Thursday, 19 November 2020

जीवन के रंग, अपनों के संग: छूटी नाही छठ के त्योहार’ (19/11/2020)












बिहार में दो त्योहारों का विशेष महत्व है - एक होली और दूसरा छठदोनों ही पर्व ऐसे हैं जब बिहारी अपने देस गांव घर की ओर लौटता है- चाहे इसके लिए उसे कितनी भी जुगत बिठानी क्यूँ न पड़ेछठ व्रत के प्रति बिहारियों के प्रेम का आलम यह है कि बिहार जाने वाले भारतीय रेल के किसी भी ट्रेन में चार महीने पहले टिकट बुक हो जाते हैंदिल्ली रेलवे स्टेशन पर पटना और दरभंगा के लिए सामान्य टिकट का अलग से काउंटर खोल दिया जाता हैसारे के सारे एयरलाइन्स इस समय पटना के फ्लाइट के टिकट के दाम बढ़ा देते हैं ताकि आर्थिक नुकसान की भारपाई हो सकेबिहार अपने घर इस पर्व को मनाने के लिए बिहारी किसी भी साधन का इस्तेमाल करता है- चाहे वह बस हो अथवा फिर कोई अन्य साधन जिसमे बेशक उसे अपनी यात्रा तोड़-तोड़ कर पूरी करनी पड़े-वह ऊफ्फ तक नहीं करताइसे ही बिहारी जीवटता कहते हैंइसी जीवटता का तो कमाल है कि संघ लोक सेवा आयोग की सबसे कठिनतम परीक्षा यानि सिविल सर्विसेज परीक्षा में भी इस प्रान्त के युवा सदा हर साल अव्वल आते रहे हैंबिहारी ने एक बार ठान लिया तो बस ठान लिया

मेरा मानना है छठ व्रत वस्तुतः एक सामुदायिक अनुष्ठान हैयह एक ऐसा व्रत है जिसे प्रधानतः महिलाएं आपस में मिलजुल कर करती हैं; हालाँकि पुरुषों द्वारा इस पर्व को करने में कोई निषिद्धिता नहीं हैएक समय किसी भी गांव में चंद छठव्रती ही होती थी और पड़ोस के शेष घर इनकी मदद करता थाएक-एक व्रती के ऊपर पड़ोस के चाचा-ताऊ के घर की सूप का भी जिम्मा रहता थाप्रत्येक व्रती दर्जनों सूपों के साथ सूर्य-देवता के अर्घ्य की तैयारी करती जिसे विधिपूर्वक संपन्न कराने में पड़ोस की चाची-ताई आदि का 24X7 का सहयोग रहता थाअब यह पर्व घर-घर में मनाने का रिवाज़ सा चल पड़ा हैऐसा संभवतः इसलिए हुआ क्योंकि गत कुछ वर्षों में छठ व्रत करने के नियम और परम्पराओं  में आमूल-चूल परिवर्तन हुए हैं- इस हद तक कि छठ का वास्तविक स्वरुप ही बदल गया हैअब यह आस्था का वह कठिन पर्व नहीं रह गया है जिसे हमने बचपन में माँ को करते देखा थासंभव है मैं अपने विश्लेषण में कुछ कटु लगूँ पर जिस प्रकार आजकल लोगों ने इस पर्व को सोशल मीडिया तक घसीट लिया है, लगता ही नहीं यह वही छठ पर्व है जिसे हम बचपन से देखते और मनाते आये हैं- न वह सादगी और सरलता रही है न वह संयम और संयततावक़्त के साथ छठ पर्व करने में बहुत बदलाव हुआ है जिसे सुधि पाठकगण जैसे-जैसे इस संस्मरण को पढ़ते जायेंगें, महसूस करेंगेंमगध, मिथिला और भोजपुर के ग्रामीण अंचल से निकल कर यह पर्व पहले बिहार के विभिन्न शहरों में फैला और अब यह न केवल देश के विभिन्न राज्यों में वरन विदेशों तक फ़ैल गया है- 'चाहें रहब देसवा बिदेसवा, छठ करब हम हर बार,छठ करब हम हर बार’- छठ के एक लोक-गीत की यह पंक्तियाँ छठ के प्रति बिहारियों के इसी श्रद्धा भाव को दर्शाता है मेरी समझ से यह इसलिए संभव भी हो पाया क्योंकि एक ओर जहाँ बिहारियों का अपने राज्य से पलायन जारी रहा वहीं इसे मनाने की रीति-रिवाज़ों में इतने परिवर्तन हुए कि अब यह वह कठिन व्रत नहीं रह गया है जिसे महिलाएं सामुदायिक रूप से ही निभा पाती थींपहले यह पर्व ग्रामीण पृष्ठभूमि की महिलाएं ही निभा पाती थीं किन्तु आज इसे शहरों में भी आसानी से किया जा रहा है क्योंकि अब यह पर्व निभाया नहीं वरन अन्य पर्वों की तरह ही धड़ल्ले से मनाया जाता हैमुझे आज भी याद है इस व्रत को उठाने से पहले माँ पड़ोस में गंगा बाबू के घर भाभियों से मदद के लिए कह कर रखती थीजब दीदी का विवाह हुआ तब भी माँ उनकी सास से आज्ञा लेकर बेटी-दामाद को छठ पर बुलाती ताकि दीदी की मदद पूजा में मिल सकेसबों के सहयोग से ही यह पर्व विधि-विधान पूर्वक संपन्न हो पाता थाछठ के इस पर्व से ही बचपन में सामुदायिक ज्ञान का पहला पाठ हमने पढ़ा    

