आषाढ़ पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा का दिन है- यह वह दिन जब हम अपने
गुरु को याद करते हैं और उनसे प्रेरित होते हैं। माता-पिता के बाद गुरु ही हैं जो हमें
जीवन में चलना सिखाते हैं। मैं अपने इन सभी शिक्षकों का ह्रदय से शुक्रगुज़ार हूँ जो
उन्होंने हमें एक इंसान बनाया। हिन्दू धर्म में मोक्ष प्राप्ति को परम लक्ष्य माना
गया है जिसे पाने के लिए एक सच्चे गुरु की कामना हर गृहस्थ करता है। यह माना जाता है
कि मोक्ष बिना गुरु की मदद और मार्गदर्शन के संभव नहीं है। मेरा मानना है कि मोक्ष
प्राप्ति और परलोक सुधारने से अधिक आवश्यक है कि हम इस धरती पर एक अच्छा इंसान बन कर
दिखाएं। और इस काम को एक शिक्षक ही अंजाम देता है। अतः यह जरूरी है कि समाज में शिक्षकों
को उचित स्थान और सम्मान मिले। जो समाज शिक्षकों का उचित सम्मान नहीं करता वह पतनोन्मुख
है और ऐसे समाज की रक्षा ईश्वर भी नहीं कर सकता।
सन इकहत्तर में छह माह पूर्णिमा बाल विद्या मंदिर में पढ़ने
के बाद घर के बगल में ही जब संत जोसफ स्कूल खुला तो इसमें हमें जून माह में सीधे पहली
कक्षा में दाखिला मिल गया। एंग्लो-इंडियन समुदाय के कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा स्थापित
इस स्कूल का अनुशासन काफी सख्त था। अगले सात साल कान्वेंट स्कूल की सख्त अनुशासन में
बिताने के बाद आठवीं कक्षा में हमारा दाखिला 'गाँधी उच्च विद्यालय' में कराया गया क्योंकि
संत जोसफ स्कूल सरकारी मान्यताप्राप्त स्कूल नहीं था और दसवीं की परीक्षा के लिए यहाँ
के छात्र प्राइवेट छात्र के रूप में पंजीकृत होते थे। अगले तीन साल हमने गाँधी उच्च
विद्यालय में पढ़ाई की। यदि स्कूल में अनुशासन और इंफ्रास्ट्रक्चर की बात की जाए तो
संत जोसफ स्कूल और गाँधी उच्च विद्यालय में जमीन-आसमान का अंतर था। जहाँ संत जोसफ स्कूल
में यूनिफॉर्म में स्कूल आना अनिवार्य
था
वहां गाँधी स्कूल में ऐसी कोई पाबन्दी नहीं थी क्योंकि यहाँ पढ़ने वाले अधिकतर छात्र
पास के गाँवों के गरीब किसान परिवारों से आते
थे। संत जोसफ स्कूल में आपस में भी हिंदी में बातचीत करने की मनाही थी तो गाँधी स्कूल
में अंग्रेजी में कोई बात नहीं करता था या यों कहे बात कर नहीं पाता था। इसी प्रकार
जहाँ संत जोसफ स्कूल में प्रति माह पचीस रुपये फीस ली जाती थी वहीं गाँधी स्कूल में
मासिक फीस के नाम पर मात्र चवन्नी ली जाती थी। जहाँ संत जोसफ स्कूल में प्रत्येक क्लास
में पंखे और बिजली की व्यवस्था थी वहां गाँधी स्कूल में हम प्रकृति की गोद में बैठ
कर पढ़ते थे- न कक्षा में पंखे की व्यवस्था थी और न बिजली का। स्कूल बस की तो बात करना
भी बेमानी था। हम लोग पैदल ही या फिर अपने-अपने साइकिल से स्कूल जाते। संत जोसफ स्कूल
