पूस का पुसालु और ‘बाहर’ खाने का आनंद
पौष मास में झारखण्ड में ‘पुसालु’ का प्रचलन काफी पुराना रहा है। पुसालु
याने वनभोज याने पिकनिक। प्रकृति ने झारखण्ड को अपार वन-सम्पदा से संवारा है
- यहाँ घने जंगल हैं तो ऊंचे-ऊंचे पहाड़ भी है और इन पहाड़ों से होकर बहने वाले झरने
भी। झारखण्ड के इन प्राकृतिक वादियों की गोद में पिकनिक मनाने से अनेक यादें जुडी
हैं। बचपन में प्रत्येक वर्ष हम नववर्ष का स्वागत पुसालु अथवा पिकनिक मना कर किया
करते थे। झारखण्ड आदिवासी बहुल राज्य है जहाँ वनभोज मनाने के अपने तरीके हैं। यहाँ
वनभोज 'पुसालु' की तरह मनाया जाता है न कि 'पिकनिक' की तरह। कहने का मतलब यह कि
यहाँ 'पुसालु' का यह कार्यक्रम किसी पार्क में नहीं आयोजित होता है, और न ही इसमें
घर से बना-बनाया खाना लेकर जाया जाता है। यह वर्ष का वह समय होता है जब देश के
अन्य क्षेत्र भले ही घने कोहरे में ढंके हों, किन्तु झारखण्ड में आपके स्वागत में गुनगुनी
धुप सदा खिली रहती है, जहाँ आप प्राकृतिक वादियों के बीच 'पुसालु' का आनंद उठा सकते
हैं। हमलोगों के लिए 'पुसालु' का यह कार्यक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण होता था क्योंकि
वर्ष का यह वह समय होता था जब हमें अपने बड़े भैया का हॉस्टल से घर आने का इंतज़ार रहता
था - सर्दियों में सैनिक स्कूल में भी अन्य स्कूलों की ही तरह छुट्ठी होती थी और 'पुसालु'
पर बड़े भैया हम सब के साथ होते थे।
नव-वर्ष पर पापा हम सब बच्चों को 'पुसालु' पर अवश्य ले जाते थे - कभी जवाहर डैम, तो कभी तिलैया डैम, कभी टाइगर फॉल्स तो कभी हज़ारीबाग वन अभ्यारण्य। ये सभी प्राकृतिक स्थल उस क़स्बे से दस से बीस किलोमीटर की दूरी पर ही थे। एक दिन पहले से ही पुसालु की समस्त तैयारी कर ली जाती थी। प्रातः जीप पर लकड़ियों का गट्ठर, खाना बनाने के बर्तन, खाना परोसने के लिए पत्ता प्लेट और दौने के अलावे खाने की समस्त सामग्री लादकर हम बच्चे बेसब्री से पापा के तैयार होने का इंतज़ार करते। घर पर सेवक (नौकर) थे किन्तु इस अवसर पर पापा उन्हें साथ नहीं लेते। 'पुसालु' के दरम्यान सभी कार्य हम बच्चे खुद करते। इन आवश्यक सामानों के अलावे हम अपने खेलने के सामान भी लेकर जाते। तिलैया डैम में डैम के निकट किराये के बोट से हम बराकर नदी क्रॉस कर दूसरी ओर उतरते। बोटवाले को शाम का समय देकर पापा 'पुसालु' के लिए उचित स्थान की तलाश करने चल पड़ते और हम सब बच्चे उनके पीछे-पीछे सामान उठाये चलते। एक ऐसा स्थान जो साफ़-सुथरी एवं निरापद हो जहाँ अनावश्यक भीड़ न हो पर जहाँ पानी की उपलब्धता हो, वहां डेरा डालने का आदेश होता। हम सब अपना-अपना बोझ वहीं उतारते। पत्थरों की मदद से पापा चूल्हा जोड़ते और फिर बाल्टी लेकर पानी लेने चल पड़ते। भैया का काम पापा के कार्यों में हाथ बंटाना होता था। हम तीन जूनियर मेंबर चादर फैला कर बिछा देते। बर्तन के गट्ठर को खोल दिया जाता। माँ दोनों दीदियों की मदद से लकड़ियों के गट्ठर को खोल कर चूल्हा जला लेती और चाय की केतली चूल्हे पर चढ़ा देती। फिर दूसरे