बचपन में देखता था माँ छठ की तैयारी दीवाली के दूसरे दिन से ही शुरू कर देती थीऊ-डेरा  (बाउजी/ताऊजी का घर) में बड़ी माँ भी छठ पूजा रखती थीयह समय ऐसा होता जब स्कूल में बिलकुल मन नहीं लगता था और घर में पूजा की तैयारियां देखने की ललक बनी रहती थीपूजा रूम के बगल वाले कमरे को छठ पूजा के लिए खाली कर दिया जाता थापूजा का सामान इसी कमरे में रखा जाता थासबसे पहले पूजा में प्रयुक्त होने वाले विशेष बर्तनों को अटारी से उतारा जाता- पीतल अथवा कांसे के गगरी, परात, बाल्टी, लोटा, कड़ाही, कड़छुल, थाली, कटोरे, साँचा आदि आदि, साल में सिर्फ इसी मौके में प्रयुक्त होते थेघर के अन्य बर्तनों का प्रयोग पूजा में वर्जित थाइन बर्तनों को धो-धा कर पूजा रूम के बगल वाले कमरे में रखा जातापूजा में प्रयुक्त होने वाले अन्य सामान यथा सूप और गेहूं आदि की खरीदारी माँ बीते रविवार को ही कर लेती थीइस कमरे में ही एक ओर एक चौकी डाल दी जाती थीअगले पांच दिन माँ इसी कमरे में रह कर पूजा की समस्त तैयारी करती और तैयारियां भी कितनी सारीइस रूम में दो-पाटों वाली चक्की को बिठाया जाता गेहूं पीसने के लिए और मिटटी के गिलावे और ईंट से एक अस्थायी चूल्हा तैयार किया जाता दिवाली के बाद से हम बच्चों का पूजा कक्ष में और साथ वाले कमरे में जाना निषिद्ध थापता नहीं अपने मैले हाथ से हम पूजा की किस वस्तु को छू देंबिना स्नान किये इस कमरे में घुसना तो सख्त मना थाछठ पूजा में साफ़-सफाई और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता हैछठ पर्व में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है ताकि भगवान् रुष्ट न हो जाएँहर समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि कहीं कोई बिना हाथ-पैर धोये पूजा की सामग्रियों को छू न देछठ से हमने जो दूसरा पाठ सीखा वह था स्वच्छता की महत्ता का

पहले दिन माँ छठ के लिए खरीदी गयी सूती साड़ी और अन्य कपड़ों को धोती और सुखातीनहाय-खाय से लेकर पूजा की समाप्ति तक सिलाई-मशीन से बिना सिले वस्त्र ही धारण करती थीइसी दिन वो गेहूं बीनती और कंकड़-पत्थर हटातीइस काम में पड़ोस की महिलाएं, जिनके सूप का जिम्मा भी माँ के पास ही होता था, माँ की मदद करती थीअब गेहूं में कंकड़-पत्थर पड़े होने की कल्पना नहीं की जा सकती किन्तु उस ज़माने में गेहूं और चावल में कंकड़ पत्थर के कण होना यह सामान्य सी बात थीफिर माँ इसे धोती और धुले गेहूं को छत पर सूखने के लिए डाल दिया जाता थाहम बच्चों को इसकी निगरानी की ड्यूटी लगती थी ताकि कोई पंछी इसमें चोंच न मार दे

