Sunday, 10 May 2020

जीवन के रंग- अपनों के संग- रविवार का दिन यानि हैयर-कट का दिन (10/05/2020)


इस लॉकडाउन के दरम्यान जो समस्या धीरे-धीरे सुरसा की मुंह की भांति बढ़ती जा रही है वो है सिर के बाल। प्रायः महीने का अंतिम रविवार हैयर-कट का होता था। किन्तु महीने के अंतिम सप्ताह में ही यकायक लॉक-डाउन की घोषणा हो गई। अब यह लॉक-डाउन एक महीने से ऊपर होने को आया। इन दो महीने में खरावा-खरावा बढ़ रहे बाल इतने बढ़ गए कि सिर पर अब ये ऐसे दिखते हैं जैसे हरियाणा राज्य में नेवार से लदे ट्रैक्टर-ट्रेलर जिसमे नेवार की मात्रा इतनी अधिक होती है कि ट्रेलर उसी में छिप जाता है। इसी तरह सिर के बालों में चेहरा छिप गया है। मेरा मानना है कि हैयर कटिंग एक कला है और इसे स्टाइल में काटने वाले नाई एक हुनरमंद कलाकार। यदि गाँव-देहात में रहते तो हमारा भी बचपन का बिल्लू जैसा कोई दोस्त घर पर आकर बाल बना जाता, किन्तु महानगरों में यह फैसिलिटी उपलब्ध नहीं है। महानगर में रहने के कुछ लाभ हैं तो कुछेक हानियाँ भी। आज के दौर में महानगरों में बाल बनवाना एक ट्रीट से कम नहीं। महानगरों में सैलून सिर्फ आपके बाल नहीं बनाते वरन आपके व्यक्तित्व का सम्पूर्ण मेकओवर करते हैं, - लो फेड, हाइ फेड, मिड-फेड, क्रू-कट, टेपर, कुईफ़्फ़, स्पाइक्स और कितने ही स्टाइल आज आपको देखने को मिल जाएगें। पुरुष प्रसाधन पर इतने प्रयोग पहले कभी नहीं हुए। महानगरीय जीवन जितना पेचीदा है उतना ही पेचीदा है यहाँ के हैयर-स्टाइल। अब तो यह रोग गाँव-देहात तक फैल गया है। अब वहाँ भी ब्रिक सैलून देखने को नहीं मिलते। ईंट पर बिठाकर, आईना ग्राहक के ही हाथ में दे, हजामत बनवाने का चलन अब नहीं रहा। अब कोई फिल्मों के सुपर स्टार के हैयर स्टाइल पर अपना हैयर सेट करवाना नहीं पसंद करता है, जो कि पहले बड़ी आम बात थी। 

बचपन में हैयर-कट एक समय नष्ट करनेवाला काम जान पड़ता था। दस-पंद्रह मिनट तक स्थिर बैठे रहना काफी कष्टप्रद होता था- किसी सजा से कम नहीं। अतः बाल न बनवाने के कई बहाने होते थे। किन्तु पापा भी हमें छोड़ने वाले नहीं थे। घर पर सुबह-सवेरे ही नाई चला आता और शुरू हो जाता हम तीनों भाइयों का हैयर-कट। वो दौर हिप्पियों का था जिनके लंबे-लंबे बाल हुआ करते थे। किन्तु हमें लंबे बाल रखने की इजाजत नहीं थी। नाई का बड़ा मान-मन्नौवल करते कि हमारे लूक को वो खराब न करे। पर वो भी परले दर्जे का ही दुष्ट था। ऐसा कटोरी कट बाल बनाता कि अगले एक सप्ताह तक चेहरा फूटबाल की तरह गोल-मटोल दिखता। आज के दौर में तो वो पारंपरिक नाई भी लुप्त होता जा रहा है। मुझे याद है बचपन में जब कभी घर पर कोई अनुष्ठान यथा सत्यनारायण की पूजा अथवा कोई और जलसा होता और पास-पड़ोस में न्योता आदि भेजना होता तो माँ नाई को बुलवाती और उसे एक कागज़ पर संदेश लिखकर दे देती थी। उसी कागज़ पर नीचे आमंत्रित अतिथियों के नाम लिखे रहते थे। वो नाई घर-घर जाकर सभी आमंत्रित अतिथियों के हस्ताक्षर करवा कर वो कागज़ के हवाले कर जाता था। बदले में माँ उसे कुछ अनाज और कुछ रुपये देती थी। और पीछे जाएँ तो नाई कितनी ही शादियाँ तय करवाता था। जजमानी व्यवस्था का यह एक अदद उदाहरण था। किन्तु स्व-सम्पूर्ण गाँव के नष्ट होने के साथ ही जजमानी व्यवस्था नष्ट हो गयी और गाँव के विभिन्न वर्गों का एक दूसरे पर निर्भरता भी खत्म हो गयी। बाजारवाद ने भारतीय जीवन शैली को पाश्चात्य जीवन शैली में ढाल दिया और पारंपरिक गँवईं अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दिया।

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