजा कर 'रसिया' प्रसाद बनता था जो हम सब को गुड़
के खीर इतना ही प्रिय था। किसी-किसी स्थान पर चावल दाल भी प्रसाद
स्वरुप बनाने का चलन है। सुबह से ही माँ चावल बीनने और पूजा के
अन्य काम में लगी रहती। दूसरी ओर दो मजदूर सारे दिन गेहूं पीसने
का काम करते जिसमे हम बच्चे भी हस्तक्षेप करते थे। इन मज़दूरों
को भी पूजा के लिए नए और धुले धोती और बनियान मिलता। स्नान कर
और इन नए परिधान को पहन कर ही वे पूजा वाले कमरे में गेहूं पीसने बैठते थे। बीस से पच्चीस किलो गेहूं पीसने में सारा दिन निकल जाता था। बच्चों में यह होड़ लगती कि कौन कितना अधिक गेहूं पीस कर दिखाता है। दो-दो बच्चों के जोड़ी बन जाती थी। एक बार हम
गेहूं पीसने बैठे तो पाया कि पीसी हुई गेहूं चक्की से निकल ही नहीं रही है। बड़े मामू ने बताया कि हम लोग चक्की को विपरीत दिशा में घुमा रहे थे। दस-पंद्रह मिनट का मेहनत यों ही बेकार चला गया था।
गेहूं पीसने के दौरान यदि किसी को लघु-शंका के लिए जाना पड़ गया तब भी उसे पुनः
स्नान कर ही कमरे में प्रवेश की अनुमति मिलती थी। शाम को जीप
को पानी से धोकर पापा के साथ हममे से दो-तीन बच्चे दूध लाने के लिए निकल पड़ते सुरौ
महतो या फिर ज्ञानी महतो की खटाल की ओर। इस दिन गाय के दूध की
अत्यधिक मांग रहती है और पूरे वर्ष दूध में पानी मिलकर बेचने वाला ग्वाला भी इस दिन
शुद्ध दूध ही बेचता है। छठ पर्व का इतना महत्व होता था कि इस
दिन वो अपने रोज़ के ग्राहक को छोड़ कर सारा दूध व्रतियों को ही देता।
अब मदर डेरी के दूध का इस्तेमाल भी लोग करने लग गए हैं किन्तु उस दौर में मिल्क
पॉवडर अथवा अप्राकृतिक दूध का पूजा में प्रयोग सर्वथा निषिद्ध था। घर
पर भी गाय के दोनों टाइम का दूध पूजा के लिए रखा जाता था। शाम
पुनः आम की लकड़ियों से माँ चूल्हा जोड़ती और खीर बनाने की तैयारी शुरू करती जितने सूप
उतने ही मिटटी के खप्पड़ और उतने ही तिलक, और पूजा में प्रयुक्त होने वाली अन्य वस्तुएं। खरना पूजा में शामिल होने हज़ारीबाग से सारे चाचा, चाची तिलैया अवश्य
आते थे। और यह वह समय होता जब बच्चों की संख्या और उनके उपद्रव
में वो बेतहाशा वृद्धि होती थी जिसे याद कर आज भी गुदगुदी होती है- पास के खेतों से
गन्ने तोड़ कर खाने से लेकर घाट का मुआयना करने या फिर आपस में दौड़-भाग करने में समय
कब निकल जाता था पता ही नहीं चलता था। दोनों डेरा एक हो जाता
था और छठ के लोकगीत के बीच खीर का प्रसाद बनता था-
'रूनकी-झुनकी बेटी मांगी, पढ़ल पंडित दामाद हे छठि माता,
घोड़वा चढन को बेटा माँगिल, सेवा करन को पतोहु हे छठि माता'
- ऐसे और अन्य कई लोकगीत अब भी मन-मस्तिष्क पर छाये हैं। पूजा का प्रसाद बन जाने के बाद खरना पूजन होता है।