ऊ जे केरवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥

ऊ जे नारियर जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥

अमरुदवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥

शरीफवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥

ऊ जे सेववा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥

सभे फलवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥ 

 

-छठ के लोकगीत में यह प्रसंग आता है जब पंछी से पूजा के फल और अन्य सामग्रियों की सुरक्षा की बात आती हैगेहूं के सूख जाने के बाद घर पर ही इसे पीसा जाता थाकमरे में बैठाया गया चक्की इस काम आता था और इस काम को अंजाम देने में सहयोग करते थे हम सब बच्चे

परन्तु इससे पहले भाई-दूज के बाद माँ नहाये-खाय की तैयारियां करती थीनहाये-खाय का शाब्दिक अर्थ होता है नहा कर खानाइस दिन जो पहला निवाला व्रती के कंठ के नीचे उतरता है उसे वह खुद नहा कर तैयार करती हैचूँकि माँ सुबह से ही पूजा की तैयारी में लग जाती थी अतः हम बच्चों को सुबह का नाश्ता देने की ज़िम्मेदारी पड़ोस में गंगा बाबू के घर की बहुरानियों में से किसी का होता था जो यह काम सुबह-सवेरे कर जाती थीनहाये-खाय की सुबह माँ मिटटी के गिलावे और ईटों की मदद से बने अस्थायी चूल्हे को आम की लकड़ी से चूल्हा जोड़तीअन्य किसी भी पेड़ की लकड़ी इस पर्व में वर्जित हैआजकल पूजा के सारे पकवान गैस स्टोव पर बनाये जाने लगे हैंइस अवसर पर शुद्ध वैष्णव भोजन बनता है जिसमे अरवा चावल, लौकी युक्त चने की दाल, लौकी का ही बचका और घी होता हैलहसून प्याज का उपयोग सर्वथा वर्जित थाइसी प्रकार सामान्य नमक का प्रयोग पूजा में वर्जित थाकेवल सेंधा नमक (पहाड़ी नमक) का ही उपयोग पूजा में किया जाता थापूजा में इस्तेमाल किये जाने वाले कुएं के पानी में गंगाजल छोड़ कर उसे पवित्र किया जाता थाइसी प्रकार हर प्रसाद में तुलसी पत्र छोड़ना अनियार्य थायह सब करते-करते दोपहर का एक बज जाता थामाँ के भोजन कर लेने के बाद हम लोग उसी थाली में भोजन करते थेआम की लकड़ी से जोड़े चूल्हे पर बने इस प्रसाद रुपी भोजन का स्वाद लाजवाब होता था