में पाठ्येत्तर गतिविधियों (Extra-curricular activities) के लिए सालाना सौ रुपये अतिरिक्त
लिया जाता था वहीं गाँधी स्कूल में छात्रों पर ऐसा कोई अतिरिक्त आर्थिक अधिभार नहीं
डाला जाता था। संत जोसफ स्कूल में प्रतिदिन प्रातः असेंबली होता जहाँ हम पूरी श्रद्धा
के साथ ईश्वर को याद करते- “Our father, who art in heaven, hallowed be thy name,
Thy Kingdom come, Thy Will be done, On Earth, As it is in Heaven…….…।” किन्तु गाँधी
स्कूल में असेंबली की कोई परिपाटी नहीं थी। जहाँ संत जोसफ स्कूल सरस्वती पूजा में बंद
रहता वहीं गाँधी स्कूल में छात्रों के सहयोग से सरस्वती पूजा मनाया जाता था- एक ही
देश के दो रूप से हमारा परिचय बचपन में ही हो गया था जिसकी अमिट छाप अब तक मन-मस्तिष्क
पर बरकरार है। एक गरीब भारत देस, एक अमीर नेशन इंडिया! यह फर्क ही मुझे
मेरे पैरों को जमीन पर जमाये रखने में मेरी मदद करता है और अहंकार को पास फटकने नहीं
देता।
इतने फर्क के बावजूद यदि शिक्षकों की बात की जाए तो दोनों ही
स्कूल के शिक्षकों में ढेर सारी समानताएं थीं। दोनों ही स्कूलों में शिक्षक बड़ी ही
तन्मयता से इंसान गढ़ने में लगे थे। संत जोसफ स्कूल में हिंदी विषय के हमारे पहले शिक्षक
शर्मा सर थे जिनसे हमने अपने नाम की सही वर्तनी सीखी- कहाँ 'श' (राजेश) लिखना है और
कहाँ स (सहाय) यह उन्होनें ही मुझे बताया। कहने का तात्पर्य यह कि व्यक्तित्व निर्माण
में एक शिक्षक का योगदान इतनी बुनियादी स्तर तक होता है। इसी स्कूल में मिश्रा सर ने
हमें रामायण और महाभारत की कथा से अवगत कराया और साथ ही संस्कृत के न जाने कितने श्लोक
और उसके हिंदी अनुवाद हमें कंठस्थ याद कराये। डेबरुली सर से अंग्रेजी भाषा सीखने का
और डी'क्रूज़ सर से भूगोल की बुनियादी पाठ पढ़ने का मौका मिला। डेरेक पॉवेल सर से विज्ञान
और स्मिथ सर से इतिहास और नागरिक शास्त्र पढ़ा। पर जो महत्वपूर्ण बात थी वह यह कि इस
स्कूल में पहला पीरियड 'मॉरल
साइंस
(नीतिशास्त्र) का होता जहाँ हर धर्म की मूल तथ्यों के बारे में छात्रों को जानकारी
दी जाती थी। डी'क्रूज़ सर की सख्ती, डेबरुली सर का समर्पण, डेरेक पॉवेल सर, सामीन टीचर
एवं ग्रैनी सर आदि सभी शिक्षकों की सहृदयता ये सब वो इंग्रेडिएंट थे जिसे सही मात्रा
में मिश्रित कर वे इंसान तराशने में लगे थे।
गाँधी उच्च विद्यालय में सभी शिक्षक प्रायः अपने-अपने साइकिल
से स्कूल आते। सबों की वेशभूषा
में एक समानता थी- पोशाक के तौर पर सभी का पहनावा परंपरागत धोती कुर्ता ही रहा
करता था सिर्फ अनंत पांडेय सर, जसवंत सिंह और जगदीश सिंह सर को छोड़ कर। यहाँ जिन शिक्षकों
ने हमें शिक्षित किया उनमें अनंत पांडेय सर (गणित), जसवंत सिंह (विज्ञान), धर्मनाथ
सिंह (इतिहास), नारायण सर (नागरिकशास्त्र), कामदेव मिश्रा (भूगोल और अर्थशास्त्र),
