Saturday, 25 April 2020

जीवन के रंग-अपनों के संग:. जब गए पहली बार बारात में! (26/04/2020)






1981 में मेट्रिक की परीक्षा देकर घर में बैठा बोर हो रहा था जब एक दिन पापा को माँ से यह कहते सुना कि अवध बाबू की तबीयत अचानक बिगड़ जाने की वजह से वे अपने बेटे की बारात लेकर जाने में असमर्थ हैं। पापा ने बताया कि उन्होने अवध बाबू को आश्वस्त किया है कि उनके रहते वे कोई चिंता न करें और यह कि उनकी जगह वे इस ज़िम्मेदारी को उठाने और उनके लड़के की बारात लेकर जाने की स्वीकृति दे चुके हैं। कुछ लोगों की राय थी कि शादी फिल वक़्त के लिए टाल दी जाये। किन्तु अवध बाबू को यह उचित नहीं लगा क्योंकि वधू-पक्ष ने सारी तैयारियां कर रखी थी और ऐसा करने से उन्हें काफी नुकसान होता।कल सुबह ही आरा के लिए निकलना होगा’- पापा ने माँ को बताया।

अवध बिहारी सिंह कस्बे के प्रतिष्ठित बाबू साहब हैं और पापा से उनकी अभिन्नता वर्षों पुरानी है। यों भी पापा कस्बे में सबकी मदद करने में हमेशा आगे रहते थे, अतः वे अवध बाबू की मदद से कैसे पीछे हट सकते थे? मैंने माँ से अनुनय विनय किया कि वो  मेरी पैरवी पापा से कर दें ताकि वे मुझे भी साथ ले चलने को राज़ी हो जाएँ। यों भी मेट्रिक के रिज़ल्ट आने में अभी देरी थी। माँ के कहने पर पापा तैयार हो गए पर हिदायत भी मिली, कहीं इधर-उधर मत निकल पड़ना। साथ रहना। गाँव का मामला है।  

अगली सुबह मैं बारात में चलने को तैयार हो गया। पाँच महिंद्रा जीप में बारात तिलैया से आरा को रवाना हुई। प्रत्येक जीप में छ से आठ लोग बैठे। मैं पापा के साथ उसी जीप में बैठा जिसे पापा स्वयं चला रहे थे। मेरे बगल में जसवीर भैया बैठे। चूंकि पापा ने अवध चाचा को आश्वस्त किया था कि वे दूल्हा की शादी सम्पन्न कराकर वापस बहू समेत उन्हें सकुशल सौंपेगें, अतः दूल्हे को साथ लेकर चलने की जिम्मेदारी उन्होने अपने ऊपर ली। जीप की पिछली सीटों में जसवीर भैया के चाचा ताऊ आदि बैठे। अनायास ही मैं दूल्हे का सहबाला बन बैठा। साँवले-सलोने जसवीर भैया को दूल्हे की पौशाक में सज-धज कर जीप में बैठ सरमाते देख मेरे युवा मन में भी तरंगें उठने लगी।

यों जब भी हमारा पटना जाना होता था तब पापा नाश्ते के लिए खुसरुपूर के ममता मोटल में जरूर रुका करते थे। ममता मोटल के नाश्ते का हमें पटना पहुँचने से भी अधिक इंतज़ार रहता था। शादी में शरीक होने की एक वजह ये भी थी। किन्तु खुसरुपूर से पहले और बिहारशरीफ़ से निकलने के तुरंत बाद जब यह काफिला मोढ़ा तालाब पर रुका तो मैं अचकचाया। पापा से पता चला नाश्ते का प्रबंध यहीं है। नाश्ता भी क्या था- पीछे आ रही जीप से टिन के दो तीन डब्बे उतारे गए और उसमें रखी घर पर बनी नमकीन-ख़ुरमा सबों को बांटा जाने लगा। कहाँ नाश्ते में टोस्ट और उबले अंडे की सोच रहा था और कहाँ ख़ुरमा और नमकीन। खैर अब कोई चारा भी नहीं था। चाय के साथ नमकीन पाकर तृप्त होने का असफल प्रयास किया। वो तो शुक्र था पापा का कि उन्होने प्रसिद्ध मोढ़ा तालाब के दो पेड़े दिलवा दिये तो गला तर हुआ।