नहाये-खाय के बाद का दिन 'खरना' अथवा 'लोहंडा' का होता हैइनके शाब्दिक अर्थ क्या हैं नहीं मालूम पर इस दिन हर व्रती पूरे दिन उपवास रखती है और शाम को पूजा के बाद ही प्रसाद ग्रहण करती हैइस दिन सुबह से ही माँ शाम की पूजा के प्रसाद की तैयारी में लग जाती जिसमे खीर और चावल के रोट मुख्य प्रसाद होते हैंपूजा के खीर में गुड़ डलती थीचीनी को अशुद्ध माना जाता है अतः छठ के प्रसाद में इसका उपयोग वर्जित होता हैगांव के कुछ कोइरी-किसान जिनका घर में आना-जाना रहता था, पूजा में उपयोग के लिए बाल्टी-बाल्टी गन्ने का रस घर पर पहुंचा जाते थेइस रस में चावल को छिजा कर 'रसिया' प्रसाद बनता था जो हम सब को गुड़ के खीर इतना ही प्रिय थाकिसी-किसी स्थान पर चावल दाल भी प्रसाद स्वरुप बनाने का चलन हैसुबह से ही माँ चावल बीनने और पूजा के अन्य काम में लगी रहतीदूसरी ओर दो मजदूर सारे दिन गेहूं पीसने का काम करते जिसमे हम बच्चे भी हस्तक्षेप करते थे इन मज़दूरों को भी पूजा के लिए नए और धुले धोती और बनियान मिलतास्नान कर और इन नए परिधान को पहन कर ही वे पूजा वाले कमरे में गेहूं पीसने बैठते थेबीस से पच्चीस किलो गेहूं पीसने में सारा दिन निकल जाता थाबच्चों में यह होड़ लगती कि कौन कितना अधिक गेहूं पीस कर दिखाता हैदो-दो बच्चों के जोड़ी बन जाती थीएक बार हम गेहूं पीसने बैठे तो पाया कि पीसी हुई गेहूं चक्की से निकल ही नहीं रही हैबड़े मामू ने बताया कि हम लोग चक्की को विपरीत दिशा में घुमा रहे थेदस-पंद्रह मिनट का मेहनत यों ही बेकार चला गया थागेहूं पीसने के दौरान यदि किसी को लघु-शंका के लिए जाना पड़ गया तब भी उसे पुनः स्नान कर ही कमरे में प्रवेश की अनुमति मिलती थीशाम को जीप को पानी से धोकर पापा के साथ हममे से दो-तीन बच्चे दूध लाने के लिए निकल पड़ते सुरौ महतो या फिर ज्ञानी महतो की खटाल की ओरइस दिन गाय के दूध की अत्यधिक मांग रहती है और पूरे वर्ष दूध में पानी मिलकर बेचने वाला ग्वाला भी इस दिन शुद्ध दूध ही बेचता हैछठ पर्व का इतना महत्व होता था कि इस दिन वो अपने रोज़ के ग्राहक को छोड़ कर सारा दूध व्रतियों को ही देताअब मदर डेरी के दूध का इस्तेमाल भी लोग करने लग गए हैं किन्तु उस दौर में मिल्क पॉवडर अथवा अप्राकृतिक दूध का पूजा में प्रयोग सर्वथा निषिद्ध थाघर पर भी गाय के दोनों टाइम का दूध पूजा के लिए रखा जाता थाशाम पुनः आम की लकड़ियों से माँ चूल्हा जोड़ती और खीर बनाने की तैयारी शुरू करती जितने सूप उतने ही मिटटी के खप्पड़ और उतने ही तिलक, और पूजा में प्रयुक्त होने वाली अन्य वस्तुएंखरना पूजा में शामिल होने हज़ारीबाग से सारे चाचा, चाची तिलैया अवश्य आते थेऔर यह वह समय होता जब बच्चों की संख्या और उनके उपद्रव में वो बेतहाशा वृद्धि होती थी जिसे याद कर आज भी गुदगुदी होती है- पास के खेतों से गन्ने तोड़ कर खाने से लेकर घाट का मुआयना करने या फिर आपस में दौड़-भाग करने में समय कब निकल जाता था पता ही नहीं चलता थादोनों डेरा एक हो जाता था और छठ के लोकगीत के बीच खीर का प्रसाद बनता था-

'रूनकी-झुनकी बेटी मांगी, पढ़ल पंडित दामाद हे छठि माता,

घोड़वा चढन को बेटा माँगिल, सेवा करन को पतोहु हे छठि माता'

- ऐसे और अन्य कई लोकगीत अब भी मन-मस्तिष्क पर छाये हैंपूजा का प्रसाद बन जाने के बाद खरना पूजन होता हैखरना पूजा की समाप्ति पर पूजा का प्रसाद सबसे पहले व्रती ही ग्रहण करती हैपूजा के इस प्रसाद से ही वो अपना उपवास तोड़ती हैनियम यह है कि जब व्रती प्रसाद ग्रहण कर रही हो तो किसी भी जीव के किसी भी प्रकार का स्वर उसके कान तक न पहुंचेयदि कोई कुछ बोलता है और वह स्वर व्रती के कानों में पड़ता है तो वो वहीं भोजन करना छोड़ देती हैयही यह व्रत का नियम हैचूँकि इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद अगले छत्तीस घण्टे व्रती को पुनः उपवास पर रहना होता है अतः लोग इस समय संयम बरतते हैं और बात-चीत नहीं करते हैंबच्चों को दूर भेज दिया जाता हैगोदवाले छोटे बच्चों को महिलाएं लेकर अलग हो जाती हैं ताकि यदि वो रुदन करे तो उसका स्वर व्रती के कानों तक न जा पाएकहीं-कहीं तो ढोल-नगाड़ों से अन्य सारे स्वर को दबा दिया जाता हैमुझे याद नहीं माँ का व्रत कभी हम बच्चों की शोर की वजह से टूटा होइसी प्रकार भोजन करते समय यदि कोई कंकड़ का टुकड़ा दाँतों तले आ जाए तब भी व्रती भोजन त्याग देती थीउन दिनों बिजली गुल होना आम बात थी और ऐसे में भूल से भी यदि कोई पतंगा खाने में गिर जाए तब भी व्रती को भोजन त्याग देना पड़ता थाअतः इस समय व्रतियों को विशेष ध्यान रखना पड़ता थापूजा के बाद हम सब पूजा वाले कमरे में जाते और खप्पड़ और उसके सामने जलते दीये के समक्ष साष्टांग प्रणाम कर हर वो मांग रख देते जिसकी हमें आकांक्षा रहती थी- भगवानजी, परीक्षा में अच्छे मार्क्स दिला देना, भगवानजी अगले क्रिकेट मैच में मैं सबसे अधिक रन बनाऊं आदि आदिइसके बाद माँ के सामने साष्टांग होतेमाँ भाइयों को भस्म का तिलक लगा कर और बहनों को रोली के टीके लगाकर आशीर्वाद देती थीफिर हम सब बच्चो में माँ के छोड़े प्रसाद को खाने की होड़ लगती थीइस प्रसाद से सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं- ऐसा कहते थेहमारे ससुराल में इस प्रसाद पर केवल बहनों का ही हक़ होता है जबकि खप्पड़ में चढ़ाये गए प्रसाद पर भाइयों का हक़ रहता थागरज़ यह कि कोस-कोस में प्रचलनों में छोटे-छोटे परिवर्तन होते रहते हैं'खरना' अनुष्ठान का समापन भी लोक-गीतों से ही होता थाव्रती लोक-गीत गाती और अन्य महिलाएं उनके स्वर में स्वर मिलाती