राज बल्लभ शर्मा (हिंदी), मिश्रा सर (संस्कृत) और जगदीश सिंह सर (इंग्लिश) के नाम तो
अब तक ह्रदय में टंकित हैं। इनमें से हर एक शिक्षक का पढ़ाने का अपना एक अलग अंदाज़ था।
किताबी ज्ञान मैंने इन सभी शिक्षकों से हासिल किया किन्तु इन सब से परे एक शिक्षक जिन्होंने मेरे व्यक्तित्व को प्रभावित
किया वे थे इस स्कूल के प्रधानाचार्य श्री राधेश्याम यादव जिनके व्यक्तित्व की सादगी
और सरलता का मैं अब भी कायल हूँ। उनके जैसे गुरु को पाकर बरबस कबीरदास की ये पंक्तियाँ
ध्यान आ जाती हैं – “ज्ञान प्रकाशी गुरु मिला,
सो जन बिसरि न जाए, जब गोविन्द दया करी , तब गुरु मिलिया आये”।
हिंदी माध्यम के इस स्कूल के कुछ छात्र उच्श्रृखल प्रवृति के
थे। किन्तु इन्हें साधने में प्रधानाचार्य यादव सर परिस्थितिजन्य जिस सौम्यता और सख्ती
का परिचय देते थे उसने मुझे यह सबक सिखाया कि धरती पर विभिन्न प्रकृति एवं मिज़ाज़ के
लोग मिलेंगें और जब लोगों से मिलो तो उनके मिज़ाज़ को पहचानो और अपने व्यवहार को संयत
रखो। कामदेव मिश्रा अर्थशास्त्र पढ़ाने के प्रति पूर्ण समर्पित थे। अर्थशास्त्र पढ़ाने
के प्रति वो इतने समर्पित थे कि किसी भी पाठ को वे विद्यार्थी के मस्तिष्क में जब तक
अच्छी तरह उतार न देते थे तब तक चैन नहीं पाते थे। अपने लक्ष्य के प्रति संपूर्ण समर्पण
का सबक मैंने उनसे ही सीखा। कोई आश्चर्य नहीं कि बोर्ड परीक्षा में मुझे सबसे अधिक
अंक (80 प्रतिशत) अर्थशास्त्र में ही मिले। अनंत पांडेय सर गणित पढ़ाते थे और रेगुलर
क्लासेज के बाद भी वे स्कूल में ठहर कर गणित में अधिकतर छात्रों की समस्याओं का समाधान
करते। सहृदयता का सबक मैंने अनंत पांडेय सर से सीखा। जशवंत सिंह सर सफाई और स्वच्छता
पर विशेष ध्यान देते थे। क्या मजाल कक्षा के कच्चे फर्श से धूल भी उड़ जाए। हम छात्रों की मदद से ही वे फर्श की लिपाई-पुताई करवाते
और कक्षा में स्वच्छता बनाये रखने की कोशिश करते। सामुदायिक सहभागिता द्वारा सामाजिक
समस्याओं का निराकरण संभव है- यह सबक मैंने जशवंत सर से ही सीखा। आज यह सबक एक पूरा
देश ही आत्मसात कर रहा है। हरेक शिक्षक ने कोई न कोई सबक देकर हमारे व्यक्तित्व को प्रभावित
अवश्य किया। हाँ, यह अवश्य था कि किसी भी शिक्षक ने किसी भी छात्र पर प्राइवेट ट्यूशन
पढने का दवाब नहीं डाला। दरअसल प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाने का रिवाज़ उस दौर में था ही नहीं क्योंकि शिक्षा तब तिजारत नहीं
थी। न ही आज की तरह हर नुक्कड़ पर कुकुरमुत्ते की तरह कोचिंग सेण्टर हुआ करते थे जहाँ
छात्र अपनी अस्थियां गला- गला कर गला-काट प्रतियोगिता में अव्वल आने की होड़ में लगने
को मजबूर हैं। प्राइवेट
ट्यूशन पढ़ने वाले
छात्रों को पढ़ाई में कमजोर समझा जाता था।