खरना पूजा की समाप्ति पर पूजा का प्रसाद सबसे पहले व्रती ही ग्रहण करती है। पूजा के इस प्रसाद से ही वो अपना उपवास तोड़ती है। नियम
यह है कि जब व्रती प्रसाद ग्रहण कर रही हो तो किसी भी जीव के किसी भी प्रकार का स्वर
उसके कान तक न पहुंचे। यदि कोई कुछ बोलता है और वह स्वर व्रती
के कानों में पड़ता है तो वो वहीं भोजन करना छोड़ देती है। यही
यह व्रत का नियम है। चूँकि इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद अगले
छत्तीस घण्टे व्रती को पुनः उपवास पर रहना होता है अतः लोग इस समय संयम बरतते हैं और
बात-चीत नहीं करते हैं। बच्चों को दूर भेज दिया जाता है। गोदवाले छोटे बच्चों को महिलाएं लेकर अलग हो जाती हैं ताकि यदि वो
रुदन करे तो उसका स्वर व्रती के कानों तक न जा पाए। कहीं-कहीं
तो ढोल-नगाड़ों से अन्य सारे स्वर को दबा दिया जाता है। मुझे याद
नहीं माँ का व्रत कभी हम बच्चों की शोर की वजह से टूटा हो। इसी
प्रकार भोजन करते समय यदि कोई कंकड़ का टुकड़ा दाँतों तले आ जाए तब भी व्रती भोजन त्याग
देती थी। उन दिनों बिजली गुल होना आम बात थी और ऐसे में भूल से
भी यदि कोई पतंगा खाने में गिर जाए तब भी व्रती को भोजन त्याग देना पड़ता था। अतः इस समय व्रतियों को विशेष ध्यान रखना पड़ता था।
पूजा के बाद हम सब पूजा वाले कमरे में जाते और खप्पड़ और उसके सामने जलते दीये
के समक्ष साष्टांग प्रणाम कर हर वो मांग रख देते जिसकी हमें आकांक्षा रहती थी- भगवानजी,
परीक्षा में अच्छे मार्क्स दिला देना, भगवानजी अगले क्रिकेट मैच में मैं सबसे अधिक
रन बनाऊं आदि आदि। इसके बाद माँ के सामने साष्टांग होते। माँ भाइयों को भस्म का तिलक लगा कर और बहनों को रोली के टीके लगाकर
आशीर्वाद देती थी। फिर हम सब बच्चो में माँ के छोड़े प्रसाद को
खाने की होड़ लगती थी। इस प्रसाद से सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती
हैं- ऐसा कहते थे। हमारे ससुराल में इस प्रसाद पर केवल बहनों
का ही हक़ होता है जबकि खप्पड़ में चढ़ाये गए प्रसाद पर भाइयों का हक़ रहता था। गरज़ यह कि कोस-कोस में प्रचलनों में छोटे-छोटे परिवर्तन होते रहते
हैं। 'खरना' अनुष्ठान का समापन भी लोक-गीतों से ही होता था। व्रती लोक-गीत गाती और अन्य महिलाएं उनके स्वर में स्वर मिलाती।
खरना के बाद का दिन संध्या अर्घ्य का होता है। इस दिन पुनः सुबह से ही पूजा की चहल-पहल शुरू हो जाती थी। पड़ोस से भाभियाँ पूजा का प्रसाद तैयार करने के लिए आ जाती थी। इसके लिए उन्हें सुबह स्नान कर बिना चाय-नाश्ता किये आना होता था। दीदी के जिम्मे घर के शेष लोगों के लिए नाश्ता बनाने का काम होता। हममे से कुछ बच्चे भी सुबह बिना चाय-नाश्ता किये, नहा-धो कर ठेकुआ
ठोकने में लग जाते थे। ठेकुआ ठोकने के लिए सांचे होते हैं जिस
पर एक-एक लोई को हाथों से दबा कर ठेकुआ का स्वरुप दिया जाता है। पर