खरना के बाद का दिन संध्या अर्घ्य का होता हैइस दिन पुनः सुबह से ही पूजा की चहल-पहल शुरू हो जाती थीपड़ोस से भाभियाँ पूजा का प्रसाद तैयार करने के लिए आ जाती थीइसके लिए उन्हें सुबह स्नान कर बिना चाय-नाश्ता किये आना होता थादीदी के जिम्मे घर के शेष लोगों के लिए नाश्ता बनाने का काम होताहममे से कुछ बच्चे भी सुबह बिना चाय-नाश्ता किये, नहा-धो कर ठेकुआ ठोकने में लग जाते थेठेकुआ ठोकने के लिए सांचे होते हैं जिस पर एक-एक लोई को हाथों से दबा कर ठेकुआ का स्वरुप दिया जाता हैपर सबसे जटिल काम जो होता था वह था ठेकुआ के लिए आटा सानने (गूथने) कातरल गुड से आटे को साना (गूंथा) जाता था जो काफी मशक्कत का काम होता हैदो महिलाएं आटा सानने (गूथने) में, दो-तीन महिलाएं और बच्चे ठेकुआ ठोकने में और दो महिलाएं ठेकुआ तलने में सुबह सात-आठ बजे से लगती थी तब जा कर बारह-एक बजे तक पच्चीस किलो आटे का ठेकुआ तैयार होता थामाँ प्रत्येक ठेकुवे पर रोली से टिकती और लौंग लगाती चली जाती थीघर पर खरना पर तैयार होने वाले खीर प्रसाद अथवा पूजा के लिए बनने वाला ठेकुआ में माँ ने कभी कोई फर्क नहीं किया जैसा कि आमतौर पर 'समझदार' लोग करते हैं-खुद खाने के लिए अलग प्रसाद बनाते हैं और बांटने के लिए अलग प्रसाद बनाते हैं