कार्य यथा चावल की सफाई, सलाद काटने आदि कार्य दीदियों के जिम्मे करती। हम तीन जूनियर मेम्बरों का काम माँ के आर्डर का पालन करना होता था। जो भी निर्देश होता पूरा करते- पापा को चाय दो, पत्तल और दौने को पानी से धो कर ले आओ आदि ऐसे ही अन्य ऊपरी काम माँ हमारे जिम्मे करती। एक बार माँ के निर्देशों से फारिग हुए तो फिर क्रिकेट के खेल में रम जाते। टेम्पररी पिच तैयार करने में हमें अधिक समय नहीं लगता। किसी भी मोटे तने वाले पेड़ का विकेट बना हम अपना खेल शुरू कर देते। दीदी माँ के साथ काम में हाथ भी बंटाती और ट्रांजिस्टर पर हिंदी गाने भी सुनती-'बिनाका गीत माला' के वार्षिक कार्यक्रम का रिपीट ब्रॉडकास्ट अथवा विविध-भारती पर लोकप्रिय हिंदी फ़िल्मी गाने। डेढ़-दो बजे तक भोजन तैयार हो जाता और तब माँ बच्चों को भोजन करने आने के लिए हाँक लगाती- ज़मीन पर अखबार बिछा कर पत्तल और दौने सजा दिए जाते और माँ सभी बच्चों को खाना परोसती। बचपन में पत्तल में खाना बड़ा ही दुरूह कार्य था- कब शोरबा किस ओर से बह जाए पता नहीं चलता था। पापा यह देख-देख हँसते थे। यहीं अनुभव काम आता है। अनुभव से हमने यह सीखा कि यदि दो पत्तल साथ जोड़ लिए जाएँ तो न किसी लीकेज का डर रहता है और न ही शोरबा के इधर-उधर बाह जाने का भय।
नव-वर्ष पर पापा हम सब बच्चों को 'पुसालु' पर अवश्य ले जाते थे - कभी जवाहर डैम, तो कभी तिलैया डैम, कभी टाइगर फॉल्स तो कभी हज़ारीबाग वन अभ्यारण्य। ये सभी प्राकृतिक स्थल उस क़स्बे से दस से बीस किलोमीटर की दूरी पर ही थे। एक दिन पहले से ही पुसालु की समस्त तैयारी कर ली जाती थी। प्रातः जीप पर लकड़ियों का गट्ठर, खाना बनाने के बर्तन, खाना परोसने के लिए पत्ता प्लेट और दौने के अलावे खाने की समस्त सामग्री लादकर हम बच्चे बेसब्री से पापा के तैयार होने का इंतज़ार करते। घर पर सेवक (नौकर) थे किन्तु इस अवसर पर पापा उन्हें साथ नहीं लेते। 'पुसालु' के दरम्यान सभी कार्य हम बच्चे खुद करते। इन आवश्यक सामानों के अलावे हम अपने खेलने के सामान भी लेकर जाते। तिलैया डैम में डैम के निकट किराये के बोट से हम बराकर नदी क्रॉस कर दूसरी ओर उतरते। बोटवाले को शाम का समय देकर पापा 'पुसालु' के लिए उचित स्थान की तलाश करने चल पड़ते और हम सब बच्चे उनके पीछे-पीछे सामान उठाये चलते। एक ऐसा स्थान जो साफ़-सुथरी एवं निरापद हो जहाँ अनावश्यक भीड़ न हो पर जहाँ पानी की उपलब्धता हो, वहां डेरा डालने का आदेश होता। हम सब अपना-अपना बोझ वहीं उतारते। पत्थरों की मदद से पापा चूल्हा जोड़ते और फिर बाल्टी लेकर पानी लेने चल पड़ते। भैया का काम पापा के कार्यों में हाथ बंटाना होता था। हम तीन जूनियर मेंबर चादर फैला कर बिछा देते। बर्तन के गट्ठर को खोल दिया जाता। माँ दोनों दीदियों की मदद से लकड़ियों के गट्ठर को खोल कर चूल्हा जला लेती और चाय की केतली चूल्हे पर चढ़ा देती। फिर दूसरे कार्य यथा चावल की सफाई, सलाद काटने आदि कार्य दीदियों के जिम्मे करती। हम तीन जूनियर मेम्बरों का काम माँ के आर्डर का पालन करना होता था। जो भी निर्देश