सबसे जटिल काम जो होता था वह था ठेकुआ के लिए आटा सानने (गूथने) का।
तरल गुड से आटे को साना (गूंथा) जाता था जो काफी मशक्कत का काम होता है। दो महिलाएं आटा सानने (गूथने) में, दो-तीन महिलाएं और बच्चे ठेकुआ
ठोकने में और दो महिलाएं ठेकुआ तलने में सुबह सात-आठ बजे से लगती थी तब जा कर बारह-एक
बजे तक पच्चीस किलो आटे का ठेकुआ तैयार होता था। माँ प्रत्येक
ठेकुवे पर रोली से टिकती और लौंग लगाती चली जाती थी। घर पर खरना
पर तैयार होने वाले खीर प्रसाद अथवा पूजा के लिए बनने वाला ठेकुआ में माँ ने कभी कोई
फर्क नहीं किया जैसा कि आमतौर पर 'समझदार' लोग करते हैं-खुद खाने के लिए अलग प्रसाद
बनाते हैं और बांटने के लिए अलग प्रसाद बनाते हैं।
सुबह जीप को पुनः धोया जाता और दो-तीन बच्चे पापा के साथ छठ
के लिए फल खरीदने बाजार जाते थे। घंटे भर में फल आ जाता था जिसे
कुएं पर ले जाकर धोया जाता और धोने के उपरांत ही इन फलों को पूजा वाले कमरे में रखा
जाता। बच्चों का एक दस्ता सुबह घाट को जाता था और अर्घ्य के लिए
अनुकूल स्थान का चयन करता। जरूरत पड़ने पर एक कुली की मदद से घाट
के एक भाग को इस प्रकार चौरस किया जाता कि माँ को जल में प्रवेश करने में कोई परेशानी
न हो। इस बात का भी ध्यान रखा जाता था कि कहीं किसी प्रकार का
कोई फिसलन न हो। ससुराल में अन्य पटनावासियों की ही तरह गंगा
तट पर अर्घ्य दिया जाता है। हालाँकि इस परंपरा को भी बिसराते
हुए अब लोगबाग घर पर ही एक कृत्रिम जलाशय बनाकर उसमें अर्घ्य देने लग गए हैं। यह सत्य
है कि हमने ही गंगा को प्रदूषित किया है किन्तु यह भी सत्य है कि गंगा को प्रदूषित
करने में जितना योगदान औद्योगिक कचड़े का है उसके मुकाबले ऐसे सांस्कृतिक हस्तक्षेप
का कुछ भी नहीं है। छठ का जो सम्बन्ध प्रकृति के साथ रहा था वह
टूटने लगा है। चक्की के आटे का स्थान मिल के आटे ने ले लिया है। एक वस्त्र की जगह सामान्य वस्त्रों ने ले लिया है।
गाय के शुद्ध दूध की जगह मदर डेयरी के
दूध से अर्घ्य देने का रिवाज़ चल पड़ा है। आम की लकड़ी की जगह गैस-स्टोव
ने ले लिया है। अब वो छठ कहीं छूट गया है जिसे माँ निभाती थी
और जिसे हम बचपन से देखते आये हैं। आज छठ के नाम पर हम जिस परंपरा
को अगली पीढ़ी को सुपुर्द कर रहे हैं उसे देख मन विकल हो उठता है और ह्रदय तार-तार। आप किसी भी घाट पर चले जाएँ सर्वत्र बाज़ारवाद व्याप्त है। वह सरलता और सादगी अब कहीं रही नहीं। लगता है
कहीं कुछ दरक सा गया है। आखिर कितनी कृत्रिमता के साथ हम अपनी
आस्था को बरक़रार रख पायेंगें।
संध्या तीन बजे तक माँ घाट पर जाने के दउरा (टोकड़ी) तैयार कर
लेती थी। प्रत्येक सूप को सजाया जाता- नारियल और कुछ फल, फूल,
