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| हजारीबाग बस स्टैंड |
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| वो देहाती दुनिया! |
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| अभ्रख नागरी- झुमरी-टेलातिलैया |
पिछली गर्मियों में जब रांची
से अपने घर तिलैया जाना हुआ तो पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए मैंने यह सफर बस से
करने की ठानी। एक समय था जब दुनिया सिमटी हुई सी थी। समस्त संसार का विस्तार उत्तर
में तिलैया से पटना और दक्षिण में तिलैया से रांची तक ही केन्द्रित था। पटना दीदी
का ससुराल था और रांची, हजारीबाग क्रमशः
यूनिवर्सिटी एवं पापा के कार्य के सिलसिले में जाना होता था। आज इतने वर्षों बाद
भी बस के इस सफर में कोई बदलाव देखने को नहीं मिला। केवल यात्री किराए बढ़ गए हैं।
इधर बस यात्रा के अलग फलसफे हैं। जब आप पूछेंगें बस कहाँ जा रही है तो एजेंट आपसे
पूछेगा आपको कहाँ तक जाना है। ‘तिलैया’ सुनते ही बोल पड़ा बैठ जाइए बस ‘तिलैया मेल’ है। ‘तिलैया’ एवं ‘तिलैया मेल’ में बड़ा महीन सा फर्क है जो इस रूट
पर यात्रा करने वालों को ही पता होता है। यदि एजेंट ‘तिलैया’ बताता है तो इसका मतलब है बस ‘तिलैया’ तक जाएगी किन्तु यदि एजेंट ‘तिलैया मेल’ बोलता है तो इसका मतलब है बस आधा रास्ता यानि हजारीबाग तक ही जाएगी और
इसके बाद वो एजेंट आपको बतौर ‘मेल’ दूसरे बस में ‘ट्रान्सफर’ कर देगा जो ‘तिलैया’ जा रही होगी। अब आपकी किस्मत अच्छी हुई तो कन्नेक्टेड बस मिल जाएगी वरना
संध्या समय आप यह सोचते कूढ़ते बिताएंगें कि पता नहीं अगली बस मिले भी या नहीं।
हजारीबाग पहुँच कर वो एजेंट आपको यों नज़रअंदाज़ कर देगा मानो उसने आपको कभी देखा ही
नहीं है। आप उससे लड़ भी नहीं सकते कि ‘तिलैया’ कह ‘तिलैया मेल’ वाली
बस में बिठा दिया क्योंकि अपने घर में कुत्ता भी शेर होता है। बहरहाल ‘तिलैया’ वाली बस में बैठ गया।
‘भैया, बस कब तक खुलेगी?’- इस प्रश्न पर वो चट जवाब
देकर आश्वस्त किया कि बस, दस मिनट में बस खुलने ही वाली
है। किन्तु यह दस मिनट बीते न बीते। गर्मी की उमस अलग। किन्तु यह मान कर चलें कि
इस दरम्यान दर्जन भर रेड़ीवाले अपने सामानों की मार्केटिंग करते बस में चढते-उतरते
आपको बोर नहीं होने देंगें। अपना माल बेचने के क्रम में इनकी बोली लगाने की क्षमता
एवं विभिन्नता पर एक ब्लॉग अलग से। फिलहाल, बस के खुलने
का इंतज़ार है क्योंकि बस खुलेगी तभी जब वो ठसाठस भर जाएगी। इस समय एजेंट यात्रियों
की यों मिन्नतें करता है जो ‘ग्राहक भगवान का स्वरूप
होते हैं’ के कहावत को चरितार्थ करती प्रतीत होती है। ‘सीट है?’ के जवाब में वो सभी को आश्वस्त करता
गया कि बस खाली है। ‘लाईडिस’ यानि ‘महिला’ सवारी
के लिए विशेष रूप से सीट ‘अरेंज’ करने में लगा रहा। ‘जनाना’ सवारी को सीट देने के बाद उसके साथ के ग्रामीण ‘मरदाना’ सवारी के प्रति वो लापरवाह ही रहा। वो
बेचारा भी इसी में संतोष किया और खड़ा रहा कि कम से कम ‘लाईडिस’ को सीट तो दिया।
खैर भगवान को याद करते-करते
बस खुली। अब भरी बस में एजेंट जहां यात्रियों से भाड़े के पैसे वसूलने लगा वहीं
दूसरी ओर सड़क पर संभावित यात्रियों पर भी एक नज़र रखे रखा। आप यात्रा टिकट देखकर
प्रश्न न करें और जी.एस.टी. की बात न करें तो और भी बेहतर। टिकट में बस इतना भर
देखें कि किराए की रकम ठीक-ठीक लिखी है ताकि आगे आनेवाला एजेंट आपके आगे के सफर को
अँग्रेजी वाले ‘सफ़र’ में
न बदल दे। जिन यात्रियों को सीट नहीं मिली वे भाड़े में कटौती के लिए एजेंट से झगड़
रहे हैं किन्तु अब जब बस भर गयी है, वो बेमुरव्वत होकर
उन्हें या तो पूरे भाड़ा देने के लिए कह रहा है अन्यथा बस से उतार देने की धमकी दे
रहा है। धीरे-धीरे सरकती हुई बस बूटी मोर तक पहुंची किन्तु वाह रे एजेंट की
दरियादिली- रास्ते में ‘हाथ देने’ वाले किसी भी ग्रामीण को उसने निराश नहीं किया और उन्हें सब्जी-भाजी की
तरह बस में लादता चला गया। ये ग्रामीण भी बिना किसी उज्र लदते चले गए। ठसाठस भरी
बस में सांस लेना भी दूभर हो गया। अब एजेंट यात्रियों को उनके गंतव्य के अनुसार बिठाना शुरू किया। ‘ए भैया, सीट छोड़कर खड़े हो जाओ। ओरमांझी के लिए सीट पकड़ कर बैठा है। सर जी को
हजारीबाग तक जाना है’।– मैंने देखा कि
कुछ देर पहले जिस ग्रामीण को यात्रियों के अभाव में भगवान भाव से आदर के साथ
बिठाया था उस ‘भगवान’ को
उसने हड़काकर उठा दिया है और उस सीट को दूर गंतव्य के यात्री को बेहिचक ‘अलाट’ कर दिया है। जब बस का एजेंट अपने 'भगवान' के साथ ऐसा बर्ताव कर सकता है तो फिर दिल्ली के नेता जनता जनार्दन के धोखा करें तो क्या आश्चर्य! आखिर सीढ़ी दर सीढ़ी ही तो एजेंट उन तक पहुंचेगा।
बस
अब पूरी तरह भर चुकी थी। बस के बेबस यात्रियों को भगवान भरोसे छोड़ वो एजेंट अपना
कमीशन लेकर उतर चुका था। ठीक
उसी तरह जैसे नेताओं ने
इनका वोट लेकर बिहारियों को आनंद-विहार बस अड्डे पर
भगवान भरोसे छोड़कर चले गए थे।



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