जीवित्पुत्री महाभागे जीवन्तु मम पुत्रिका: आयुवर्धेय पुत्राणा पत्युश्च मम सर्वदा
नमस्ते नृप शार्दूल राजन जीवूतवाहन पतिपुत्र जनोत्कर्ष वर्ध्यस्व
जनेश्वर
हिन्दी पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवितपुत्रिका व्रत मनाया जाता
है। बचपन से माँ को यह पर्व करते देखा है। आज माँ शारीरिक तौर पर अस्वस्थ हैं और यह
व्रत रखने में असक्षम। किन्तु एक समय था जब इस व्रत की तैयारी वो पूरे मनोयोग से करती
थी। एक दिन पहले नहाय-खाय का रस्म निभाने के बाद व्रत वाले दिन वो प्रातः ही नहाकर
पूजा की तैयारी में लग जाती थी। कुछ महिलाएं प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर ‘सरगही’ करती हैं –यानि सूर्योदय से पूर्व
दूध और पानी पी लेती हैं ताकि पूरे दिन के उपवास में किसी प्रकार की कोई कठिनाई न हो।
किन्तु माँ को मैंने कभी ‘सरगही’ करते नहीं देखा। व्रत के दिन स्वयं उपवास पर रहते हुए
भी मैंने उन्हें अपने बच्चों को तीनों वक़्त का खाना स्वयं बनाकर देते हुए देखा है।
बहरहाल इस व्रत की तैयारी में मुख्य काम पूजा का प्रसाद बनाने का ही रहता था-
ठेकुवा और पडेकिया (जिसे यहाँ गुझिया कहते हैं), जो इस व्रत का मुख्य प्रसाद होता है। बाज़ार से मंगाए गए
फलों को अलग से धोकर रख लेती थी। फिर पूजा-घर में धुले हुए शुद्ध ईंटों को जोड़कर आम
की लकड़ी के चूल्हे पर ठेकुवा और पडेकिया प्रसाद बनाती थी। पहले गुड़ के जल से ठेकुवा
के लिए आटा गूथती। फिर सूजी और चीनी को भूनकर पडेकिया की ‘फिलिंग’ तैयार करती। इसके बाद साँचे में
ठेकुवा को ठोक कर गरम घी में तलती जाती। इसके बाद गुजिया तले जाते। बचपन में हम सभी
भाई-बहन पूजा घर के दरवाजे पर बैठकर कौतूहल से माँ को ये सब करते हुए टुकुर-टुकुर देखते
रहते। हमलोगों के लिए पूजा घर में प्रवेश वर्जित था। पूजा की किसी भी सामग्री को हाथ
लगाना भी वर्जित था। शुद्ध घी में ठेकुवा और पडेकिया के तलने से फिजा में फैलती खुशबू
हमें बेचैन करती किन्तु उस दिन मन मसोस कर रह जाना पड़ता था। संध्या समय पूजा की तैयारी
करती- एक चौकोर चौकी पर सूते की बनी हुई एक जीवित-पुत्रिका की प्रतिमा रखती। उसके पार्श्व
में कुशा से जीवुतवाहन की प्रतिमा रखती। एक थाल में पूजा के सामान सजाती। गीली मिट्टी
से सियार और अन्य जानवरों की मूर्तियाँ बनाती और पूजा स्थान पर रखती थी। फिर पूजा की
किताब से व्रत की कथा का पाठ करती, आरती करती और फिर पूजा समाप्त कर हम सबों के लिए रात्रि
का भोजन बना कर हमें खिलाने-पिलाने के बाद ही शयन को जाती। स्वयं पूरे दिन निर्जला
रहती थी- यानि उपवास के साथ साथ जल पीना भी उनके लिए इस दिन निषेद्ध था, किन्तु हम सबों को रात्रि का भोजन
भी स्वयं बनाकर खिलाती थी- कभी बाज़ार का खाना खिलाकर नहीं सुलाया। जब भी हममें से किसी
पर कोई विपत्ति आई और हम उस विपत्ति से उबरे तो ईश्वर के साथ-साथ माँ को भी याद किया।
आस-पास की औरतें कहा करती थी- ‘इनके बच्चों की विपत्ति क्यों न टले जब इसकी माँ ‘खर-जीतिया’ का व्रत रखती है। ‘जीतिया व्रत’ के दिन जो व्रती माताएँ ‘खर’ (घास का एक तिनका) तक जबान पर न ले उनके लिए ‘खर-जीतिया’ शब्द का प्रयोग होता है। आज भले
ही माँ यह व्रत रखने में शारीरिक रूप से असक्षम हो किन्तु इसमें दो मत नहीं कि उनका
आशीर्वाद हम पर सदा बना रहेगा।