अलता, और एक-एक दीपक प्रत्येक सूप पर रखा जाता; फिर सभी सूपों को दउरे में संभाल कर
रखा जाता। अर्घ्य के लिए गाय का दूध और गंगाजल युक्त जल भी रख
लिया जाता था। घाट पर सबों के बैठने के लिए दरी आदि के इंतज़ाम
के साथ हम घाट की ओर रवाना होते। शाम तक हज़ारीबाग से हमारे सभी
चाचा-चाची बच्चों समेत तिलैया पहुँच जाते थे। जीप को धोया जाता
और दउरे को उस पर रखा दिया जाता था। पापा और माँ के साथ कुछ बच्चे
नंगे पैर जीप में बैठ जाते और शेष बच्चे चाचा-चाची के साथ उनकी गाडी में सवार हो जाते। इसी समय साथ ही साथ बड़ी माँ भी दउरा और लेकर बाउजी के साथ ऊ -डेरा
से एक अन्य गाडी में निकलती और फिर यह पूरा काफिला घाट की ओर चल पड़ता था। पहले हम लोग बराकर नदी के जवाहर घाट पर अर्घ्य देने के लिए जाते थे। फिर गुमो के महतो-आरा तालाब में छठ पूजा के लिए जाने लगे। कभी-कभी नवादा गांव के नहर पर भी अर्घ्य देने जाना हुआ। गांव में घर के युवा दउरा को अपने सिर पर ढोकर घाट तक ले जाते हैं। थोड़े बड़े होने पर हमने भी इस परंपरा को निभाया और दउरे को लेकर चलते
हुए घाट पर जाते थे। ऐसा कर एक अलग ही सुकून और संतोष मिलता था। माँ सारे रास्ते छठ के लोक-गीत गाती-
'कांच
ही बांस के बहँगिया, बहँगी लचकत जाये,
होईही
देवरजी कहरिया, बहँगी घाट पहुंचाए,
बात
जे पूछे ला बटोहिया, बहँगी केकरा के जाए,
तू
तो आन्हर रे बटोहिया, बहँगी छठ मैया के जाए।’
घाट से कुछ दूरी पर उतर वो, बड़ी माँ, बद्री चाची और अन्य व्रती
पैदल चलने लगती और फिर ये सभी व्रतियां सामूहिक रूप से छठ के लोक-गीत गाना शुरू करती
जिससे समां बांध जाता था। मुझे अब भी याद है इन गीतों में हर
संतान का नाम लेकर छठ माता से कृपा बनाये रखने का निवेदन होता था। जब
मेरा नाम लिया जाता था हमारे चेहरे पर एक मुस्कान मुस्कान बरबस खिंच जाती थी। हम बच्चों में घाट पर पहुंचने की हड़बड़ी रहती और हम सब दौड़-दौड़ कर
आगे निकल जाते थे। अस्ताचल सूरज देवता को सम्बोधित कर माँ और
साथ की अन्य व्रतियां लोकगीत गाती-
डूबतो
सुरुज के जे पूजे, इहे बाटे हमर बिहार
फलवा
दउरवा सजाके, अईनी हम घाट पे तोहार
दिहनी
अरघ छठी मईया, करीं हमर आरती स्वीकार
करीं
हमर आरती स्वीकार
घाट पर पहले गंगाजल युक्त जल से उस भूमि को धोया जाता जहाँ
दउरा रखना होता था। फिर सूपों को पंक्तिबद्ध पश्चिममुखी कर रख
दिया जाता था। रास्ते में बुझ गए दीयों को पुनः प्रज्वलित कर
दिया जाता था। यह एक बहुत ही सुन्दर दृश्य उत्पन्न करता था जिसकी
व्याख्या अवर्णनीय है। गंगाजल युक्त जल छिड़क कर से नदी अथवा पोखर
के जल को भी शुद्ध किया जाता और फिर माँ जल में प्रवेश करती और सूर्य का ध्यान करती। सूर्य देवता की पूजा के बाद एक-एक कर सूपों से सूर्य देवता को अर्घ्य
दिया जाता। अस्ताचल सूर्य के अर्घ्य के साथ ही यह दिन समाप्त
