Saturday, 15 January 2022

‘तिले-तिले बढ़ोगे न’- मकर-संक्रांति का पर्व और माँ का यह प्रश्न (15/01/2022)


माँ की स्मृतियों को समर्पित यह ब्लॉग 

मकर राशि में सूर्य के प्रवेश को हिन्दू धर्म में मकर संक्रांति के पवित्र पर्व के रूप में मनाया जाता हैं। इस दिन से भगवान सूर्य उत्तरायन होते हैं। इस दिन से हिन्दू धर्म में पवित्र अनुष्ठान आरंभ हो जाते हैं। यह पर्व शुद्धता का प्रतीक पर्व है। बचपन में मकर संक्रांति की ढेर सारी मीठी-मीठी यादें जुड़ी हैं- मीठी-मीठी कहने से तात्पर्य है तिलकुट से। यह दिन दही-चूड़ा और तिलकुट को समर्पित था। ठंड के इस मौसम में भी माँ की ओर से सबों को प्रातः ही स्नान करने का निर्देश मिलता था जिसे हम येन-केन प्रकारेण निभाते थे। माँ दही-चूड़ा और तिल का प्रसाद भगवान जी के समक्ष भोग स्वरूप लगाती थी। इस अनुष्ठान से संबन्धित जो बात जेहन में बस गई वो यह था कि पूजा समाप्त कर माँ सभी बच्चों को पूजा कक्ष में अपने पास बुलाती थी। प्रसाद स्वरूप दही-चूड़ा के साथ तिल का कौर बनाकर एक-एक भाई बहन को स्वयं खिलाती और प्रश्न करती - तिले-तिले बढ़ोगे न?’ हम बच्चे हाँ में जवाब देते और फिर बाहर खेलने भाग जाते। बचपन में ईश्वर को साक्षी मानकर माँ के इस आग्रह के पीछे छिपे भाव से तब हम सर्वथा अनभिज्ञ था। किन्तु ईश्वर के समक्ष हुए इस संक्षिप्त प्रश्नोत्तर के बारे में जब आज सोचता हूँ तब स्पष्ट होता है कि इस आग्रह के पीछे एक माँ की ममता का भाव था जो ईश्वर से अपने बच्चों की दीर्घायु की कामना स्वरूप यह प्रश्न करती थी। यह भी जीवन का शास्वत सत्य है कि माता-पिता अपना सर्वस्व तिल-तिल कर होम कर देते हैं तब जाकर वे अपने बच्चों को तिल-तिल बढ़ते देख पाते हैं और अगली पीढ़ी अपना मुकाम बना पाती है। माता-पिता के बलिदान पर ही बच्चे अपनी महत्वाकांक्षाओं  की अट्टालिका खड़ी कर पाते हैं। किन्तु इस बलिदान में भी एक नैसर्गिक सुख है जिसे वे बलिदानी ही समझ सकते हैं।

मकर-संक्रांति के इस पावन पर्व पर जब सर्दी अपने चरम पर होती है, तिल का प्रयोग स्वास्थ्य  के लिए अत्यधिक लाभदायक है। पाचन-तंत्र साफ करने में, हड्डियों को मजबूती देने में तिल रामबाण का काम करता है। संभवतः शरीर की प्रतिरक्षा तंत्रों को मजबूती देने के लिए ही माँ बचपन में हमें तिल का प्रसाद देती रही होगी। आयुर्वेद में तिल के महत्व का बृहत वर्णन है। मकर संक्रांति के अवसर पर तिल से बने लड्डू और बर्फी, गज़क आदि खाने की पुरानी परंपरा रही है। गज़क नाम अरबी है जहां तिल का प्रयोग आम था। सर्दियों में तिल के तेल से खाना पकाने से बेहतर और कुछ नहीं हो सकता। यही वजह है कि तिल को जादुई भोजन माना जाता है और मकर संक्रांति में देश के विभिन्न क्षेत्रो में इसका प्रयोग भिन्न-भिन्न स्वरूपों में किया जाता है। मकर संक्रांति का पर्व राष्ट्र के विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न तरीके से मनाया जाता है जो हमारी इंद्रधनुषी संस्कृति का उम्दा उदाहरण है। बंगाल में सर्दी में तिल के अलावे खजूर के गुड़ जिसे नौलीन गुड़ कहते हैं का प्रचलन है। पंजाब में इसे लोहड़ी और माघी कहते हैं तो गुजरात में यह उत्तरायण कहलाता है। यहाँ खान-पान में तिल की चिक्की, और मूँगफली और गुड़ की चिक्की का प्रचलन है। मराठवाडा में तिल-गुड़ ध्या अणि, गोड़ गोड़ बोल –यानि तिल-गुड़ खाओ और मीठा-मीठा बोलो का चलन है। माताएँ पूरन-पोली बड़े जतन से बनाती हैं। उत्तराखंड में लोहड़ी घुघुतिया कहलाता है- घुघुति बसुती के खाना, दूध भात कु देलू माँ देली। उत्तर-प्रदेश में खिचड़ी का प्रचलन है। राजस्थान में इसे संक्रांत कहते हैं। असम में यह भोगाली बीहू हो जाता है (रंगाली बीहू रबी फसल की कटाई यानि चैत माह में और कंगाली बीहू अश्विन में मनाया जाता है)। एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का उद्घोष यदि राष्ट्र की एक आत्मा का भाव उत्पन्न करता है तो विभिन्न राज्यों में एक ही पर्व के भिन्न-भिन्न संस्करण देश की अनेकता में एकता के गौरवशाली इतिहास से हमारा परिचय कराती है और यह दर्शाती है कि जैसे शरीर विभिन्न अंगों के मेल से बनता है और शरीर के सभी अंग समान रूप से महत्वपूर्ण हैं उसी प्रकार राष्ट्र के विभिन्न राज्यों के पर्व-त्योहार और संस्कृति समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। यही हमारे राष्ट्र की पहचान है और इसी बहुआयामी और गौरवशाली इतिहास और ऐतिहासिक धरोहर पर हमें नाज़ है। यह विभिन्नता ही सम्पूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोता है जिसे वसुदेव कुटुंबकम से जाना जाता है।

 

Wednesday, 1 September 2021

जीवन के रंग, अपनों के संग: वह किशोरावस्था की नौकरी (01/09/2021)

उद्घोषक राम नरेश सिंह जी के साथ आकाशवाणी के स्टुडियो में 


आकाशवाणी, जमशेदपुर की क्रिकेट टीम 

खड़े हुए बाएँ से दायें : सतनु बराईक, विनोदनंद झा, राजेश सहाय, अव्रो चौधरी, राजेश कुमार राय, योगेंद्र प्रसाद, शाहिद अनवर। सामने बैठी हुईं- बाएँ से दाहिने - पूनम सुरीन, प्रीति मोहन, सुमन कुजूर (सभी उद्घोषक)

योगेंद्र प्रसाद, विनोदनंद झा, राम नरेश सिंह, राजेश सहाय, अजय कुमार राय 


आकाशवाणी से विदाई - 9 अक्तूबर 1996 

उत्तम खेती, मध्यम बान, निरधिन सेवा भीख निदान’- पापा की इस सलाह के बावजूद कि नौकरी से बेहतर स्वरोजगार अथवा फिर खेती-बाड़ी है, युवा दंभ में उन्मत्त मैं उनकी सलाह को नज़रअंदाज़ कर घर-बार छोड़ चौबीस वर्ष की उम्र में नौकरी पर निकल पड़ा। यों भी बुजुर्गों की सलाह इस उम्र के युवाओं को कम ही रास आती है। युवा मन बेलगाम घोड़े के समान पूरे वेग से दौड़ता है। इस वेग में बाधक किसी भी सलाह को पीढ़ी का अंतर मान वो दरकिनार कर देता है। पापा ने मुझे लोकोक्ति सुनाकर नौकरी करने से रोकना चाहा था। अतः मैंने भी अपना पक्ष उनके ही एक मित्र की कही एक लोकोक्ति से रखा। दरअसल, बड़े भैया जब पहली बार घर छोड़कर हॉस्टल में रहते हुए सैनिक स्कूल में पढ़ाई पूरी करने गए तो आर. बी. झा चाचा ने पापा को दिलासा देते हुए कहा था कि - बेटा और पैसा जितना बाहर रहे उतना ही बढ़ता है।  


