“जैसे चंदा और किरण का, जैसे
बदली और चमन का, जैसे धरती और गगन का,
जैसे सुभद्रा और किशन का, कि राखी बंधन है ऐसा,
कि राखी बंधन है ऐसा”-
सुबह सवेरे रेडियो सीलोन पर बज
रहे ऐसे हिंदी फ़िल्मी गानों से ही राखी के त्यौहार का स्वागत होता था उन दिनों। राखी के त्यौहार से बचपन की ढेर सारी यादें जुडी हैं। ख़ासकर मुझे वर्ष भर राखी के त्यौहार का इंतज़ार रहता था- वो इसलिए
क्योंकि इसी दिन मेरा जन्मदिन भी पड़ता था- हिंदी तिथि के अनुसार।
मैं स्वयं को भाग्यशाली मानता था जब माँ बताती कि इस दिन पांच-पांच बहनों को
एक और भाई की कलाई पर राखी बांधने का अवसर मिला था। उन दिनों
हम सब बाउजी और बड़ी माँ के साथ ही रहते थे। पांच बहनों के
अलावे पांच भाइयों के बीच तब मैं सबसे छोटा भाई था।
बाद के
वर्षों में भी जब हमलोग अलग घर में आये तब भी रक्षाबंधन के दिन हम सब ‘ऊ-डेरा’ जाते
थे और न केवल रक्षाबंधन पर दीदियों से राखी बंधवाते वरन बड़ी माँ से मैं अपनी जन्मदिन
की अतिरिक्त मिठाई भी पाता। मजेदार बात यह थी कि एक ओर मैं
माँ से पैसे लेकर बहनों को राखी में उपहार देता और दूसरी ओर मुझे बहनों से राखी पर
जन्मदिन के उपहार मिलते थे। जैसा कि रिवाज़ था उस दिन घर पर
माँ विशेष व्यंजन तैयार करती -खीर, पूरी, और भी न जाने कितने सारे व्यंजन। जन्मदिन पर बाहर होटल में जाकर खाने का रिवाज़ तब शायद नहीं था। साथ में होता हलवे का केक। उन दिनों झुमरी-तिलैया
जैसे उस छोटे से कस्बे में केक की कोई दूकान नहीं हुआ करती थी। अतः
हलवा बनता और उसे केक का स्वरुप दिया जाता था। जन्मदिन के
नए कपडे पहन जिस बच्चे का भी जन्मदिन हुआ करता वो उसी हलवा केक को काटता और इस प्रकार
जन्मदिन संपन्न होता। बहुदा पापा, बाउजी, बड़ी माँ अथवा माँ
से आशीर्वाद में दो-एक रुपये
मिल जाते जो हमारे लिए एक बड़ी रकम हुआ करती थी। दिन भर हम
राखी बांधे घूमते और संध्या बाद ही उसे उतारते।
अगस्त माह में रक्षाबंधन के त्यौहार
के साथ ही हिन्दू पर्वों का सिलसिला जो शुरू होता
है
वो छठ एवं गौशाला मेला के बाद नवंबर
में ही समाप्त होता है। किन्तु इस दरम्यान पड़ने वाले हर पर्व
को हम सब बहुत ही उल्लास के साथ मिलजुल कर मनाया करते थे- तीज, जीवित्पुत्रिका व्रत,
अनंत चतुर्दशी, विश्वकर्मा पूजा, दुर्गा पूजा, काली पूजा, लखि पूजा, दीपावली, गोवर्धन
पूजा, चित्रगुप्त पूजा, भाई-दूज, छठ और अंत में गोशाला मेले के बाद ही त्योहारों का
यह सिलसिला समाप्त होता। जन्मदिन तो हम आज भी मनाते हैं किन्तु
रक्षाबंधन पर सावन पूर्णिमा के दिन जन्मदिन मनाने को लेकर वह जोश और उल्लास अब नहीं
रहा जो बचपन में कभी हुआ करता था। यादें तमाम सारी हैं- शेष
फिर कभी।
No comments:
Post a Comment