होता था।
घाट से लौटने के बाद माँ कल प्रातः के दउरे की तैयारी करती। पड़ोस की भाभियाँ और अन्य महिलाएं दउरा सजाने में माँ की मदद करती
और इसके बाद छठ के लोक-गीत गाने का कार्यक्रम पुनः चल पड़ता जो रात्रि भोज तक चलता। इस पूरे दिन माँ का निर्जला उपवास रहता। हर
व्रती यह कठिन परीक्षा देती है तब जाकर छठि मैया की कृपा की पात्र बनती है। सोने से पहले दीदी सरसों के गरम तेल से माँ के पैरों की मालिश करती
जो घाट पर ठन्डे जल में घंटों खड़े होने की वजह से ठन्डे पड़ जाते थे।
चूँकि कल प्रातः ही अर्घ्य देने घाट पर जाना होता था अतः आज की रात सभी चाचा-चाची
भी तिलैया घर पर ही रुक जाते थे। रात्रि भोजन के बाद बुजुर्गों
के लाख समझाने के बावजूद कि कल सुबह जल्दी उठ कर घाट पर जाना है अतः सभी लोग जल्दी
सो जाए, हममे से कोई भी बच्चा जल्दी सोने की तत्परता नहीं दिखाता, तब तक जब कि कोई
सचमुच ही डाँट न खा जाए।
अगले दिन तड़के ही घाट पर जाने की तैयारी शुरू हो जाती थी। ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय से पहले-पहले ही गांव के युवा अपने सिर
पर दउरा उठाये घाट की ओर चल पड़ते हैं। दउरे उठाये खेतों की मेढ़
पर चल रहे ये पंक्तिबद्ध युवा दूर से नज़र नहीं आते। जो नज़र आता
है वह होता है सूपों पर प्रज्वलित टिमटिमाते दीये जो अँधेरे में एक अलौकिक दृश्य उत्पन्न
करते हैं। इसे देख कर ही इस आनंद की अनुभूति को महसूस किया जा
सकता है- लेखक की व्याख्या यहाँ अपूर्ण ही रहेगी।
सूर्योदय से पहले हम लोग घाट पर पहुँचते। आज
पुनः घाट के किनारों को गंगाजल युक्त जल से धोया जाता। किन्तु
आज सूपों को पूर्वोमुखी सजाया जाता। सभी दीयों को पुनः प्रज्वलित
कर दिया जाता और जब घाट पर मौजूद हज़ारों व्रतियों के सूप के दीये एक साथ प्रज्वलित
होते तो पूरा का पूरा घाट दीयों के प्रकाश में प्रकाशमय हो जाता। इंतज़ार
केवल सूर्य देवता का रहता जिनके लिए व्रतियां पोखर के ठन्डे जल में स्नान कर पुनः ध्यानस्थ
हो जाती-सूर्य-देवता की उपासना में। अन्य व्रतियों के साथ ही
माँ जल में प्रवेश करती। कार्तिक माह के उस ठण्ड में भी वे सभी
व्रतियां स्नान कर सूर्योदय के इंतज़ार में ध्यान लगाए खड़ी रहती। प्रातः
गाये जाने वाले लोक-गीत भिन्न होते जो माँ और अन्य व्रतियां साथ-साथ गाती-
‘सोना
सट कुनिया, हो दीनानाथ हे घूमइछा संसार
आन
दिन उगइ छा हो दीनानाथ आहे भोर भिनसार
आजू
के दिनवा हो दीनानाथ हे लागल एती बेर
बाट
में भेटिए गेल गे अबला एकटा अन्हरा पुरुष
अंखिया
दियेते गे अबला हे लागल एती बेर
बाट
में भेटिए गेल गे अबला एकटा बाझिनिया
बालक
दियेते गे अबला हे लागल एती बेर
लोकगीत का सार यह है कि हे सूरज देवता और दिन तो आप जल्दी आ
कर हमारी पूजा स्वीकार करते हैं। आज आपको विलम्ब क्यों हो रहा