इस उम्र में अपने पैरों पर खड़ा होने की उत्कंठा हर युवा में होती है। यह सामान्य मानव व्यवहार है अतएव मैं कोई अपवाद नहीं था। अतः पापा की इच्छा के विरुद्ध, सीने में ढेर सारी तमन्नाएँ समाये इकतीस वर्ष पहले बीस सितंबर के दिन प्रातः मैं जमशेदपुर के लिए निकल पड़ा जहां आकाशवाणी में मेरी नौकरी लगी थी। उस वक़्त इतना भी नहीं सोचा कि यह ग्रुप (C) जॉब है और मुझे ग्रुप (A) यानि प्रथम श्रेणी के अफसर की नौकरी के लिए प्रयास करना चाहिए आदि आदि। किन्तु जब युवा मस्तिष्क में यह बैठा दिया गया हो कि नौकरी निम्न श्रेणी का कार्य है तो फिर यह नौकरी प्रथम श्रेणी की हो अथवा तृतीय श्रेणी की- क्या फर्क पड़ता था। नौकरी का मकसद उस उम्र में तो फकत कुछ कमाने का था ताकि पॉकेट खर्चे के मामले में आत्मनिर्भर बना जा सके। जमशेदपुर में आकाशवाणी के नए केंद्र की स्थापना हुई थी। तब इस केंद्र का विधिवत उदघाटन भी नहीं हुआ था। कुछ ऐसा संजोग बना कि आकाशवाणी जमशेदपुर में उस समय जितनी भी नियुक्तियाँ हुईं उनमें अधिकतर युवा थे- चाहे प्रसारण अधिशासी हों अथवा केजुअल उद्घोषक, तकनीकी अनुभाग हो अथवा प्रशासनिक अनुभाग। सामान्यतः आकाशवाणी के अन्य केन्द्रों में इन विभिन्न श्रेणियों के कर्मचारियों के बीच विभागप्रदत्त दीवार बन जाता है। किन्तु जमशेदपुर में ऐसा नहीं था। यहाँ विभिन्न श्रेणी के नए रंगरूट प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे थे जो इन युवा रंगरूटों को एक सूत्र में बांधता था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि कोई कार्यक्रम अनुभाग का था अथवा तकनीकी अनुभाग का या फिर प्रशासनिक प्रभाग का। एक और वजह थी इस सह-अस्तित्व की। दरअसल तब के केंद्र निदेशक को यह गवारा नहीं था कि ऑफिस में काम करने वाले उनके मातहत अपना ध्यान नौकरी की ओर न लगाकर अपने कैरियर में लगाएँ और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में बिंदास अपना समय जाया करें। जबकि यहाँ यह आलम था कि कोई परीक्षा की तैयारी के लिए अथवा परीक्षा देने के लिए लंबी छुट्टी पर चला जाता। केंद्र निदेशक, जो अक्खड़ किस्म के बंगाली थे,  के आदेश पर तात्कालिक उप केंद्र निदेशक, जो मुस्लिम थे, हमें ज्ञापन (मेमो) देते जिसकी अंतिम पंक्ति होती थी कि आपके इस आचरण के लिए क्यों नहीं आप पर अनुशासनात्मक कारवाई की जाये। हम सब लाइब्ररी में बैठकर सम्मिलित रूप से कार्यालय ज्ञापन का जवाब तैयार करते और मियाद की अंतिम तारीख को लिखित जवाब कार्यालय में जमा कर देते। कार्यालय के अनुभवी कर्मचारी हमें समझाने की कोशिश करते कि इस प्रकार टका सा जवाब देने से मामला बिगड़ सकता है। ज्ञापन को सेवा पुस्तिका में दर्ज़ किया जा सकता है इसे आधार बनाकर  वार्षिक मूल्यन को खराब किया जा सकता है जिससे भविष्य में प्रोन्नति के समय अड़चन आ सकती है। किन्तु उस उम्र में इतना आगे देखने की फिक्र हममें नहीं थी। जो होगा देखा जाएगा में मस्त हम इन सलाहों को नज़रअंदाज़ कर देते थे। यहाँ किसे परवाह है। कोई कभी भी इन उच्च अधिकारियों के पास माफी मांगने नहीं गया। यह एक विचित्र दौर था जिसे देखकर उस केंद्र के चंद अनुभवी कर्मचारियों और अधिकारियों को अचंभा होता था। अगले दो वर्ष तक, जब तक ये बंगाली महोदय केंद्र निदेशक रहे, ऐसे ही बीते। धीरे-धीरे नौकरी के प्रति संजीदगी आई। 31 अक्तूबर को मुझे मेरा पहला वेतन मिला। ऑनलाइन वेतन ट्रान्सफर करने का ज़माना नहीं था। राजस्व टिकट का एक रुपया काटकर जब खजांची  ने मेरे हस्ताक्षर लेकर मेरे हाथ पर मेरा पहला वेतन रखा तो जो खुशी हुई वो अवर्णनीय थी- दो हज़ार आठ सौ चौवालिस रुपये अपने जेब के हवाले करते हुए मुझे एक परम आनंद और संतोष का अनुभव हुआ- लगा जीवन में मैंने भी एक मोकाम हासिल कर लिया है।  

Monday, 16 August 2021

नीड़ की नियति (16/08/2021)





किराये के फ्लैट के बैठक में बैठा कोई उपन्यास पढ़ने में मशगूल था जब बालकनी में चिड़ियों की चचाहट से ध्यान टूटा। इधर दिल्ली में केवल कबूतर और मैना के ही दर्शन होते हैं। अतः इस कलरव को सुन मन प्रसन्न हो गया। बालकनी में झाँक कर देखा तो पाया कि हमिंग बर्ड का एक जोड़ा केबल टी.वी. की तार पर बैठ प्रेमालाप कर रहा है। मुझे अपनी ओर देखते ही वे वहाँ से उड़ गए।  दूसरे दिन प्रातः स्नान के बाद गीला तौलिया बालकनी में पसारने गया तो पंछियों के उसी जोड़े को बड़ा व्यस्त पाया। देखा वे दोनों तार पर अपना घोंसला बनाने में व्यस्त हैं। मुझे ऑफिस जाना था अतः मैं उस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाया। शाम जब वापस आया तो बेटी ने बताया कि दिन भर वो जोड़ा घोंसला बनाने में व्यस्त रहा था। शाम तक दोनों ने बहुत हद तक घोंसले को अमली जमा पहना दिया था। अगले दो दिन मेरी बेटी मुझे गृह-निर्माण की प्रगति का व्योरेवार सूचना देती रही- यह भी बताया कि किस प्रकार उसके मदद की पेशकश को उस जोड़े ने तवज्जो नहीं दिया था- उनकी अनुपस्थिति में वो रुई के कुछ फाहे और कपड़ों के कतरन बालकनी में रख आई थी किन्तु उस जोड़े ने उन सामग्रियों का उपयोग नहीं किया था। इस बात से मेरी बेटी जरा मायूस थी। शायद यह जोड़ा कुछ अधिक ही स्वाभिमानी है। अतः वो तुम्हारी मदद नहीं स्वीकार रहा।– मैंने अपनी बेटी को पुचकारा।   

बहरहाल घोंसला बनकर तैयार हो गया और मादा ने घोंसले में अपना स्थान ग्रहण किया। सारा दिन नर आना जाना करता रहता या फिर सामने अशोक के पेड़ पर बैठा चहकता रहता। मेरी बेटी इनकी गतिविधियों को निकट से देखने के लिए लालायित रहती, अतः वो वहीं बालकनी में बैठकर पढ़ाई करने लग गयी थी। शुरू में उस जोड़े को मेरी बेटी का वहाँ बैठना थोड़ा नागवार गुजरा था किन्तु जब उन दोनों ने देखा कि वो वहाँ से नहीं हट रही है तब नर में कुछ ज्यादा ही हिम्मत आ गयी और वो मेरी बेटी की उपस्थिति में ही आना जाना करने लगा। अब इसे तुम पर एतबार हो गया है। उसे विश्वास हो आया है कि तुम उसे नुकसान नहीं पहुंचाओगी। अतः यह अब तुम्हारी उपस्थिति में भी वो उन्मुक्त आना जाना करता है। धोखा देने की प्रवृति तो मनुष्यों की ही होती है, पशु-पक्षियों की नहीं।– मैंने अपनी बेटी को पखेरू मनोविज्ञान समझाया।


कुछ दिन बाद देखने में आया कि मादा का घोंसले से बाहर निकलना बंद हो गया है। मतलब अब वो अंडे पर बैठी है। अब वो नर न केवल अपनी भोजन की व्यवस्था करता वरन मादा के लिए भी भोजन लाता। मेरी बेटी की इच्छा पुनः उस जोड़े की मदद करने की हुई। कदाचित नर के परिश्रम को देखकर उसका दिल पसीज गया था। अतः उस जोड़े को आराम देने की गरज से पके चावल के कुछ दाने और पानी भरा एक कटोरा की व्यवस्था बालकनी के मुंडेर पर की गयी। किन्तु इस बार भी उस जोड़े ने मेरी बेटी की मदद की इस पेशकश को ठुकड़ा दिया। पंछी स्वावलंबी होते हैं। वे अपनी व्यवस्था खुद करते हैं। मानव की तरह हर मामले में दूसरों पर निर्भर नहीं रहते।– उसकी माँ ने उसे समझाया।