एक घंटे के विश्राम के बाद यह काफिला पुनः आगे की यात्रा पर चल पड़ा। तय हुआ कि अगला पड़ाव सोन नदी के पार कोइलवर में रहेगा जहां दिन के भोजन के लिए बारात का ठहराव था। सुबह के नाश्ते का हश्र देखने के बाद दिन के भोजन के लिए कोई चाव बचा नहीं था। पटना शहर से बाहर पटना-आरा राजकीय राजमार्ग पर फुलवारीशरीफ़ के पास जीप रोक कर पापा पीछे आ रही जीपों का इंतज़ार करने लगे। चाय की एक गुमटी पास ही थी। चाय पीकर हम सब तरोताजा हुए। किन्तु पीछे आ रही चार में से जब दो ही जीप पहुंची तो पापा को आश्चर्य हुआ।  

अरे ऊ जीप में लइका (लड़का यानि जसवीर भैया) के फूफा रहीन। जरूरे पटना में ख़रीदारी खातिर रुकले बारन।‘- अवध बाबू के भाई ने खुलासा किया। पता चला कि शादी में पहनने के लिए दामाद जी के लिए जो शेरवानी खरीदी गयी थी वह उन्हें पसंद नहीं आई थी और तब से वे मूंह फुला कर बैठे हैं। अतः यह निर्णय हुआ था कि उन्हें पटना में किसी अच्छे शोरूम से शेरवानी खरीदवा दिया जाएगा। इसकी ज़िम्मेदारी जसवीर भैया के मामा के ऊपर थी। तो इसका मतलब था मामा और फूफा निश्चय ही पटना में ख़रीदारी में मशगूल हो गए थे और समय से आरा पहुँचने का उन्हें भान नहीं था।

और दूसरी जीप? उसका क्या?’- पापा ने पूछा।

लगता ह कि सफर खातिर तेल-पानी के इंतज़ाम हो रहल बा। ऊ जीपा में दूल्हा के बहनोई बारन।’- जसवीर भैया के छोटे चाचा ने खुलासा किया। बाबू साहब के बेटे के ब्याह में बिना तेल-पानी यानि मदिरा के सफर कैसे कटि- यह आम मत था। पापा ने निर्णय लिया कि चूंकि उन्हें भी कोइलवर में, जहां दिन के भोजन का इंतजाम था, के बारे में मालूम है अतः वे लोग आगे बढ़े और कोइलवर में ही मामा, फूफा और बहनोई का इंतज़ार किया जाये।

कोइलवर में दिन के भोजन का जैसा उत्तम प्रबंध था उसे देख मैं चकित हुए बिना नहीं रह पाया। शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों ही प्रकार के भोजन के साथ विभिन्न प्रकार की मिठाइयों और दही आदि का भी भरपूर इंतजाम था। मुझे असमंजस में देख पापा मुस्कुराए बिना नहीं रह सके। धीमे स्वर में उन्होनें मुझे इसका राज़ बताया,-‘सुबह नाश्ते की ज़िम्मेदारी अवध बाबू की थी जबकि दिन के भोजन का प्रबंध वधू-पक्ष वालों के जिम्मे था। अतः यह फर्क तो लाजिमी था। भोजन के बाद पापा ने प्रस्ताव किया कि अब यहाँ से शीघ्र ही बसंतपुर के लिए प्रस्थान किया जाये और वहीं पहुँचकर आराम किया जाये। शीघ्रस्य शुभम’- पापा का मत था। किन्तु पापा के प्रस्ताव पर सिवाय दो-एक बुजुर्गों के और कोई राज़ी नहीं हुआ।

गुतूल बाबू, आरा इहाँ से बीसे किलोमीटर तो बा और वहाँ से बसंतपुर केवल पंद्रह किलोमीटर। एक ही घंटे में पहुँच जायब। सात घंटा से चलत-चलत दो सौ किलोमीटर चल देले हियन। अभी अपराहन के दो बाजल बारे। अब तो तनिक कमर सीधी कर लेने दीह। ई धूप और उमस मा दिमाग फ्यूज़ होगईले बारे। तनिक सुस्ता लेवल जाये। पीछे से बाकी दोनों जीप की सवारी के भी आ जावे दीह। तबी सबै साथ चलेंगें।’- सबों ने एक मत से पापा के प्रस्ताव का खंडन कर दिया। और सभी अपनी-अपनी कमर सीधी करने के लिए जो पसरे तो वहीं ढेर हो गए। सबों को नींद का ऐसा झोंका आया कि किसी को समय और स्थान का बोध न रहा।