होता पूरा करते- पापा को चाय दो, पत्तल और दौने को पानी से धो कर ले आओ आदि ऐसे ही अन्य ऊपरी काम माँ हमारे जिम्मे करती। एक बार माँ के निर्देशों से फारिग हुए तो फिर क्रिकेट के खेल में रम जाते। टेम्पररी पिच तैयार करने में हमें अधिक समय नहीं लगता। किसी भी मोटे तने वाले पेड़ का विकेट बना हम अपना खेल शुरू कर देते। दीदी माँ के साथ काम में हाथ भी बंटाती और ट्रांजिस्टर पर हिंदी गाने भी सुनती-'बिनाका गीत माला' के वार्षिक कार्यक्रम का रिपीट ब्रॉडकास्ट अथवा विविध-भारती पर लोकप्रिय हिंदी फ़िल्मी गाने। डेढ़-दो बजे तक भोजन तैयार हो जाता और तब माँ बच्चों को भोजन करने आने के लिए हाँक लगाती- ज़मीन पर अखबार बिछा कर पत्तल और दौने सजा दिए जाते और माँ सभी बच्चों को खाना परोसती। बचपन में पत्तल में खाना बड़ा ही दुरूह कार्य था- कब शोरबा किस ओर से बह जाए पता नहीं चलता था। पापा यह देख-देख हँसते थे। यहीं अनुभव काम आता है। अनुभव से हमने यह सीखा कि यदि दो पत्तल साथ जोड़ लिए जाएँ तो न किसी लीकेज का डर रहता है और न ही शोरबा के इधर-उधर बाह जाने का भय।
इस अवसर पर कोडक कैमरा से श्वेत-श्याम तस्वीरें
खींची जाती जिसके लिए हम तरह-तरह के पोज बनाते। कभी-कभी मोनो-एक्ट
प्ले का कार्यक्रम रखा जाता जिसमें हमे से कुछ न कुछ परफॉर्म करना होता- कोई गाना गाता,
कोई नाचता तो कोई एक्टिंग करता। ये सब करते-करते शाम ढल जाती
और लौटने का समय हो आता। समस्त यादों को समेटे हम घर लौट आते
और अगले वर्ष का इंतज़ार करते- एक नए स्थान पर एक नए तरीके से 'पुसालु' मनाने का इंतज़ार।
आज जब मैं इन भूली-बिसरी यादों को पुनः संजोने
की कोशिश करता हूँ तो मुझे लगता है कि 'पूस का पुसालु' हम बच्चों को झारखण्ड की संस्कृति
से परिचित कराने का पापा का एक छोटा सा प्रयोग था। आज चालीस
साल बाद मुझे लगता है पापा अपने प्रयोग में निश्चय ही सफल रहे थे- तभी तो आज भी मैं
स्वयं को झारखण्ड की मिटटी से जुड़ा पाता हूँ। अपनी मिटटी से
दूरी की यह टीस ही है जो मुझे यह ब्लॉग लिखने को प्रेरित करता है।
पुसालु के द्वारा पापा परिवार के सभी सदस्यों के बीच एक गहरा बॉन्डिंग स्थापित
में भी सफल रहे थे। तीसरे 'पुसालु' में सभी काम हम बच्चों
पर छोड़ पापा ने न केवल हमें श्रम की गरिमा का महत्व समझाया वरन कठिन परिस्थितियों में
धैर्य न खोने का पाठ भी पढ़ाया। 'पुसालु' के दौरान छोटे-छोटे
टास्क देकर पापा ने हर बच्चे का उसकी क्षमता से परिचय करवाया। हममे
सही सोच की प्रवृति जागृत हो इसमें ये छोटे-छोटे टास्क काफी कारगार साबित होते थे-ऐसा
मुझे आज लगता है। एक साल पापा ने जब अपने माइंस- बिशोधर माइका
माइंस पर पिकनिक का आयोजन रखा तब भी माइंस के खनिकों की मौजूदगी के बावजूद सारा काम
हम बच्चों के जिम्मे ही था। कोडरमा संरक्षित वन में बिरहोर
आदिवासियों से मुलाकात और उनसे जंगली मुर्गा खरीद कर वनभोज मनाने का रोमांच ही कुछ
और था। इस संरक्षित वन में हिरण, खरगोश और अन्य जीव जंतुओं
को देखना भी एक अविस्मरणीय अनुभव था।






No comments:
Post a Comment