सुबह जीप को पुनः धोया जाता और दो-तीन बच्चे पापा के साथ छठ के लिए फल खरीदने बाजार जाते थेघंटे भर में फल आ जाता था जिसे कुएं पर ले जाकर धोया जाता और धोने के उपरांत ही इन फलों को पूजा वाले कमरे में रखा जाताबच्चों का एक दस्ता सुबह घाट को जाता था और अर्घ्य के लिए अनुकूल स्थान का चयन करताजरूरत पड़ने पर एक कुली की मदद से घाट के एक भाग को इस प्रकार चौरस किया जाता कि माँ को जल में प्रवेश करने में कोई परेशानी न होइस बात का भी ध्यान रखा जाता था कि कहीं किसी प्रकार का कोई फिसलन न होससुराल में अन्य पटनावासियों की ही तरह गंगा तट पर अर्घ्य दिया जाता हैहालाँकि इस परंपरा को भी बिसराते हुए अब लोगबाग घर पर ही एक कृत्रिम जलाशय बनाकर उसमें अर्घ्य देने लग गए हैं। यह सत्य है कि हमने ही गंगा को प्रदूषित किया है किन्तु यह भी सत्य है कि गंगा को प्रदूषित करने में जितना योगदान औद्योगिक कचड़े का है उसके मुकाबले ऐसे सांस्कृतिक हस्तक्षेप का कुछ भी नहीं हैछठ का जो सम्बन्ध प्रकृति के साथ रहा था वह टूटने लगा हैचक्की के आटे का स्थान मिल के आटे ने ले लिया हैएक वस्त्र की जगह सामान्य वस्त्रों ने ले लिया हैगाय के शुद्ध दूध की जगह मदर डेयरी के दूध से अर्घ्य देने का रिवाज़ चल पड़ा हैआम की लकड़ी की जगह गैस-स्टोव ने ले लिया हैअब वो छठ कहीं छूट गया है जिसे माँ निभाती थी और जिसे हम बचपन से देखते आये हैंआज छठ के नाम पर हम जिस परंपरा को अगली पीढ़ी को सुपुर्द कर रहे हैं उसे देख मन विकल हो उठता है और ह्रदय तार-तारआप किसी भी घाट पर चले जाएँ सर्वत्र बाज़ारवाद व्याप्त हैवह सरलता और सादगी अब कहीं रही नहींलगता है कहीं कुछ दरक सा गया हैआखिर कितनी कृत्रिमता के साथ हम अपनी आस्था को बरक़रार रख पायेंगें

संध्या तीन बजे तक माँ घाट पर जाने के दउरा (टोकड़ी) तैयार कर लेती थीप्रत्येक सूप को सजाया जाता- नारियल और कुछ फल, फूल, अलता, और एक-एक दीपक प्रत्येक सूप पर रखा जाता; फिर सभी सूपों को दउरे में संभाल कर रखा जाताअर्घ्य के लिए गाय का दूध और गंगाजल युक्त जल भी रख लिया जाता थाघाट पर सबों के बैठने के लिए दरी आदि के इंतज़ाम के साथ हम घाट की ओर रवाना होतेशाम तक हज़ारीबाग से हमारे सभी चाचा-चाची बच्चों समेत तिलैया पहुँच जाते थेजीप को धोया जाता और दउरे को उस पर रखा दिया जाता थापापा और माँ के साथ कुछ बच्चे नंगे पैर जीप में बैठ जाते और शेष बच्चे चाचा-चाची के साथ उनकी गाडी में सवार हो जातेइसी समय साथ ही साथ बड़ी माँ भी दउरा और लेकर बाउजी के साथ ऊ -डेरा से एक अन्य गाडी में निकलती और फिर यह पूरा काफिला घाट की ओर चल पड़ता थापहले हम लोग बराकर नदी के जवाहर घाट पर अर्घ्य देने के लिए जाते थेफिर गुमो के महतो-आरा तालाब में छठ पूजा के लिए जाने लगेकभी-कभी नवादा गांव के नहर पर भी अर्घ्य देने जाना हुआगांव में घर के युवा दउरा को अपने सिर पर ढोकर घाट तक ले जाते हैंथोड़े बड़े होने पर हमने भी इस परंपरा को निभाया और दउरे को लेकर चलते हुए घाट पर जाते थेऐसा कर एक अलग ही सुकून और संतोष मिलता थामाँ सारे रास्ते छठ के लोक-गीत गाती-

'कांच ही बांस के बहँगिया, बहँगी लचकत जाये,

होईही देवरजी कहरिया, बहँगी घाट पहुंचाए,

बात जे पूछे ला बटोहिया, बहँगी केकरा के जाए,

तू तो आन्हर रे बटोहिया, बहँगी छठ मैया के जाए

 

घाट से कुछ दूरी पर उतर वो, बड़ी माँ, बद्री चाची और अन्य व्रती पैदल चलने लगती और फिर ये सभी व्रतियां सामूहिक रूप से छठ के लोक-गीत गाना शुरू करती जिससे समां बांध जाता थामुझे अब भी याद है इन गीतों में हर संतान का नाम लेकर छठ माता से कृपा बनाये रखने का निवेदन होता थाजब मेरा नाम लिया जाता था हमारे चेहरे पर एक मुस्कान मुस्कान बरबस खिंच जाती थीहम बच्चों में घाट पर पहुंचने की हड़बड़ी रहती और हम सब दौड़-दौड़ कर आगे निकल जाते थेअस्ताचल सूरज देवता को सम्बोधित कर माँ और साथ की अन्य व्रतियां लोकगीत गाती- 