कुछ दिन और बीते तो मेरी बेटी को पुनः चिंता हुई कि कदाचित बिल्ली रानी उसके अंडे हड़प करने न आ जाये। किन्तु मैंने उसे आश्वस्त किया कि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है। तुमने देखा नहीं उस जोड़े ने घोंसला का लोकेशन इस प्रकार चुना है कि बिल्ली का उस तक पहुंचना मुश्किल होगा। हर अभिवावक अपने बच्चों के प्रति इतना ही चिंताशील होता है।– मैंने पुनः अपनी पुत्री को आश्वस्त किया।  

दो सप्ताह बाद एक दिन सुबह मादा को अपने बच्चों को भोजन देते देख मेरी बेटी की खुशी का पारावार न रहा। अब वो प्रत्येक दिन सुबह उठकर पहले उन चिड़ियों को देखने जाती और उन्हें खुश देखकर स्वयं खुश होती। किन्तु इसके कुछ दिन बाद एक दिन सुबह उसने पाया कि वो पूरा का पूरा परिवार ही उस घोंसले को छोड़ कर कहीं चला गया है। वो घोंसला जिसे उस जोड़े ने इतनी मेहनत और लगन से बनाया था वो वीरान पड़ा है। उसके लिए यह विस्मय की बात थी। ये हम मनुष्य ही हैं जो घर बनाने के बाद सारी उम्र उसकी चौकीदारी करने में बिताते हैं किन्तु उसकी अगली ही पीढ़ी उस मकान को आउट डेटेड करार कर नए मकान में चली जाती है अथवा उसे बिल्डर को बेच मुनाफा कमा फ्लैट में शिफ्ट हो जाती है। तथापि नीड़ के प्रति यह मोह हम मानवों में ही देखने को मिलता है, इन पक्षियों में नहीं। नीड़ की बस इतनी ही नियति है कि उसका प्रयोग आश्रयसथल के तौर पर तब तक किया जाये जब तक अगली पीढ़ी अपने पैरों पर खड़ी न हो जाये। फिर अगली पीढ़ी स्वयं अपना रास्ता चुने और आप वानप्रास्थ को अग्रसर हों। किन्तु ऐसा होता नहीं है। हम कभी सांसारिक मोह-बंधन से उबर नहीं पाते जबकि एक अदना सा पक्षी भी इस मोह-बंधन से परे है जैसा तुमने देखा। यही वजह है कि ये पक्षी उन्मुक्त होकर जीवन जीते हैं जबकि हम संचय करते जीवन का आनंद उठाने से रह जाते हैं। इन पक्षियों से हम समस्त मानव मूल्यों का व्यावहारिक ज्ञान पा सकते हैं।’- मैंने अपनी बेटी को समझाया।                

Thursday, 19 November 2020

जीवन के रंग, अपनों के संग: छूटी नाही छठ के त्योहार’ (19/11/2020)












बिहार में दो त्योहारों का विशेष महत्व है - एक होली और दूसरा छठदोनों ही पर्व ऐसे हैं जब बिहारी अपने देस गांव घर की ओर लौटता है- चाहे इसके लिए उसे कितनी भी जुगत बिठानी क्यूँ न पड़ेछठ व्रत के प्रति बिहारियों के प्रेम का आलम यह है कि बिहार जाने वाले भारतीय रेल के किसी भी ट्रेन में चार महीने पहले टिकट बुक हो जाते हैंदिल्ली रेलवे स्टेशन पर पटना और दरभंगा के लिए सामान्य टिकट का अलग से काउंटर खोल दिया जाता हैसारे के सारे एयरलाइन्स इस समय पटना के फ्लाइट के टिकट के दाम बढ़ा देते हैं ताकि आर्थिक नुकसान की भारपाई हो सकेबिहार अपने घर इस पर्व को मनाने के लिए बिहारी किसी भी साधन का इस्तेमाल करता है- चाहे वह बस हो अथवा फिर कोई अन्य साधन जिसमे बेशक उसे अपनी यात्रा तोड़-तोड़ कर पूरी करनी पड़े-वह ऊफ्फ तक नहीं करताइसे ही बिहारी जीवटता कहते हैंइसी जीवटता का तो कमाल है कि संघ लोक सेवा आयोग की सबसे कठिनतम परीक्षा यानि सिविल सर्विसेज परीक्षा में भी इस प्रान्त के युवा सदा हर साल अव्वल आते रहे हैंबिहारी ने एक बार ठान लिया तो बस ठान लिया

मेरा मानना है छठ व्रत वस्तुतः एक सामुदायिक अनुष्ठान हैयह एक ऐसा व्रत है जिसे प्रधानतः महिलाएं आपस में मिलजुल कर करती हैं; हालाँकि पुरुषों द्वारा इस पर्व को करने में कोई निषिद्धिता नहीं हैएक समय किसी भी गांव में चंद छठव्रती ही होती थी और पड़ोस के शेष घर इनकी मदद करता थाएक-एक व्रती के ऊपर पड़ोस के चाचा-ताऊ के घर की सूप का भी जिम्मा रहता थाप्रत्येक व्रती दर्जनों सूपों के साथ सूर्य-देवता के अर्घ्य की तैयारी करती जिसे विधिपूर्वक संपन्न कराने में पड़ोस की चाची-ताई आदि का 24X7 का सहयोग रहता थाअब यह पर्व घर-घर में मनाने का रिवाज़ सा चल पड़ा हैऐसा संभवतः इसलिए हुआ क्योंकि गत कुछ वर्षों में छठ व्रत करने के नियम और परम्पराओं  में आमूल-चूल परिवर्तन हुए हैं- इस हद तक कि छठ का वास्तविक स्वरुप ही बदल गया हैअब यह आस्था का वह कठिन पर्व नहीं रह गया है जिसे हमने बचपन में माँ को करते देखा थासंभव है मैं अपने विश्लेषण में कुछ कटु लगूँ पर जिस प्रकार आजकल लोगों ने इस पर्व को सोशल मीडिया तक घसीट लिया है, लगता ही नहीं यह वही छठ पर्व है जिसे हम बचपन से देखते और मनाते आये हैं- न वह सादगी और सरलता रही है न वह संयम और संयततावक़्त के साथ छठ पर्व करने में बहुत बदलाव हुआ है जिसे सुधि पाठकगण जैसे-जैसे इस संस्मरण को पढ़ते जायेंगें, महसूस करेंगेंमगध, मिथिला और भोजपुर के ग्रामीण अंचल से निकल कर यह पर्व पहले बिहार के विभिन्न शहरों में फैला और अब यह न केवल देश के विभिन्न राज्यों में वरन विदेशों तक फ़ैल गया है- 'चाहें रहब देसवा बिदेसवा, छठ करब हम हर बार,छठ करब हम हर बार’- छठ के एक लोक-गीत की यह पंक्तियाँ छठ के प्रति बिहारियों के इसी श्रद्धा भाव को दर्शाता है मेरी समझ से यह इसलिए संभव भी हो पाया क्योंकि एक ओर जहाँ बिहारियों का अपने राज्य से पलायन जारी रहा वहीं इसे मनाने की रीति-रिवाज़ों में इतने परिवर्तन हुए कि अब यह वह कठिन व्रत नहीं रह गया है जिसे महिलाएं सामुदायिक रूप से ही निभा पाती थींपहले यह पर्व ग्रामीण पृष्ठभूमि की महिलाएं ही निभा पाती थीं किन्तु आज इसे शहरों में भी आसानी से किया जा रहा है क्योंकि अब यह पर्व निभाया नहीं वरन अन्य पर्वों की तरह ही धड़ल्ले से मनाया जाता हैमुझे आज भी याद है इस व्रत को उठाने से पहले माँ पड़ोस में गंगा बाबू के घर भाभियों से मदद के लिए कह कर रखती थीजब दीदी का विवाह हुआ तब भी माँ उनकी सास से आज्ञा लेकर बेटी-दामाद को छठ पर बुलाती ताकि दीदी की मदद पूजा में मिल सकेसबों के सहयोग से ही यह पर्व विधि-विधान पूर्वक संपन्न हो पाता थाछठ के इस पर्व से ही बचपन में सामुदायिक ज्ञान का पहला पाठ हमने पढ़ा    