किन्तु पापा फिर भी नहीं माने और चलने को उद्यत हुए तो इस जीप के बुजुर्ग, दूल्हा और अन्य बाराती भी चलने को राज़ी हो गए। संभवतः पापा के हृदय पर अवध बिहारी बाबू को दिये गए वचन का बोझ था और वे अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति कुछ ज्यादा ही सचेत थे। पापा में यह गुण तो अवश्य था कि वे हर काम में अतिरिक्त सावधानी बरतते थे। यदि दस बजे की ट्रेन है तो वे नौ बजे ही स्टेशन पहुँच जाते। वहाँ कूलियों से पूछपाछ कर अमूक बोगी कहाँ लगेगी इसका पता करते और अधिक सामान न होने के बावजूद कूली अवश्य करते ताकि अंत समय में बिला-वजह बेकार की भाग-दौड़ न करनी पड़े। अतः यहाँ पापा का व्यवहार मुझे तो सामान्य ही लग रहा था किन्तु साथ चल रहे बुजुर्गों को पापा की यह ताकीद बेकार का कवायद लग रहा था। किन्तु पापा के समक्ष वे कुछ बोलने में असमर्थ थे। अंततः हम सब चलने को तैयार हुए। पापा को उसी स्थान पर बसंतपुर के एक सज्जन मिले। सामान्य परिचय के बाद जब पापा ने उनसे साथ चलने का अनुरोध किया तो वे सहर्ष तैयार हो गए। एक अतिरिक्त सवारी को बैठाने से अन्य लोगों को परेशानी तो हुई किन्तु वे पापा के रुतबे के समक्ष चुप ही रहे।

बाकी बाराती को वहीं छोड़ हम आगे की यात्रा पर निकल पड़े। यानि अब पाँच में से केवल एक ही जीप गंतव्य को अग्रसर था। हमारे वहाँ से रुखसत होने तक मामा, फूफा एवं बहनोई के जीपों की सवारी की कोई खबर नहीं थी। आरा से बसंतपुर का मार्ग बेहद ही खराब और घुमावदार था। आरा से धोबाबा-सराइया रोड से होते हुए आगे बाएँ मुड़कर आरा सलीमपुर रोड पर कुछ दूर चलने के बाद फिर बाएँ मुड़ना हुआ तब हम सब माँ मनरखनी मंदिर रोड पर आ गए और वहाँ से बसंतपुर गाँव पहुंचना हुआ जहां गाँव के बाहर ही जनवासे का इंतज़ाम था। खैर, उस सज्जन की मदद से हम सकुशल बसंतपुर पहुँचने में सफल रहे। यदि वे साथ नहीं होते तो संभवतः हम राह भटक गए होते। गाँव में पहुँचते ही आकाश पर काले-काले मेघ छा गए और जब तक हम जनवासे पर उतरे मूसलाधार बारिश होने लगा। यकायक मौसम में आए इस बदलाव को देख पापा के साथ आए बुजुर्गों ने उनकी समझ का लोहा मान लिया। उस सज्जन को साथ रखने का लाभ यह हुआ था कि गाँव तक पहुँचने में कोई दिक्कत नहीं हुई थी। दूसरे कोइलवर में नहीं रुकने का लाभ यह हुआ था कि हम सब बारिश से पहले जनवासे पर पहुँचने में सफल रहे थे।