डूबतो सुरुज के जे पूजे, इहे बाटे हमर बिहार

फलवा दउरवा सजाके, अईनी हम घाट पे तोहार

दिहनी अरघ छठी मईया, करीं हमर आरती स्वीकार

करीं हमर आरती स्वीकार

 

घाट पर पहले गंगाजल युक्त जल से उस भूमि को धोया जाता जहाँ दउरा रखना होता थाफिर सूपों को पंक्तिबद्ध पश्चिममुखी कर रख दिया जाता थारास्ते में बुझ गए दीयों को पुनः प्रज्वलित कर दिया जाता थायह एक बहुत ही सुन्दर दृश्य उत्पन्न करता था जिसकी व्याख्या अवर्णनीय हैगंगाजल युक्त जल छिड़क कर से नदी अथवा पोखर के जल को भी शुद्ध किया जाता और फिर माँ जल में प्रवेश करती और सूर्य का ध्यान करतीसूर्य देवता की पूजा के बाद एक-एक कर सूपों से सूर्य देवता को अर्घ्य दिया जाताअस्ताचल सूर्य के अर्घ्य के साथ ही यह दिन समाप्त होता था

घाट से लौटने के बाद माँ कल प्रातः के दउरे की तैयारी करतीपड़ोस की भाभियाँ और अन्य महिलाएं दउरा सजाने में माँ की मदद करती और इसके बाद छठ के लोक-गीत गाने का कार्यक्रम पुनः चल पड़ता जो रात्रि भोज तक चलताइस पूरे दिन माँ का निर्जला उपवास रहताहर व्रती यह कठिन परीक्षा देती है तब जाकर छठि मैया की कृपा की पात्र बनती हैसोने से पहले दीदी सरसों के गरम तेल से माँ के पैरों की मालिश करती जो घाट पर ठन्डे जल में घंटों खड़े होने की वजह से ठन्डे पड़ जाते थेचूँकि कल प्रातः ही अर्घ्य देने घाट पर जाना होता था अतः आज की रात सभी चाचा-चाची भी तिलैया घर पर ही रुक जाते थेरात्रि भोजन के बाद बुजुर्गों के लाख समझाने के बावजूद कि कल सुबह जल्दी उठ कर घाट पर जाना है अतः सभी लोग जल्दी सो जाए, हममे से कोई भी बच्चा जल्दी सोने की तत्परता नहीं दिखाता, तब तक जब कि कोई सचमुच ही डाँट न खा जाए

अगले दिन तड़के ही घाट पर जाने की तैयारी शुरू हो जाती थीब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय से पहले-पहले ही गांव के युवा अपने सिर पर दउरा उठाये घाट की ओर चल पड़ते हैंदउरे उठाये खेतों की मेढ़ पर चल रहे ये पंक्तिबद्ध युवा दूर से नज़र नहीं आतेजो नज़र आता है वह होता है सूपों पर प्रज्वलित टिमटिमाते दीये जो अँधेरे में एक अलौकिक दृश्य उत्पन्न करते हैंइसे देख कर ही इस आनंद की अनुभूति को महसूस किया जा सकता है- लेखक की व्याख्या यहाँ अपूर्ण ही रहेगी

सूर्योदय से पहले हम लोग घाट पर पहुँचतेआज पुनः घाट के किनारों को गंगाजल युक्त जल से धोया जाताकिन्तु आज सूपों को पूर्वोमुखी सजाया जातासभी दीयों को पुनः प्रज्वलित कर दिया जाता और जब घाट पर मौजूद हज़ारों व्रतियों के सूप के दीये एक साथ प्रज्वलित होते तो पूरा का पूरा घाट दीयों के प्रकाश में प्रकाशमय हो जाताइंतज़ार केवल सूर्य देवता का रहता जिनके लिए व्रतियां पोखर के ठन्डे जल में स्नान कर पुनः ध्यानस्थ हो जाती-सूर्य-देवता की उपासना मेंअन्य व्रतियों के साथ ही माँ जल में प्रवेश करतीकार्तिक माह के उस ठण्ड में भी वे सभी व्रतियां स्नान कर सूर्योदय के इंतज़ार में ध्यान लगाए खड़ी रहतीप्रातः गाये जाने वाले लोक-गीत भिन्न होते जो माँ और अन्य व्रतियां साथ-साथ गाती-