बचपन में देखता था माँ छठ की तैयारी दीवाली के दूसरे दिन से ही शुरू कर देती थीऊ-डेरा  (बाउजी/ताऊजी का घर) में बड़ी माँ भी छठ पूजा रखती थीयह समय ऐसा होता जब स्कूल में बिलकुल मन नहीं लगता था और घर में पूजा की तैयारियां देखने की ललक बनी रहती थीपूजा रूम के बगल वाले कमरे को छठ पूजा के लिए खाली कर दिया जाता थापूजा का सामान इसी कमरे में रखा जाता थासबसे पहले पूजा में प्रयुक्त होने वाले विशेष बर्तनों को अटारी से उतारा जाता- पीतल अथवा कांसे के गगरी, परात, बाल्टी, लोटा, कड़ाही, कड़छुल, थाली, कटोरे, साँचा आदि आदि, साल में सिर्फ इसी मौके में प्रयुक्त होते थेघर के अन्य बर्तनों का प्रयोग पूजा में वर्जित थाइन बर्तनों को धो-धा कर पूजा रूम के बगल वाले कमरे में रखा जातापूजा में प्रयुक्त होने वाले अन्य सामान यथा सूप और गेहूं आदि की खरीदारी माँ बीते रविवार को ही कर लेती थीइस कमरे में ही एक ओर एक चौकी डाल दी जाती थीअगले पांच दिन माँ इसी कमरे में रह कर पूजा की समस्त तैयारी करती और तैयारियां भी कितनी सारीइस रूम में दो-पाटों वाली चक्की को बिठाया जाता गेहूं पीसने के लिए और मिटटी के गिलावे और ईंट से एक अस्थायी चूल्हा तैयार किया जाता दिवाली के बाद से हम बच्चों का पूजा कक्ष में और साथ वाले कमरे में जाना निषिद्ध थापता नहीं अपने मैले हाथ से हम पूजा की किस वस्तु को छू देंबिना स्नान किये इस कमरे में घुसना तो सख्त मना थाछठ पूजा में साफ़-सफाई और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता हैछठ पर्व में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है ताकि भगवान् रुष्ट न हो जाएँहर समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि कहीं कोई बिना हाथ-पैर धोये पूजा की सामग्रियों को छू न देछठ से हमने जो दूसरा पाठ सीखा वह था स्वच्छता की महत्ता का

पहले दिन माँ छठ के लिए खरीदी गयी सूती साड़ी और अन्य कपड़ों को धोती और सुखातीनहाय-खाय से लेकर पूजा की समाप्ति तक सिलाई-मशीन से बिना सिले वस्त्र ही धारण करती थीइसी दिन वो गेहूं बीनती और कंकड़-पत्थर हटातीइस काम में पड़ोस की महिलाएं, जिनके सूप का जिम्मा भी माँ के पास ही होता था, माँ की मदद करती थीअब गेहूं में कंकड़-पत्थर पड़े होने की कल्पना नहीं की जा सकती किन्तु उस ज़माने में गेहूं और चावल में कंकड़ पत्थर के कण होना यह सामान्य सी बात थीफिर माँ इसे धोती और धुले गेहूं को छत पर सूखने के लिए डाल दिया जाता थाहम बच्चों को इसकी निगरानी की ड्यूटी लगती थी ताकि कोई पंछी इसमें चोंच न मार दे

ऊ जे केरवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥

ऊ जे नारियर जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥

अमरुदवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥

शरीफवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥

ऊ जे सेववा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥

सभे फलवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय॥ 

 

-छठ के लोकगीत में यह प्रसंग आता है जब पंछी से पूजा के फल और अन्य सामग्रियों की सुरक्षा की बात आती हैगेहूं के सूख जाने के बाद घर पर ही इसे पीसा जाता थाकमरे में बैठाया गया चक्की इस काम आता था और इस काम को अंजाम देने में सहयोग करते थे हम सब बच्चे

परन्तु इससे पहले भाई-दूज के बाद माँ नहाये-खाय की तैयारियां करती थीनहाये-खाय का शाब्दिक अर्थ होता है नहा कर खानाइस दिन जो पहला निवाला व्रती के कंठ के नीचे उतरता है उसे वह खुद नहा कर तैयार करती हैचूँकि माँ सुबह से ही पूजा की तैयारी में लग जाती थी अतः हम बच्चों को सुबह का नाश्ता देने की ज़िम्मेदारी पड़ोस में गंगा बाबू के घर की बहुरानियों में से किसी का होता था जो यह काम सुबह-सवेरे कर जाती थीनहाये-खाय की सुबह माँ मिटटी के गिलावे और ईटों की मदद से बने अस्थायी चूल्हे को आम की लकड़ी से चूल्हा जोड़तीअन्य किसी भी पेड़ की लकड़ी इस पर्व में वर्जित हैआजकल पूजा के सारे पकवान गैस स्टोव पर बनाये जाने लगे हैंइस अवसर पर शुद्ध वैष्णव भोजन बनता है जिसमे अरवा चावल, लौकी युक्त चने की दाल, लौकी का ही बचका और घी होता हैलहसून प्याज का उपयोग सर्वथा वर्जित थाइसी प्रकार सामान्य नमक का प्रयोग पूजा में वर्जित थाकेवल सेंधा नमक (पहाड़ी नमक) का ही उपयोग पूजा में किया जाता थापूजा में इस्तेमाल किये जाने वाले कुएं के पानी में गंगाजल छोड़ कर उसे पवित्र किया जाता थाइसी प्रकार हर प्रसाद में तुलसी पत्र छोड़ना अनियार्य थायह सब करते-करते दोपहर का एक बज जाता थामाँ के भोजन कर लेने के बाद हम लोग उसी थाली में भोजन करते थेआम की लकड़ी से जोड़े चूल्हे पर बने इस प्रसाद रुपी भोजन का स्वाद लाजवाब होता था

नहाये-खाय के बाद का दिन 'खरना' अथवा 'लोहंडा' का होता हैइनके शाब्दिक अर्थ क्या हैं नहीं मालूम पर इस दिन हर व्रती पूरे दिन उपवास रखती है और शाम को पूजा के बाद ही प्रसाद ग्रहण करती हैइस दिन सुबह से ही माँ शाम की पूजा के प्रसाद की तैयारी में लग जाती जिसमे खीर और चावल के रोट मुख्य प्रसाद होते हैंपूजा के खीर में गुड़ डलती थीचीनी को अशुद्ध माना जाता है अतः छठ के प्रसाद में इसका उपयोग वर्जित होता हैगांव के कुछ कोइरी-किसान जिनका घर में आना-जाना रहता था, पूजा में उपयोग के लिए बाल्टी-बाल्टी गन्ने का रस घर पर पहुंचा जाते थेइस रस में चावल को छिजा कर 'रसिया' प्रसाद बनता था जो हम सब को गुड़ के खीर इतना ही प्रिय थाकिसी-किसी स्थान पर चावल दाल भी प्रसाद स्वरुप बनाने का चलन हैसुबह से ही माँ चावल बीनने और पूजा के अन्य काम में लगी रहतीदूसरी ओर दो मजदूर सारे दिन गेहूं पीसने का काम करते जिसमे हम बच्चे भी हस्तक्षेप करते थे इन मज़दूरों को भी पूजा के लिए नए और धुले धोती और बनियान मिलतास्नान कर और इन नए परिधान को पहन कर ही वे पूजा वाले कमरे में गेहूं पीसने बैठते थेबीस से पच्चीस किलो गेहूं पीसने में सारा दिन निकल जाता थाबच्चों में यह होड़ लगती कि कौन कितना अधिक गेहूं पीस कर दिखाता हैदो-दो बच्चों के जोड़ी बन जाती थीएक बार हम गेहूं पीसने बैठे तो पाया कि पीसी हुई गेहूं चक्की से निकल ही नहीं रही हैबड़े मामू ने बताया कि हम लोग चक्की को विपरीत दिशा में घुमा रहे थेदस-पंद्रह मिनट का मेहनत यों ही बेकार चला गया थागेहूं पीसने के दौरान यदि किसी को लघु-शंका के लिए जाना पड़ गया तब भी उसे पुनः स्नान कर ही कमरे में प्रवेश की अनुमति मिलती थीशाम को जीप को पानी से धोकर पापा के साथ हममे से दो-तीन बच्चे दूध लाने के लिए निकल पड़ते सुरौ महतो या फिर ज्ञानी महतो की खटाल की ओरइस दिन गाय के दूध की अत्यधिक मांग रहती है और पूरे वर्ष दूध में पानी मिलकर बेचने वाला ग्वाला भी इस दिन शुद्ध दूध ही बेचता हैछठ पर्व का इतना महत्व होता था कि इस दिन वो अपने रोज़ के ग्राहक को छोड़ कर सारा दूध व्रतियों को ही देताअब मदर डेरी के दूध का इस्तेमाल भी लोग करने लग गए हैं किन्तु उस दौर में मिल्क पॉवडर अथवा अप्राकृतिक दूध का पूजा में प्रयोग सर्वथा निषिद्ध थाघर पर भी गाय के दोनों टाइम का दूध पूजा के लिए रखा जाता थाशाम पुनः आम की लकड़ियों से माँ चूल्हा जोड़ती और खीर बनाने की तैयारी शुरू करती जितने सूप उतने ही मिटटी के खप्पड़ और उतने ही तिलक, और पूजा में प्रयुक्त होने वाली अन्य वस्तुएंखरना पूजा में शामिल होने हज़ारीबाग से सारे चाचा, चाची तिलैया अवश्य आते थेऔर यह वह समय होता जब बच्चों की संख्या और उनके उपद्रव में वो बेतहाशा वृद्धि होती थी जिसे याद कर आज भी गुदगुदी होती है- पास के खेतों से गन्ने तोड़ कर खाने से लेकर घाट का मुआयना करने या फिर आपस में दौड़-भाग करने में समय कब निकल जाता था पता ही नहीं चलता थादोनों डेरा एक हो जाता था और छठ के लोकगीत के बीच खीर का प्रसाद बनता था-

