Wednesday, 1 September 2021

जीवन के रंग, अपनों के संग: वह किशोरावस्था की नौकरी (01/09/2021)

उद्घोषक राम नरेश सिंह जी के साथ आकाशवाणी के स्टुडियो में 


आकाशवाणी, जमशेदपुर की क्रिकेट टीम 

खड़े हुए बाएँ से दायें : सतनु बराईक, विनोदनंद झा, राजेश सहाय, अव्रो चौधरी, राजेश कुमार राय, योगेंद्र प्रसाद, शाहिद अनवर। सामने बैठी हुईं- बाएँ से दाहिने - पूनम सुरीन, प्रीति मोहन, सुमन कुजूर (सभी उद्घोषक)

योगेंद्र प्रसाद, विनोदनंद झा, राम नरेश सिंह, राजेश सहाय, अजय कुमार राय 


आकाशवाणी से विदाई - 9 अक्तूबर 1996 

उत्तम खेती, मध्यम बान, निरधिन सेवा भीख निदान’- पापा की इस सलाह के बावजूद कि नौकरी से बेहतर स्वरोजगार अथवा फिर खेती-बाड़ी है, युवा दंभ में उन्मत्त मैं उनकी सलाह को नज़रअंदाज़ कर घर-बार छोड़ चौबीस वर्ष की उम्र में नौकरी पर निकल पड़ा। यों भी बुजुर्गों की सलाह इस उम्र के युवाओं को कम ही रास आती है। युवा मन बेलगाम घोड़े के समान पूरे वेग से दौड़ता है। इस वेग में बाधक किसी भी सलाह को पीढ़ी का अंतर मान वो दरकिनार कर देता है। पापा ने मुझे लोकोक्ति सुनाकर नौकरी करने से रोकना चाहा था। अतः मैंने भी अपना पक्ष उनके ही एक मित्र की कही एक लोकोक्ति से रखा। दरअसल, बड़े भैया जब पहली बार घर छोड़कर हॉस्टल में रहते हुए सैनिक स्कूल में पढ़ाई पूरी करने गए तो आर. बी. झा चाचा ने पापा को दिलासा देते हुए कहा था कि - बेटा और पैसा जितना बाहर रहे उतना ही बढ़ता है।  


इस उम्र में अपने पैरों पर खड़ा होने की उत्कंठा हर युवा में होती है। यह सामान्य मानव व्यवहार है अतएव मैं कोई अपवाद नहीं था। अतः पापा की इच्छा के विरुद्ध, सीने में ढेर सारी तमन्नाएँ समाये इकतीस वर्ष पहले बीस सितंबर के दिन प्रातः मैं जमशेदपुर के लिए निकल पड़ा जहां आकाशवाणी में मेरी नौकरी लगी थी। उस वक़्त इतना भी नहीं सोचा कि यह ग्रुप (C) जॉब है और मुझे ग्रुप (A) यानि प्रथम श्रेणी के अफसर की नौकरी के लिए प्रयास करना चाहिए आदि आदि। किन्तु जब युवा मस्तिष्क में यह बैठा दिया गया हो कि नौकरी निम्न श्रेणी का कार्य है तो फिर यह नौकरी प्रथम श्रेणी की हो अथवा तृतीय श्रेणी की- क्या फर्क पड़ता था। नौकरी का मकसद उस उम्र में तो फकत कुछ कमाने का था ताकि पॉकेट खर्चे के मामले में आत्मनिर्भर बना जा सके। जमशेदपुर में आकाशवाणी के नए केंद्र की स्थापना हुई थी। तब इस केंद्र का विधिवत उदघाटन भी नहीं हुआ था। कुछ ऐसा संजोग बना कि आकाशवाणी जमशेदपुर में उस समय जितनी भी नियुक्तियाँ हुईं उनमें अधिकतर युवा थे- चाहे प्रसारण अधिशासी हों अथवा केजुअल उद्घोषक, तकनीकी अनुभाग हो अथवा प्रशासनिक अनुभाग। सामान्यतः आकाशवाणी के अन्य केन्द्रों में इन विभिन्न श्रेणियों के कर्मचारियों के बीच विभागप्रदत्त दीवार बन जाता है। किन्तु जमशेदपुर में ऐसा नहीं था। यहाँ विभिन्न श्रेणी के नए रंगरूट प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे थे जो इन युवा रंगरूटों को एक सूत्र में बांधता था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि कोई कार्यक्रम अनुभाग का था अथवा तकनीकी अनुभाग का या फिर प्रशासनिक प्रभाग का। एक और वजह थी इस सह-अस्तित्व की। दरअसल तब के केंद्र निदेशक को यह गवारा नहीं था कि ऑफिस में काम करने वाले उनके मातहत अपना ध्यान नौकरी की ओर न लगाकर अपने कैरियर में लगाएँ और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में बिंदास अपना समय जाया करें। जबकि यहाँ यह आलम था कि कोई परीक्षा की तैयारी के लिए अथवा परीक्षा देने के लिए लंबी छुट्टी पर चला जाता। केंद्र निदेशक, जो अक्खड़ किस्म के बंगाली थे,  के आदेश पर तात्कालिक उप केंद्र निदेशक, जो मुस्लिम थे, हमें ज्ञापन (मेमो) देते जिसकी अंतिम पंक्ति होती थी कि आपके इस आचरण के लिए क्यों नहीं आप पर अनुशासनात्मक कारवाई की जाये। हम सब लाइब्ररी में बैठकर सम्मिलित रूप से कार्यालय ज्ञापन का जवाब तैयार करते और मियाद की अंतिम तारीख को लिखित जवाब कार्यालय में जमा कर देते। कार्यालय के अनुभवी कर्मचारी हमें समझाने की कोशिश करते कि इस प्रकार टका सा जवाब देने से मामला बिगड़ सकता है। ज्ञापन को सेवा पुस्तिका में दर्ज़ किया जा सकता है इसे आधार बनाकर  वार्षिक मूल्यन को खराब किया जा सकता है जिससे भविष्य में प्रोन्नति के समय अड़चन आ सकती है। किन्तु उस उम्र में इतना आगे देखने की फिक्र हममें नहीं थी। जो होगा देखा जाएगा में मस्त हम इन सलाहों को नज़रअंदाज़ कर देते थे। यहाँ किसे परवाह है। कोई कभी भी इन उच्च अधिकारियों के पास माफी मांगने नहीं गया। यह एक विचित्र दौर था जिसे देखकर उस केंद्र के चंद अनुभवी कर्मचारियों और अधिकारियों को अचंभा होता था। अगले दो वर्ष तक, जब तक ये बंगाली महोदय केंद्र निदेशक रहे, ऐसे ही बीते। धीरे-धीरे नौकरी के प्रति संजीदगी आई। 31 अक्तूबर को मुझे मेरा पहला वेतन मिला। ऑनलाइन वेतन ट्रान्सफर करने का ज़माना नहीं था। राजस्व टिकट का एक रुपया काटकर जब खजांची  ने मेरे हस्ताक्षर लेकर मेरे हाथ पर मेरा पहला वेतन रखा तो जो खुशी हुई वो अवर्णनीय थी- दो हज़ार आठ सौ चौवालिस रुपये अपने जेब के हवाले करते हुए मुझे एक परम आनंद और संतोष का अनुभव हुआ- लगा जीवन में मैंने भी एक मोकाम हासिल कर लिया है।