‘सोना सट कुनिया, हो दीनानाथ हे घूमइछा संसार

आन दिन उगइ छा हो दीनानाथ आहे भोर भिनसार

आजू के दिनवा हो दीनानाथ हे लागल एती बेर

बाट में भेटिए गेल गे अबला एकटा अन्हरा पुरुष

अंखिया दियेते गे अबला हे लागल एती बेर

बाट में भेटिए गेल गे अबला एकटा बाझिनिया

बालक दियेते गे अबला हे लागल एती बेर

 

लोकगीत का सार यह है कि हे सूरज देवता और दिन तो आप जल्दी आ कर हमारी पूजा स्वीकार करते हैंआज आपको विलम्ब क्यों हो रहा हैहम अबला आपकी बाट जोह रही हैंछठ के इन लोक-गीतों से जो तीसरा पाठ हमने पढ़ा वह था प्रकृति से प्रेम कासूर्य, नदी, तालाब, पक्षी और समाज से प्रेम करना हमने माँ को छठ पर्व करते देख कर ही सीखा   

सूर्योदय के साथ ही प्रत्येक सूप लेकर बारी-बारी से सूर्य-देवता को जल और दूध से अर्घ्य दिया जाता थाप्रत्येक सूप के बाद माँ पुनः स्नान करती और फिर दूसरा सूप उठाती और हम सब पुनः जल और दूध से अर्घ्य देतेयह क्रम सभी सूपों से अर्घ्य देने तक चलता रहताफिर वहीं घाट पर आम की लकड़ी प्रज्वलित कर हवन होता और माँ सबों को ठेकुआ प्रसाद देतीप्रातः अर्घ्य के बाद मिथिला में कोशी भरने की भी परंपरा रही हैजिनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं वो छठव्रतियाँ कोशी भरती हैंघर लौटने से पहले माँ देवी-मंडप रोड में अवस्थित देवी स्थान जाती और मत्था टेक कर छठ मैया से परिवार पर कृपा बनाये रखने के लिए आग्रह करती और गाती-

कबहुँ ना छूटी छठि मइया, हमनी से बरत तोहार

तहरे भरोसा हमनी के, छूटी नाही छठ के त्योहार

छूटी नाही छठ के त्योहार

छूटी नाही छठ के त्योहार

छूटी नाही छठ के त्योहार  

 

छठ पर्व की समाप्ति के साथ ही दिनचर्या वापस पुराने ढर्रे पर लौट जाता थाहज़ारीबाग से आये सभी रिश्तेदार वापस चले जाते थे जिससे घर सूना-सूना लगने लग जाता थाछठ के बर्तन पुनः अटारी पर साल भर के लिए रख दिए जाते थेचक्की भी रख दिया जाता थाआस-पास के सभी घरों में हम छठ के प्रसाद का वितरण करने जाते और गांव के लोग घर पर प्रसाद देने आतेएक सद्भाव का वातावरण व्याप्त रहता थादूसरे दिन स्कूल खुल जाते थेसब कुछ ऐसे बीत जाता था मानो एक सपना देखा था

वर्षों छठ पर्व मनाने का यह क्रम चलता रहातब जेहन में कभी यह ख्याल नहीं आता था कि 'छूटी नाही छठ के त्योहार' एक वास्तविकता बन कर सामने आ जाएगीवक़्त हावी हो जायेगा, माँ वृद्ध हो जाएगी और इस कठिन व्रत को करने में अशक्तयह परंपरा कभी टूट जाएगीपर यही विधि का विधान हैएक सपना सा सब टूट गया सब छूट गयाकिन्तु इस पर्व से हमने अपनी संस्कृति को समझा- वसुदेव कुटुम्बकम के वास्तविक अर्थ को समझा और समझा एक हिन्दू होने के सही मायने कोछठ के इस व्रत ने हमें अपनी संस्कृति पर गर्व करना सिखाया अहंकार नहींसमाज में सभी तबके और धर्म के लोगों के साथ रहना सिखाया

काल के फलक पर मुट्ठी से फिसलते रेत को पकड़ने की कवायद में मैं अब छठ के अवसर पर अपने ससुराल पटना जाता हूँ जहाँ मम्मी छठ व्रत करती हैअपने बच्चों को इस संस्कृति से रु-ब-रु करवाने के लिए यह मेरा छोटा सा प्रयोग और प्रयास हैप्रार्थना करता हूँ यह परंपरा अधिक से अधिक वर्षों तक बनी रहेयह सपना न टूटे

  


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