'रूनकी-झुनकी बेटी मांगी, पढ़ल पंडित दामाद हे छठि माता,

घोड़वा चढन को बेटा माँगिल, सेवा करन को पतोहु हे छठि माता'

- ऐसे और अन्य कई लोकगीत अब भी मन-मस्तिष्क पर छाये हैंपूजा का प्रसाद बन जाने के बाद खरना पूजन होता हैखरना पूजा की समाप्ति पर पूजा का प्रसाद सबसे पहले व्रती ही ग्रहण करती हैपूजा के इस प्रसाद से ही वो अपना उपवास तोड़ती हैनियम यह है कि जब व्रती प्रसाद ग्रहण कर रही हो तो किसी भी जीव के किसी भी प्रकार का स्वर उसके कान तक न पहुंचेयदि कोई कुछ बोलता है और वह स्वर व्रती के कानों में पड़ता है तो वो वहीं भोजन करना छोड़ देती हैयही यह व्रत का नियम हैचूँकि इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद अगले छत्तीस घण्टे व्रती को पुनः उपवास पर रहना होता है अतः लोग इस समय संयम बरतते हैं और बात-चीत नहीं करते हैंबच्चों को दूर भेज दिया जाता हैगोदवाले छोटे बच्चों को महिलाएं लेकर अलग हो जाती हैं ताकि यदि वो रुदन करे तो उसका स्वर व्रती के कानों तक न जा पाएकहीं-कहीं तो ढोल-नगाड़ों से अन्य सारे स्वर को दबा दिया जाता हैमुझे याद नहीं माँ का व्रत कभी हम बच्चों की शोर की वजह से टूटा होइसी प्रकार भोजन करते समय यदि कोई कंकड़ का टुकड़ा दाँतों तले आ जाए तब भी व्रती भोजन त्याग देती थीउन दिनों बिजली गुल होना आम बात थी और ऐसे में भूल से भी यदि कोई पतंगा खाने में गिर जाए तब भी व्रती को भोजन त्याग देना पड़ता थाअतः इस समय व्रतियों को विशेष ध्यान रखना पड़ता थापूजा के बाद हम सब पूजा वाले कमरे में जाते और खप्पड़ और उसके सामने जलते दीये के समक्ष साष्टांग प्रणाम कर हर वो मांग रख देते जिसकी हमें आकांक्षा रहती थी- भगवानजी, परीक्षा में अच्छे मार्क्स दिला देना, भगवानजी अगले क्रिकेट मैच में मैं सबसे अधिक रन बनाऊं आदि आदिइसके बाद माँ के सामने साष्टांग होतेमाँ भाइयों को भस्म का तिलक लगा कर और बहनों को रोली के टीके लगाकर आशीर्वाद देती थीफिर हम सब बच्चो में माँ के छोड़े प्रसाद को खाने की होड़ लगती थीइस प्रसाद से सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं- ऐसा कहते थेहमारे ससुराल में इस प्रसाद पर केवल बहनों का ही हक़ होता है जबकि खप्पड़ में चढ़ाये गए प्रसाद पर भाइयों का हक़ रहता थागरज़ यह कि कोस-कोस में प्रचलनों में छोटे-छोटे परिवर्तन होते रहते हैं'खरना' अनुष्ठान का समापन भी लोक-गीतों से ही होता थाव्रती लोक-गीत गाती और अन्य महिलाएं उनके स्वर में स्वर मिलाती

खरना के बाद का दिन संध्या अर्घ्य का होता हैइस दिन पुनः सुबह से ही पूजा की चहल-पहल शुरू हो जाती थीपड़ोस से भाभियाँ पूजा का प्रसाद तैयार करने के लिए आ जाती थीइसके लिए उन्हें सुबह स्नान कर बिना चाय-नाश्ता किये आना होता थादीदी के जिम्मे घर के शेष लोगों के लिए नाश्ता बनाने का काम होताहममे से कुछ बच्चे भी सुबह बिना चाय-नाश्ता किये, नहा-धो कर ठेकुआ ठोकने में लग जाते थेठेकुआ ठोकने के लिए सांचे होते हैं जिस पर एक-एक लोई को हाथों से दबा कर ठेकुआ का स्वरुप दिया जाता हैपर सबसे जटिल काम जो होता था वह था ठेकुआ के लिए आटा सानने (गूथने) कातरल गुड से आटे को साना (गूंथा) जाता था जो काफी मशक्कत का काम होता हैदो महिलाएं आटा सानने (गूथने) में, दो-तीन महिलाएं और बच्चे ठेकुआ ठोकने में और दो महिलाएं ठेकुआ तलने में सुबह सात-आठ बजे से लगती थी तब जा कर बारह-एक बजे तक पच्चीस किलो आटे का ठेकुआ तैयार होता थामाँ प्रत्येक ठेकुवे पर रोली से टिकती और लौंग लगाती चली जाती थीघर पर खरना पर तैयार होने वाले खीर प्रसाद अथवा पूजा के लिए बनने वाला ठेकुआ में माँ ने कभी कोई फर्क नहीं किया जैसा कि आमतौर पर 'समझदार' लोग करते हैं-खुद खाने के लिए अलग प्रसाद बनाते हैं और बांटने के लिए अलग प्रसाद बनाते हैं

सुबह जीप को पुनः धोया जाता और दो-तीन बच्चे पापा के साथ छठ के लिए फल खरीदने बाजार जाते थेघंटे भर में फल आ जाता था जिसे कुएं पर ले जाकर धोया जाता और धोने के उपरांत ही इन फलों को पूजा वाले कमरे में रखा जाताबच्चों का एक दस्ता सुबह घाट को जाता था और अर्घ्य के लिए अनुकूल स्थान का चयन करताजरूरत पड़ने पर एक कुली की मदद से घाट के एक भाग को इस प्रकार चौरस किया जाता कि माँ को जल में प्रवेश करने में कोई परेशानी न होइस बात का भी ध्यान रखा जाता था कि कहीं किसी प्रकार का कोई फिसलन न होससुराल में अन्य पटनावासियों की ही तरह गंगा तट पर अर्घ्य दिया जाता हैहालाँकि इस परंपरा को भी बिसराते हुए अब लोगबाग घर पर ही एक कृत्रिम जलाशय बनाकर उसमें अर्घ्य देने लग गए हैं। यह सत्य है कि हमने ही गंगा को प्रदूषित किया है किन्तु यह भी सत्य है कि गंगा को प्रदूषित करने में जितना योगदान औद्योगिक कचड़े का है उसके मुकाबले ऐसे सांस्कृतिक हस्तक्षेप का कुछ भी नहीं हैछठ का जो सम्बन्ध प्रकृति के साथ रहा था वह टूटने लगा हैचक्की के आटे का स्थान मिल के आटे ने ले लिया हैएक वस्त्र की जगह सामान्य वस्त्रों ने ले लिया हैगाय के शुद्ध दूध की जगह मदर डेयरी के दूध से अर्घ्य देने का रिवाज़ चल पड़ा हैआम की लकड़ी की जगह गैस-स्टोव ने ले लिया हैअब वो छठ कहीं छूट गया है जिसे माँ निभाती थी और जिसे हम बचपन से देखते आये हैंआज छठ के नाम पर हम जिस परंपरा को अगली पीढ़ी को सुपुर्द कर रहे हैं उसे देख मन विकल हो उठता है और ह्रदय तार-तारआप किसी भी घाट पर चले जाएँ सर्वत्र बाज़ारवाद व्याप्त हैवह सरलता और सादगी अब कहीं रही नहींलगता है कहीं कुछ दरक सा गया हैआखिर कितनी कृत्रिमता के साथ हम अपनी आस्था को बरक़रार रख पायेंगें