है। हम अबला आपकी बाट जोह रही हैं। छठ के
इन लोक-गीतों से जो तीसरा पाठ हमने पढ़ा वह था प्रकृति से प्रेम का। सूर्य,
नदी, तालाब, पक्षी और समाज से प्रेम करना हमने माँ को छठ पर्व करते देख कर ही सीखा।
सूर्योदय के साथ ही प्रत्येक सूप लेकर बारी-बारी से सूर्य-देवता
को जल और दूध से अर्घ्य दिया जाता था। प्रत्येक सूप के बाद माँ
पुनः स्नान करती और फिर दूसरा सूप उठाती और हम सब पुनः जल और दूध से अर्घ्य देते। यह क्रम सभी सूपों से अर्घ्य देने तक चलता रहता। फिर
वहीं घाट पर आम की लकड़ी प्रज्वलित कर हवन होता और माँ सबों को ठेकुआ प्रसाद देती। प्रातः अर्घ्य के बाद मिथिला में कोशी भरने की भी परंपरा रही है। जिनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं वो छठव्रतियाँ कोशी भरती हैं। घर लौटने से पहले माँ देवी-मंडप रोड में अवस्थित देवी स्थान जाती
और मत्था टेक कर छठ मैया से परिवार पर कृपा बनाये रखने के लिए आग्रह करती और गाती-
कबहुँ
ना छूटी छठि मइया, हमनी से बरत तोहार
तहरे
भरोसा हमनी के, छूटी नाही छठ के त्योहार
छूटी
नाही छठ के त्योहार
छूटी
नाही छठ के त्योहार
छूटी
नाही छठ के त्योहार
छठ पर्व की समाप्ति के साथ ही दिनचर्या वापस पुराने ढर्रे पर
लौट जाता था। हज़ारीबाग से आये सभी रिश्तेदार वापस चले जाते थे
जिससे घर सूना-सूना लगने लग जाता था। छठ के बर्तन पुनः अटारी
पर साल भर के लिए रख दिए जाते थे। चक्की भी रख दिया जाता था। आस-पास के सभी घरों में हम छठ के प्रसाद का वितरण करने जाते और गांव
के लोग घर पर प्रसाद देने आते। एक सद्भाव का वातावरण व्याप्त
रहता था। दूसरे दिन स्कूल खुल जाते थे। सब
कुछ ऐसे बीत जाता था मानो एक सपना देखा था।
वर्षों छठ पर्व मनाने का यह क्रम चलता रहा। तब
जेहन में कभी यह ख्याल नहीं आता था कि 'छूटी
नाही छठ के त्योहार' एक वास्तविकता बन कर सामने आ जाएगी। वक़्त
हावी हो जायेगा, माँ वृद्ध हो जाएगी और इस कठिन व्रत को करने में अशक्त। यह परंपरा कभी टूट जाएगी। पर यही विधि का विधान
है। एक सपना सा सब टूट गया सब छूट गया। किन्तु इस पर्व से हमने अपनी संस्कृति को समझा- वसुदेव कुटुम्बकम के वास्तविक
अर्थ को समझा और समझा एक हिन्दू होने के सही मायने को। छठ के
इस व्रत ने हमें अपनी संस्कृति पर गर्व करना सिखाया अहंकार नहीं। समाज
में सभी तबके और धर्म के लोगों के साथ रहना सिखाया।
काल के फलक पर मुट्ठी से फिसलते रेत को पकड़ने की कवायद में
मैं अब छठ के अवसर पर अपने ससुराल पटना जाता हूँ जहाँ मम्मी छठ व्रत करती है। अपने बच्चों को इस संस्कृति से रु-ब-रु करवाने के लिए यह मेरा छोटा
सा प्रयोग और प्रयास है। प्रार्थना करता हूँ यह परंपरा अधिक से
अधिक वर्षों तक बनी रहे। यह सपना न टूटे।