जनवासे की व्यवस्था बस्ती से बाहर एक घने बाग में अवस्थित मिट्टी एवं चुना-सुर्खी की मोटी-मोटी दीवारों वाले एक बड़े हाल में किया गया था जिसकी खपरैल छत इतनी ऊंची थी जिसे देख हम बड़े विस्मित हुए। पता चला कभी यह बाबू-साहब (वधू-पक्ष) का हाथिसाल था। अब न तो बाबू-साहब की जमींदारी रही और न ही हाथी। अतः हाथिसाल का उपयोग अब बारात ठहराने में किया गया था। संभवतः वधू-पक्ष की संपन्नता दर्शाने के लिए ही हाथिसाल में व्यवस्था रखी गयी थी। बरातियों के आराम के लिए पूरे हाल में तोशक पर सफ़ेद चादर और गाव-तकिये रखे थे। पेट्रोमैक्स से रोशनी की व्यवस्था थी और चहुओर गुलाब जल और इत्तर का छिड़काव किया गया था जिसकी खुशबू समस्त फिजा में फैल रही थी। एक ओर तमोली पके मगही पान की तबकदार गिलोरियाँ लगा रहा था। दूसरी ओर मोची जूता पालिश करने में लगा था। एक धोबी बरातियों के कपड़े लकड़ी-कोयले वाले आइरन से ईस्त्री कर रहा था। एक नाई बरातियों की दाढ़ी-बाल बना रहा था। कोई उससे अपने नाखून काटने को कहता तो कोई सिर की चंपी करने के लिए कहता। सबसे व्यस्त वही दिखा। 35-40 बाराती में से केवल आठ-दस लोग ही अब तक पहुँच पाये थे। पीछे आने वाले बारातियों का इंतज़ार होने लगा। बारिश रुक गयी थी। शाम घिर आई थी। मच्छरों का प्रकोप बढ़ रहा था। जनवासे पर संध्या समय का नाश्ता वितरित किया जाने लगा। एक-एक बाराती के जिम्मे एक-एक डब्बा जिसमें सभी सूखे आइटम थे–नमकीन, लड्डू, समोसा और ख़ुरमा आदि। नाश्ते के बाद हम लोग बारात-दरवाजा के लिए तैयार हो गए। दूल्हा भी तैयार हो गया। किन्तु समस्या यह थी कि केवल दस बरातियों को लेकर बारात दरवाजा कैसे लगे। उसपर दूल्हा का फूफा और बहनोई दोनों नदारद थे। इन दोनों वी.आई.पी. के बिना बारात-दरवाजा लगाने का निर्णय कौन ले। इंतज़ार में रात के नौ बज गए। पिछले दो घंटे से वधू-पक्ष वाले भी सूप-पानी लेकर बारात को औपचारिक रूप से आमंत्रित कर उनके चलने का इंतज़ार कर रहे थे।

इतने में सूचना मिली कि माँ मनरखनी मंदिर कच्ची सड़क पर कुछ गाडियाँ फसी पड़ी हैं। दरअसल बारिश के बाद सड़क पर कीचड़ हो गया था जिसमें जीप के टायर धंस गए थे। जितना ही ज़ोर उसे निकालने के लिए होता उतना ही कीचड़ में टायर और अधिक धँसते चले जाते। अंत में एक ग्रामीण की मदद से उन दोनों जीप की सवारियाँ बस्ती तक पहुँचने में कामयाब हुई थीं। ये वही दो जीप की सवारियाँ थीं जिन्हें हम कोइलवर में छोड़ आए थे। यानि अब तक लड़के के फूफा, मामा और बहनोई की गाड़ियों की कोई खबर नहीं थी। इन्होने बताया कि पाँच बजे इनके चलने तक उनकी गाडियाँ कोइलवर नहीं पहुंची थी। इन दो गाड़ियों के बरातियों को इस बात की चिंता हुई कि बिना गाड़ी कल वापसी कैसे होगी। जीप को कीचड़ से निकालना अत्यंत दुष्कर कार्य प्रतीत हो रहा था। किसी के पास इसका कोई निदान नहीं था। सभी पापा के पास मशवरा को पहुंचे तो पापा उनकी समस्या को सुन मुस्कुरा दिये। लोगों को विश्वास हुआ कि वे कुछ ना कुछ रास्ता अवश्य निकालेगें। उन्होने जसवीर भैया को बुला भेजा और उनके आने पर उनके कान में कुछ कहा। जसवीर भैया के चेहरे पर इसकी प्रतिक्रिया से यही लगा कि उन्हें पापा की सलाह पसंद नहीं आई थी। किन्तु वे पापा की सलाह टाल भी नहीं सकते थे। मैंने देखा कि जसवीर भैया, जो अब तक बारात-दरवाजा के लिए व्यग्र हो रहे थे, यकायक गंभीर हो उठे थे। पापा ने उनके स्वसूर को बुला भेजा। वे तत्काल आकर हाथ जोड़ खड़े हो गए। समधी साहब, लइका रूठ गया है।-पापा ने उन्हें बताया।

बाबू-साहब ऐसी क्या बात हो गयी। अभी हुक्म करें। जो कहेंगें सो होगा। पर आप लड़के को मनाएँ और बारात-दरवाजा के लिए आमंत्रण स्वीकार करें।’-समधी साहब ने विनती की।