संध्या तीन बजे तक माँ घाट पर जाने के दउरा (टोकड़ी) तैयार कर लेती थीप्रत्येक सूप को सजाया जाता- नारियल और कुछ फल, फूल, अलता, और एक-एक दीपक प्रत्येक सूप पर रखा जाता; फिर सभी सूपों को दउरे में संभाल कर रखा जाताअर्घ्य के लिए गाय का दूध और गंगाजल युक्त जल भी रख लिया जाता थाघाट पर सबों के बैठने के लिए दरी आदि के इंतज़ाम के साथ हम घाट की ओर रवाना होतेशाम तक हज़ारीबाग से हमारे सभी चाचा-चाची बच्चों समेत तिलैया पहुँच जाते थेजीप को धोया जाता और दउरे को उस पर रखा दिया जाता थापापा और माँ के साथ कुछ बच्चे नंगे पैर जीप में बैठ जाते और शेष बच्चे चाचा-चाची के साथ उनकी गाडी में सवार हो जातेइसी समय साथ ही साथ बड़ी माँ भी दउरा और लेकर बाउजी के साथ ऊ -डेरा से एक अन्य गाडी में निकलती और फिर यह पूरा काफिला घाट की ओर चल पड़ता थापहले हम लोग बराकर नदी के जवाहर घाट पर अर्घ्य देने के लिए जाते थेफिर गुमो के महतो-आरा तालाब में छठ पूजा के लिए जाने लगेकभी-कभी नवादा गांव के नहर पर भी अर्घ्य देने जाना हुआगांव में घर के युवा दउरा को अपने सिर पर ढोकर घाट तक ले जाते हैंथोड़े बड़े होने पर हमने भी इस परंपरा को निभाया और दउरे को लेकर चलते हुए घाट पर जाते थेऐसा कर एक अलग ही सुकून और संतोष मिलता थामाँ सारे रास्ते छठ के लोक-गीत गाती-

'कांच ही बांस के बहँगिया, बहँगी लचकत जाये,

होईही देवरजी कहरिया, बहँगी घाट पहुंचाए,

बात जे पूछे ला बटोहिया, बहँगी केकरा के जाए,

तू तो आन्हर रे बटोहिया, बहँगी छठ मैया के जाए

 

घाट से कुछ दूरी पर उतर वो, बड़ी माँ, बद्री चाची और अन्य व्रती पैदल चलने लगती और फिर ये सभी व्रतियां सामूहिक रूप से छठ के लोक-गीत गाना शुरू करती जिससे समां बांध जाता थामुझे अब भी याद है इन गीतों में हर संतान का नाम लेकर छठ माता से कृपा बनाये रखने का निवेदन होता थाजब मेरा नाम लिया जाता था हमारे चेहरे पर एक मुस्कान मुस्कान बरबस खिंच जाती थीहम बच्चों में घाट पर पहुंचने की हड़बड़ी रहती और हम सब दौड़-दौड़ कर आगे निकल जाते थेअस्ताचल सूरज देवता को सम्बोधित कर माँ और साथ की अन्य व्रतियां लोकगीत गाती- 

डूबतो सुरुज के जे पूजे, इहे बाटे हमर बिहार

फलवा दउरवा सजाके, अईनी हम घाट पे तोहार

दिहनी अरघ छठी मईया, करीं हमर आरती स्वीकार

करीं हमर आरती स्वीकार

 

घाट पर पहले गंगाजल युक्त जल से उस भूमि को धोया जाता जहाँ दउरा रखना होता थाफिर सूपों को पंक्तिबद्ध पश्चिममुखी कर रख दिया जाता थारास्ते में बुझ गए दीयों को पुनः प्रज्वलित कर दिया जाता थायह एक बहुत ही सुन्दर दृश्य उत्पन्न करता था जिसकी व्याख्या अवर्णनीय हैगंगाजल युक्त जल छिड़क कर से नदी अथवा पोखर के जल को भी शुद्ध किया जाता और फिर माँ जल में प्रवेश करती और सूर्य का ध्यान करतीसूर्य देवता की पूजा के बाद एक-एक कर सूपों से सूर्य देवता को अर्घ्य दिया जाताअस्ताचल सूर्य के अर्घ्य के साथ ही यह दिन समाप्त होता था

घाट से लौटने के बाद माँ कल प्रातः के दउरे की तैयारी करतीपड़ोस की भाभियाँ और अन्य महिलाएं दउरा सजाने में माँ की मदद करती और इसके बाद छठ के लोक-गीत गाने का कार्यक्रम पुनः चल पड़ता जो रात्रि भोज तक चलताइस पूरे दिन माँ का निर्जला उपवास रहताहर व्रती यह कठिन परीक्षा देती है तब जाकर छठि मैया की कृपा की पात्र बनती हैसोने से पहले दीदी सरसों के गरम तेल से माँ के पैरों की मालिश करती जो घाट पर ठन्डे जल में घंटों खड़े होने की वजह से ठन्डे पड़ जाते थेचूँकि कल प्रातः ही अर्घ्य देने घाट पर जाना होता था अतः आज की रात सभी चाचा-चाची भी तिलैया घर पर ही रुक जाते थेरात्रि भोजन के बाद बुजुर्गों के लाख समझाने के बावजूद कि कल सुबह जल्दी उठ कर घाट पर जाना है अतः सभी लोग जल्दी सो जाए, हममे से कोई भी बच्चा जल्दी सोने की तत्परता नहीं दिखाता, तब तक जब कि कोई सचमुच ही डाँट न खा जाए

अगले दिन तड़के ही घाट पर जाने की तैयारी शुरू हो जाती थीब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय से पहले-पहले ही गांव के युवा अपने सिर पर दउरा उठाये घाट की ओर चल पड़ते हैंदउरे उठाये खेतों की मेढ़ पर चल रहे ये पंक्तिबद्ध युवा दूर से नज़र नहीं आतेजो नज़र आता है वह होता है सूपों पर प्रज्वलित टिमटिमाते दीये जो अँधेरे में एक अलौकिक दृश्य उत्पन्न करते हैंइसे देख कर ही इस आनंद की अनुभूति को महसूस किया जा सकता है- लेखक की व्याख्या यहाँ अपूर्ण ही रहेगी

सूर्योदय से पहले हम लोग घाट पर पहुँचतेआज पुनः घाट के किनारों को गंगाजल युक्त जल से धोया जाताकिन्तु आज सूपों को पूर्वोमुखी सजाया जातासभी दीयों को पुनः प्रज्वलित कर दिया जाता और जब घाट पर मौजूद हज़ारों व्रतियों के सूप के दीये एक साथ प्रज्वलित होते तो पूरा का पूरा घाट दीयों के प्रकाश में प्रकाशमय हो जाताइंतज़ार केवल सूर्य देवता का रहता जिनके लिए व्रतियां पोखर के ठन्डे जल में स्नान कर पुनः ध्यानस्थ हो जाती-सूर्य-देवता की उपासना मेंअन्य व्रतियों के साथ ही माँ जल में प्रवेश करतीकार्तिक माह के उस ठण्ड में भी वे सभी व्रतियां स्नान कर सूर्योदय के इंतज़ार में ध्यान लगाए खड़ी रहतीप्रातः गाये जाने वाले लोक-गीत भिन्न होते जो माँ और अन्य व्रतियां साथ-साथ गाती-

‘सोना सट कुनिया, हो दीनानाथ हे घूमइछा संसार

आन दिन उगइ छा हो दीनानाथ आहे भोर भिनसार

आजू के दिनवा हो दीनानाथ हे लागल एती बेर

बाट में भेटिए गेल गे अबला एकटा अन्हरा पुरुष

अंखिया दियेते गे अबला हे लागल एती बेर

बाट में भेटिए गेल गे अबला एकटा बाझिनिया

बालक दियेते गे अबला हे लागल एती बेर

 

लोकगीत का सार यह है कि हे सूरज देवता और दिन तो आप जल्दी आ कर हमारी पूजा स्वीकार करते हैंआज आपको विलम्ब क्यों हो रहा हैहम अबला आपकी बाट जोह रही हैंछठ के इन लोक-गीतों से जो तीसरा पाठ हमने पढ़ा वह था प्रकृति से प्रेम कासूर्य, नदी, तालाब, पक्षी और समाज से प्रेम करना हमने माँ को छठ पर्व करते देख कर ही सीखा   

सूर्योदय के साथ ही प्रत्येक सूप लेकर बारी-बारी से सूर्य-देवता को जल और दूध से अर्घ्य दिया जाता थाप्रत्येक सूप के बाद माँ पुनः स्नान करती और फिर दूसरा सूप उठाती और हम सब पुनः जल और दूध से अर्घ्य देतेयह क्रम सभी सूपों से अर्घ्य देने तक चलता रहताफिर वहीं घाट पर आम की लकड़ी प्रज्वलित कर हवन होता और माँ सबों को ठेकुआ प्रसाद देतीप्रातः अर्घ्य के बाद मिथिला में कोशी भरने की भी परंपरा रही हैजिनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं वो छठव्रतियाँ कोशी भरती हैंघर लौटने से पहले माँ देवी-मंडप रोड में अवस्थित देवी स्थान जाती और मत्था टेक कर छठ मैया से परिवार पर कृपा बनाये रखने के लिए आग्रह करती और गाती-

कबहुँ ना छूटी छठि मइया, हमनी से बरत तोहार

तहरे भरोसा हमनी के, छूटी नाही छठ के त्योहार

छूटी नाही छठ के त्योहार

छूटी नाही छठ के त्योहार

छूटी नाही छठ के त्योहार  

 

छठ पर्व की समाप्ति के साथ ही दिनचर्या वापस पुराने ढर्रे पर लौट जाता थाहज़ारीबाग से आये सभी रिश्तेदार वापस चले जाते थे जिससे घर सूना-सूना लगने लग जाता थाछठ के बर्तन पुनः अटारी पर साल भर के लिए रख दिए जाते थेचक्की भी रख दिया जाता थाआस-पास के सभी घरों में हम छठ के प्रसाद का वितरण करने जाते और गांव के लोग घर पर प्रसाद देने आतेएक सद्भाव का वातावरण व्याप्त रहता थादूसरे दिन स्कूल खुल जाते थेसब कुछ ऐसे बीत जाता था मानो एक सपना देखा था

वर्षों छठ पर्व मनाने का यह क्रम चलता रहातब जेहन में कभी यह ख्याल नहीं आता था कि 'छूटी नाही छठ के त्योहार' एक वास्तविकता बन कर सामने आ जाएगीवक़्त हावी हो जायेगा, माँ वृद्ध हो जाएगी और इस कठिन व्रत को करने में अशक्तयह परंपरा कभी टूट जाएगीपर यही विधि का विधान हैएक सपना सा सब टूट गया सब छूट गयाकिन्तु इस पर्व से हमने अपनी संस्कृति को समझा- वसुदेव कुटुम्बकम के वास्तविक अर्थ को समझा और समझा एक हिन्दू होने के सही मायने कोछठ के इस व्रत ने हमें अपनी संस्कृति पर गर्व करना सिखाया अहंकार नहींसमाज में सभी तबके और धर्म के लोगों के साथ रहना सिखाया

काल के फलक पर मुट्ठी से फिसलते रेत को पकड़ने की कवायद में मैं अब छठ के अवसर पर अपने ससुराल पटना जाता हूँ जहाँ मम्मी छठ व्रत करती हैअपने बच्चों को इस संस्कृति से रु-ब-रु करवाने के लिए यह मेरा छोटा सा प्रयोग और प्रयास हैप्रार्थना करता हूँ यह परंपरा अधिक से अधिक वर्षों तक बनी रहेयह सपना न टूटे

  


Sunday, 15 November 2020

जीवन के रंग- अपनों के संग: दसे दशहरा, बीसे दिवाली, छये छठ (14/11/2020)






बचपन में मां से अक्सर सुना करता था-
'दसे दशहरा, बीसे दिवाली छ्ये छठ'- दस दिन दशहरा का त्यौहार मनाने के ठीक बीस दिन बाद दिवाली आती है और दिवाली के छह दिन बाद छठ का पावन पर्व। दिवाली से छठ के बीच वर्ष में यह एक ऐसा समय होता है जब हम प्रत्येक दिन कोई न कोई पर्व मना रहे होते हैं- धनतेरस, छोटी दिवाली, दिवाली, बुढ़िया दिवाली, गोवर्धन पूजा, भाई-दूज, चित्रगुप्त पूजा, नहाए-खाये, खरना, संध्या अर्घ्य और अंत में प्रातः अर्घ्य के बाद ही त्योहारों का यह सिलसिला थोड़ा रुक कर - फिर कुछ दिन बाद गोशाला पूजा के साथ ही समाप्त होता है। हर त्यौहार से यादें जुडी हैं- मीठी ही मीठी खट्टी कुछ भी नहीं। इन वर्षों में इन त्योहारों को मनाने के तरीके में परिवर्तन हुए हैं- कुछ बेहतर के लिए, कुछ मात्र औपचारिकता निभाए चले जाने की गरज़ से, तो कुछ बदतरी की ओर! 

दुर्गापूजा के बाद से ही दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाती थी। घर की साफ़-सफाई का काम जो दुर्गापूजा के बाद शुरू होता वह दीपावली आने तक चलता रहता। पूरे घर में रंग-रोगन किया जाता और बारिश के दौरान घर के टूटे मुंडेरों, छज्जे एवं परकोटे आदि की भी मरम्मत की जाती। दोपहर वक़्त जब राज मिस्त्री और कुली को माँ खोराकी देती और वे खाना खाने पास के ढाबे में चले जाते तब हम उनकी गैर-उपस्थिति में वहां पड़ी कूची ले पुताई में लग जाते  पर यह सफाई कार्यक्रम घर तक ही सीमित नहीं रहता था। घर के पीछे बने गोहाल जो गायों और बैलों का स्थान था उसके खपरैल की भी मरम्मति की जाती थी और चौपायों के खुरों से टूटे फर्श को समतल किया जाता था। घर के चारो ओर के  बाउंड्री वाल की भी पुताई की जाती थी। घर के सामने के लॉन की भी सफाई होती और बेजरूरत घास-पतवार हटाकर क्यारियों में मौसमी फूलों के पौधों को लगाया जाता। प्रत्येक क्यारी के रख-रखाव की ज़िम्मेदारी एक-एक बच्चे का होता और प्रत्येक शाम हम अपनी-अपनी क्यारियों में पटवन करते। फूलों की इन क्यारियों और लॉन को अलग करती तिरछे पंक्तिबद्ध ईटों को हम लाल रंग से रंगते।

दीपावली के दिन तक रंग-रोगन का कार्य समाप्त हो जाता था और राज-मिस्त्री और अन्य मजुरागण अपना-अपना बक्शीश लेकर विदा होते। मगर विदा होने से पहले राज-मिस्त्री के हिस्से घर के आँगन में गीली मिटटी और ईटों को जोड़कर छोटा सा घरौंदा बनाने की भी ज़िम्मेदारी होती थी जिसे वे सहर्ष अंजाम देते थे। इसके रंग-रोगन का काम हम बच्चों के जिम्मे होता था। दिवाली के दिन लक्ष्मी-गणेश की पहली पूजा इसी घरौंदे में होता था।

इसके बाद माँ घर के सजावट में लग जाती। दिवाली के दिन घर के गेट पर केले के थम्भ लगाए जाते और छोटा सा तोरण द्वार बनाया जाता था जिसे बाजार के खरीद कर लाये गए कागज़ के रंग-बिरंगे झालरों से सजा दिया जाता था। नारियल की रस्सी एवं रंग-बिंरंगे कागज़ों से बना बंदनवार से घर के सामने के हिस्से को सजाया जाता। हमारे छोटे मामू एक सप्ताह पहले से ही बांस की खपच्चियों से कंदील तैयार करने में लगे होते थे जिसे रंग-बिरंगी पारदर्शी सेलोफेन पेपर से सजाया जाता और उसके अंदर एक बल्ब लगा दिया जाता था जिसके प्रकाशित होने से उसके रंग-बिरंगे प्रकाश से एक अलग ही समां बंध जाता था।

दिवाली से एक सप्ताह पहले ही रविवार को उस क़स्बे में लगने वाले साप्ताहिक बाजार-हाट से माँ दिवाली की अन्य सामग्रियों की खरीदारी किया करती थी- मिटटी के दीये, लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति, कुलिया-चुकिया, तीसी और सरसों के तेल, शुद्ध घी, दिए की बाती बनाने के लिए रुई,लावे और भुंजे आदि आदि। कुलिया-चुकिया मिटटी के उन छोटे-छोटे बर्तनों को कहा जाता था जिसका वास्तविक स्वरुप हर रसोई में उपलब्ध रहता है। हम बच्चों के जिम्मे माँ यह काम छोड़ती कि हम दीयों को पानी खिलाये ताकि वो ज्यादा तेल ना सोख ले। नारायण पंडितजी से पूछ कर माँ पूजा के शुभ मुहूर्त के बारे में पता करती थी और पंडितजी से पूजा सामग्री लिखवा कर पूजा की तैयारी भी शुरू कर देती थी।

दिवाली से दो दिन पहले धनतेरस के अवसर पर माँ रसोई में प्रयुक्त होने वाला कोई न कोई नया बर्तन खरीदती। कभी-कभी कोई आभूषण अथवा चांदी के सिक्के की भी खरीदारी करती थी। ऐसी खरीदारी हर घर में गृहणियां करती हैं और इसका स्वरुप आज भी नहीं बदला है। दिल्ली जैसे महानगरी में तो यह सम्पन्नता का प्रतीक त्यौहार है। छोटी दिवाली के दिन एक पुराने सूप पर पुराना दीया प्रज्वलित कर माँ घर के प्रत्येक कमरे यहाँ तक कि गोहाल घर में भी दिखाती और कहती जाती 'लक्ष्मी आये दरिद्रा जाए' फिर यम के इस दीये को घर के बाहर कुएं के जगत पर इस प्रकार रख आती कि इसकी लौ दक्षिणमुखी रहे।