दरअसल लड़के के दोस्तों की गाडियाँ कीचड़ में फंसी पड़ी हैं। जब तक उन गाड़ियों को नहीं निकाला जाये तब तक लड़के के दोस्त बारात में क्या नाचेगें-गायेंगें और दोस्तों के बिना बारात-दरवाजा कैसे लगेगा?’- पापा ने स्पष्ट किया।

हुज़ूर, बस इतनी सी बात! हम अभी ट्रैक्टर भेजकर उन गाड़ियों को निकलवाले का इंतज़ाम करते हैं। आप बस बारात-दरवाजा के लिए बरातियों को तैयार कीजिये। सुना है अब तक मेहमान के फूफा, मामा और बहनोई भी नहीं पहुंचे हैं। उनका कब तक इंतज़ार किया जाये। हमारे सारे अतिथि बारात दरवाजे के बगैर ही हमारी हवेली से रुखसत न हो जाएँ। बाबू-साहब आप ऐसा न होने दें। गाँव में यह हमारी प्रतिष्ठा का प्रश्न है।’- समधी साहब ने एक ही सांस में पापा से अपनी सारी बातें कह डाली।

समधीजी! आप निश्चिंत होकर सूप-पानी की विध पूरी करें। हम बारात लेकर चल रहे हैं। अब यहाँ कोई किसी का और इंतज़ार नहीं करेगा।’-पापा ने उन्हें आश्वस्त किया तो वे खुश हो गए। पापा के निर्देश पर सभी बाराती बिना फूफा, मामा और बहनोई के ही बारात-दरवाजे के लिए चलने को सहमत हो गए। साथ आए अन्य बुजुर्गों ने सोचा कि चूंकि इस निर्णय की जिम्मेदारी भी पापा की ही है जिन्हें अवध बाबू ने अपने स्थान पर कमान संभालने को दिया है, अतः इस वजह से यदि फूफा, मामा और बहनोई आदि पहुँचकर नौटंकी करते हैं तो उन्हें संभालने की जवाबदेही भी पापा  की ही होगी।     
 
समधी साहब ने अपनी बात का मान रखते हुए तत्काल ट्रैक्टर भेज गाड़ियों को कीचड़ से निकलवाया। अगले एक घंटे में दोनों जीप जनवासा पर आकर खड़ी हो गयी । खैर, सब के तैयार होते-होते रात्रि के दस बज गए। गाँव के संदर्भ में तो यह समय अर्धरात्रि के समान था। अंधेरा घना होता जा रहा था। केवल पेट्रोमैक्स का सहारा था। ताशा पार्टी वाला जल्दी करने की हड़बड़ी मचा रहा था। बारात चली। ताशा पार्टी के झंकार से बाग-बगीचा गूंज उठा। राजपूती परंपरा को निभाते हुए बंदूकें निकल आई। धड़ा-धड़ हवाई फ़ाइरिंग हुए। गोलियों की आवाज़ ने मानो समा बांध दिया। पापा स्वयं जीप में दूल्हा को लेकर चले। अबकी बार दूल्हा सहबाला एवं सारथी के बीच बैठा। बस्ती की संकड़ी सड़कों पर पापा हौले-हौले गाड़ी चला रहे थे। बस्ती की गलियों के दोनों ओर दरवाजे-दरवाजे स्त्रियों का झुंड खड़ा था। वे सभी दूल्हे को निरख रही थी और आपस में हंसी-ठिठोली करती उसके रूप की तारीफ कर रही थी। नयी-नवेली दुल्हनें अपने-अपने मूंह में साड़ी का आंचर दिये गाड़ी के अंदर यों निहुरती और आहें भरती जैसे वे कन्याय (दुल्हन) की किस्मत पर रश्क कर रही हों।  

लइका सुंदर बाटे पर उमर तनिक कम बा?’ वे आपस में बतियाती। मुझे उनकी बातें समझ में नहीं आई। मैं जसवीर भैया की ओर देखता और सोचता कि क्या उनकी उम्र अब भी शादी के लिए कम है? अच्छा खासा मूछें चेहरे पर नमूदार हैं। दूसरी ओर पापा इन स्त्रियों की बातें सुन केवल मंद-मंद मुस्कुरा देते थे।