दिवाली के दिन सुबह से ही माँ दिवाली के विविध व्यंजन तैयार करने में लग जाती थी। पापा ने घर पर ही गाय पाल रखा था। अतः दूध की कोई कमी नहीं थी। इस अवसर पर दूध के विभिन्न मिष्टान माँ स्वयं बनाती। खीर, दूध को ओट कर निकाले गए खोये के गुलाब जामुन और छेने की मिठाइयां और रसगुल्ले। अंत में बेसन के लड्डू और सूजी का हलवा। जहाँ तक मुझे याद है मिठाई के नाम पर बचपन में केवल जलेबी ही यदा-कदा बाजार से खरीदकर हमलोगों ने खाये होंगें, अन्यथा मिठाई के लिए हमने कभी बाजार का रुख नहीं किया। या फिर कभी बिरले जब घर पर यदि गाय न रही तभी बाजार से मिठाई खरीदा जाता था।

दिवाली की शाम से माँ दीयों में तीसी के तेल और बाती डालकर दीये तैयार करती और हम बच्चे इन्हें घर के बाउंड्री वाल और मुंडेरों पर सजाते जाते। फिर घी के दीयों की बारी आती जिसे हम घर के प्रत्येक कमरे में रखते जाते, यहाँ तक कि गोहाल और पंप-रूम में भी एक-एक दीया रखा जाता था। छुटकी, जो बहनों में सबसे छोटी थी और सबों की सबसे दुलारी थी, को पशुओं से विशेष प्रेम था। इस दिन हमारे घर के विश्वसनीय सेवक बिशुनधारी की मदद से वो गायों और बैलों को नहवा कर साफ़-सुथरा करवाती और उनके सींघों और खुरों की सरसों के तेल से मालिश करती थी जिससे वे चमक उठते थे। फिर इन पशुओं के गले में एक-एक घंटी और माला और मस्तक पर सिंदूर से टीका लगा इनका श्रृंगार पूरा करती - ऐसा लगता था ये पशु भी पर्व मनाने की पूरी तैयारी में हों जैसे।

सूर्यास्त के साथ ही दीयों को प्रज्वलित करने का काम होता। सारा घर जगमगा उठता था और इसके साथ ही जगमगा उठता था संपूर्ण वातावरण क्योंकि तक़रीबन यही समय होता था जब आस-पास के सभी घर दीयों के प्रकाश से जगमगा उठते थे। मुझे तो कभी-कभी लगता है कि ये दीये समाजवाद के सच्चे प्रतीक थे क्योंकि अमीर हो अथवा गरीब उन दिनों सभी लोग दीये से ही अपने-अपने घरों को प्रकाशमान करते थे। आज तो दीयों का चलन भी नहीं रहा। तब हमें दीयों की रौशनी का आनंद उठाने के लिए सिर उठाने की नौबत नहीं पड़ती थी जैसा अब बहुमंजिली अट्टालिकाओं की रौशनी देखने के लिए करनी होती है। तब सभी घर एक ही सतह पर होते थे। समाज का पैर धरती पर सुदृढ़ता से जमा था और सम्पन्नता में भी विनम्रता का भाव तारी होता था। तब समाज की तासीर ही ऐसी थी कि दिखावा कम था और सौहार्द अधिक। तब समाज के विभिन्न तबकों के बीच का अंतर इतना विशाल नहीं था जैसा अब है। लक्ष्मी-गणेश का आशीर्वाद प्रत्येक घर को इनायत थी। यह परिलक्षित होता था लोगों में संतोष की भावना को देखकर जो यह सुनिश्चित करते थे कि किसी की भी दिवाली हर्षोउल्लास के साथ मनाये बिना न बीते। लक्ष्मी-गणेश के आगमन को केवल धन की कसौटी पर कस कर नहीं आँका जाता था वरन यह सुख और शांति का प्रतीकात्मक पर्व था। इस सुख और शांति में जो ऐश्वर्य विधमान होता था वह धन के अति-संग्रह में नहीं। आज समाज में जिस प्रकार अति धन संग्रह का प्रचलन बढ़ गया है वही समाज में सर्वत्र फैले असंतोष और भ्रष्टाचार का कारक है- ऐसा मेरा व्यक्तिगत विचार है। करोड़पतियों की संख्या में वृद्धि हुई है, अमीर और गरीब के बीच की पाट चौड़ी हुई है और पर्वों को मनाने में सादगी का स्थान दिखावा ने ले लिया है।

बहरहाल मुख्य विषय पर पुनः आते हैं। दीये जल जाने के बाद इसके बाद घरौंदा पूजा होता था। घरौंदे को भी घी के दीयों से जगमगाया जाता और उसमें लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति को स्थापित किया जाता था। फिर घरौंदा लिखने का काम भी होता था। आँगन में जहाँ घरौंदा बनता था वहां की दीवार पर लक्ष्मी-गणेश की जयलिखने के बाद उसके नीचे समस्त भाई-बहनों के नाम लिखे जाते- कुल 32 नाम को लिखकर सूची पूरी होती थी। इन 32 नामों में हमारे पूजनीय पितामह के सारे पौत्र एवं पौत्रियों के नाम शामिल होते। नाम लिखने की यह परंपरा क्यों पड़ी इससे मैं वाकिफ नहीं हूँ पर यह किया जाता था। फिर तीनों बहनें लक्ष्मी-गणेश की पूजा करती, कुलिया-चुकिया भरती और पूजा की समाप्ति पर हम प्रसाद पाते। कुलिया-चुकिया भरने से तात्पर्य इसे खील बतासे लावे और भुंजे से भरना होता था।

दिवाली का वर्णन बिना पटाखे पूरा नहीं होता। पर इससे पहले घर पर पूजा के बाद पापा के साथ हम सभी बच्चे जीप से उस क़स्बे का एक चक्कर लगाते थे और क़स्बे की रौशनी का मजा लेते थे। किसी-किसी सहयोगी व्यापारियों के प्रतिष्ठानों पर भी पापा के साथ ही जाना होता जहाँ एक दूसरे को दिवाली की शुभकामनाएं दी जाती। इसी समय पापा से जिद्द कर हम पटाखे खरीदवाते। हालाँकि हमारे बुजुर्गों का मानना था कि पटाखे खरीदना पैसे में आग लगाने के समान था और पैसे का इससे बेहतर दुरूपयोग और कुछ नहीं हो सकता। पर हम बच्चों का मन रखने के पापा कुछ पटाखे रस्मी तौर पर अवश्य खरीद कर हमें देते थे और फिर घर वापस आ जाते। फिर ऊ-डेरा (बगल वाला घरजो हमारे 'ताऊजीजिन्हें हम ‘बाउजी’ कहते थेका था) बाबूजी और बड़ी माँ से मिलने और उनका आशीर्वाद लेने जाते। घर पर हम अपने हिस्से के पटाखे धीरे-धीरे छोड़ते इस इंतज़ार में कि दूसरों के पटाखे पहले ख़त्म हो जाए। यह क्रम तब तक चलता जब तक कि माँ हम सबों को खाना खाने की हाँक नहीं लगाती। रात दस्तरखान में पनीर की सब्जी से लेकर मौसमी सब्जियां होती जो घर के पीछे के खेत की होती थी। इसका लाजवाब स्वाद अब भी मन-मस्तिष्क पर तारी है। दिवाली ही वह अवसर होता था जब घर के पीछे के खेत के मेढ़ों की भी साफ़-सफाई होती थी जिसे गोहट काटना कहते थे। सर्दियाँ अपने आने की दस्तक दे देती थी और सर्दियों में उगाये जाने वाली मौसमी सब्जियों से बागान खिल-खिल जाता था। छठ आते-आते ललका आलू, रूई के फाहे से सफ़ेद गोभी, मीठे मटर-छिम्मी, खुशबूदार मेथी और धनिया और चटक स्वाद वाले टमाटर से शाकाहारी खाने की लज्जत कई गुना बढ़ जाती थी। वो स्वाद आज सब्जियों में मयस्सर नहीं जो खाने की ललक को बढ़ा देती थी। दिल्ली में हम आज आर्गेनिक फार्म उत्पादों के बारे में सुनते हैं पर उस दौर में सब्जियों में आज की आर्गेनिक सब्जियों से अधिक स्वाद था।

दिवाली की दूसरी सुबह हम सुबह-सवेरे उठ कर लॉन में ऐसे पटाखे ढूंढते थे जो पिछली रात फूटने से रह गए थे। ओस से भीगी घास पर पड़े ऐसे पटाखे भी भीग जाते थे जिन्हें हम सारे दिन धूप दिखाकर ठीक करते थे। बूढी दिवाली पर हम इन्हीं बचे पटाखे को छोड़ते थे।