जिसका मुझे था इंतज़ार, जिसके लिए था दिल बेकरार, वो घड़ी आ गई, आ गई, आ गई’-अमिताभ बच्चन की सुप्रसिद्ध फिल्म डॉन का गाना जिस हवेली के परकोटे से लाउडस्पीकर पर पूरे शोर के साथ बज रहा था बाबू-साहब की उसी हवेली के सामने बारात आकर रुकी। सत्तर-अस्सी के दशक में यह फिल्मी गाना हर शादी स्थल पर बजा करता था। जीप के रुकते ही मैं गाड़ी से उतर पड़ा ताकि द्वार पर खड़ी औरतें दूल्हे की द्वार परिच्छन की रस्म पूरी कर पाएँ। लड़का तो हीरा के कन्नी बा।’- वहाँ उपस्थित स्त्री समूह जो दूल्हे के परिच्छन के इंतज़ार में खड़ी थी मुझे देखकर बोल पड़ी।

ई लड़का नईखे बा। लइका तो आप ही के उतरावे उतरहीन। लइका के परीछहि तबही तो लइका उतरही।- पापा ने उन स्त्रियों की गलतफहमी दूर करते हुए जसवीर भैया को आगे आने को कहा और उन्हें दूल्हे का मौर पहना दिया। यकायक उन स्त्रियों की सारी गलतफहमियाँ दूर हो गयी और उनके साथ ही मेरी गलतफहमियाँ भी दूर हो गयी थी। उन स्त्रियों ने बारी-बारी से वर-परिच्छन किया। उनमें से एक, जो संभवतः जसवीर भैया की सासु माँ रही होंगी, ने मुझे सहबाला का नेग दिया।   

द्वार-पूजा के गीत गाकर और दूल्हे को परिच्छ के वधू-पक्ष वाले लड़के को घर के भीतर ले गए जबकि बारात जनवासे पर लौट गया। जनवासा पर रात्रि-भोज का बेहतर प्रबंध था। इस समय देसी-विदेसी दारू का भी प्रबंध था और विशेष प्रबंध था बनारस की एक नाचवाली का। अच्छा खाना खाकर बाराती नाचवाली की मजलिस में बैठे। किन्तु यह मजलिस हिन्दी फिल्मों वाली मजलिस नहीं थी। अधेड़ उम्र की एक औरत, जिसमें कहीं कोई कशिश बाकी नहीं रह गयी थी, को देखकर लोग यों बावरे हो उठे मानो वो हूर की परी हो। यह नचनिया भी अपनी भाव-भंगिमाओं से उन बरातियों को यों रिझाने लग गयी जैसे रेगिस्तान में कैकटस की हरियाली से ही राही भावविभोर हो उठा हो। नाचवाली गा रही थी, पिराय मोरी अंगिया, बलम परदेसिया। बिशेसर चाचा चिहुँक उठे, कैसे पिराय जरा बताती चलो। बिशेसर चाचा, जिनसे मैं सदा रीति-नीति और आचार-व्यवहार की बातें सुनता आया था की यह उन्मुक्त अभिव्यक्ति सुन भौचक रह गया। उस नाचवाली के प्रति उन जैसे बुजुर्ग में उमड़ रहे अनुराग को देख मैं अचंभित था। देर रात जब नाच का कार्यक्रम खत्म हुआ और मैं एक नींद सोकर उठा तो देखा वे अब भी उस नाचवाली से कुछ खुसुर-फुसुर कर रहे थे। इस एक रात के स्टैंड में किसका कितना लाभ-हानि हुआ पता नहीं चला किन्तु उस उम्र में भी मुझमे यह समझ थी कि इस गुफ्तगू में नुकसान में बिशेसर चाचा ही रहे होंगें। कभी क्या किसी नाचवाली ने भी किसी को आबाद किया है?   

दूसरे दिन प्रातः एक अन्य समस्या मूंह बाए खड़ी थी। उस जनवासे में टॉइलेट का कोई प्रबंध नहीं था। सुबह दिशा-मैदान के लिए सारा क्षेत्र खुला पड़ा था। कहीं भी किसी भी खेत में बैठ कर फारिग हो लें, कोई रोकटोक नहीं था। मैं बड़ा असमंजस में पड़ा। कभी ट्राइ जो नहीं किया था। लोटा लेकर निकल पड़ा। यहाँ खेत भी इतने समतल और खेतों के बीच की आड़ भी इतने पतले और कम ऊंचाई के कि कहीं ओट में बैठना भी मुहाल। किसी को भी आपके तशरीफ के टोकड़े के दर्शन हो जाए। अपने छोटानागपुर की पथरीली भूमि जहां खेतों में मोटे-मोटे आड़ होते हैं याद हो आए। चलते-चलते एक आम के बागान में पहुंचा जहां पेड़ का ओट सबसे सुरक्षित स्थान लगा और बैठने का उपक्रम किया। अभी पूरी तरह फारिग भी नहीं हुआ था कि लाल-लाल चीटियों का एक समूह पेड़ से नीचे की ओर और एक दूसरा समूह नीचे ज़मीन से पेड़ पर चढ़ता नज़र आया। हमने पाया कि हम इनकी राह में ही बैठे हैं। एकाएक ख्याल आया कि कहीं इन चीटियों ने काटा तो वापस लौटने तक इसका लहर न उतरे। किसी प्रकार जल्दी-जल्दी निबट कर जनवासे पर लोटा लेकर लौटा। नहाने के लिए बाबू-साहब के खेत पर कुएँ पर लगे पम्प पर जाने का निर्देश मिला। पम्प पर मोटर चल रहा था। पानी के मोटे धार में सभी बाराती नहाने का लुत्फ उठा रहे थे। हमारे लिए ये भी एक नया अनुभव था। खैर नहा-धोकर तैयार हुआ तब तक बरातियों को  नाश्ते के लिए बुलावा आने लगा। नाश्ता में नाश्ते के अलावे गाली-गीत भी परोसे गए। गीतों के माध्यम से इतने भयंकर-भयंकर गाली सुनने को मिले कि कान लाल हो गए। नाश्ता के बाद विदाई का रस्म हुआ। एक डोली में दुल्हन को बिठाया गया। रोने-धोने के बीच कहार डोली उठाकर चल पड़े। औरतें विदाई गीत गाने लग गईं- छोड़ बाबुल के घर बेटी हुई हैं पराईन, देखत रही जाहि हैं बापू माँ बेटी हुई हैं पराईन।

गाँव के सीमाने पर डोली से उतार कर दुल्हन को जीप में बिठाया गया। मैं पीछे बैठा। पापा पुनः चल पड़े। रास्ते में कोइलवर में, जहां कल अपराहन दिन के भोजन की व्यवस्था थी, बाकी दोनों जीप के बारातियों को हमारा इंतज़ार करते पाया। पता चला देर रात वे रास्ता भटक गए थे और काफी दायें बाएँ घूमने के बाद भी वे बसंतपुर नहीं पहुँच पाये थे। अतः उन्होने वापस कोइलवर लौटकर बाकी बरातियों के वापस आने का इंतज़ार करने का फैसला किया था। फूफाजी अब तक पटना में खरीदी गयी नई शेरवानी ही पहने थे। यह काफिला शाम तक वापस तिलैया लौट आया जहां पापा अवध बिहारी बाबू के जिम्मे उनके पुत्र और पुत्रवधू को सुपुर्द कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हुए।

उपसंहार

घर पर माँ पापा का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी। माँ के पूछने पर कि सब कुछ सही सलामत निपट गया, पापा ने उन्हें बताया कि शुक्र करो सब सही सलामत निपट गया वरना आज तुम भी द्वार पर बहू की स्वागत कर रही होती। माँ के असमंजस  को दूर करते हुए पापा ने बताया कि उस रात जनवासे पर लौटते हुए गाँव के दो-एक संभ्रांत बुजुर्गजन उनके साथ हो लिए थे कि इस लड़के का रिश्ता भी तय कर ही दिया जाये। बाबू साहब आप जो कहेंगें वो हमें स्वीकारी होगा। जब पापा ने उन्हें बताया कि वे बाबू-साहब नहीं वरन कायस्थ हैं तो उन लोगों का कहना था कि हम आपको अपने गाँव के ही सम्पन्न कायस्थ गृहस्थ की सुंदर-सुगढ़ कनिया (कन्या) के रिश्ते का प्रस्ताव देते हैं बस आप हाँ तो कहें। पापा ने माँ को बताया कि उस रात बहुत मुश्किल से वे उन सज्जनों से अपना पीछा छुड़ाने में सफल हो पाये थे।   



       


4 comments:

  1. I could not understand a few words but didn’t matter in the whole schema of understanding. A vivid sketch of a rural marriage.Thoroughly enjoyed

    ReplyDelete
    Replies
    1. Thank you, Nirmal! But it was all Hindi with few words in Bhojpuri.

      Delete
  2. So vivid, one lived through it. Great skills.

    ReplyDelete