इन दिनों कोरोना ने उन
दिनों की यादें ताज़ा कर दी है जब हम युवा थे और हमारे शौक जुदा थे। इलेक्ट्रॉनिक
मीडिया, मोबाइल और इंटरनेट के इस दौर में समाज में पढ़ने की प्रवृति में कमी आई है। इसका स्पष्ट प्रमाण है कि जहाँ आज हर चौक-चौबारे पर मॉल और पिज़्ज़ा
बर्गर की दुकानें मिल जाती हैं वहां किताब की दुकान के लिए आपको कदाचित मीलों चलना
पड़ जाए। दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र में केवल एक ही दुकानदार
है जो फुटपाथ पर अपनी दूकान लगाता है। किताबों और पत्रिकाओं
को बेचने से ज्यादा उसका धंधा इन्हें उधार पर पढ़ने देने से चलता है। एक-चौथाई मूल्य पर वो नॉवेल उधार पर तीन से चार दिनों के लिए देता है। ऐसे चार ग्राहक मिल जाए तो किताब का मूल्य निकल आता है। खरीद कर पढ़ने की प्रवृति में निश्चय ही कमी आई है और व्यक्तिगत लाइब्रेरी तो अब बीते जमाने की बात हो गई है।
पढ़ने के प्रति उदासीनता की एक दूसरी वजह भी है। आजकल हर साहित्यिक कृति को छोटे परदे पर उतारा जा चुका है। किसी भी भाषा में शायद ही ऐसी कोई साहित्यिक कृति होगी जिस पर
आधारित टेली-सीरियल बनने से रह गए हों! बच्चों में जे. के. रोलिंग की सात शृंखला में
लिखी हैरी पॉटर काफी प्रचलित है। किन्तु इन सातों ही पुस्तकों
पर फिल्में बन गई है और यह काफी लोकप्रिय भी है। भारतीय तिलिस्म
की समस्त कहानियों यथा वैताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी आदि पर दूरदर्शन धारावाहिक बना
चुका है। अस्सी और नब्बे के दशकों में ये काफी लोकप्रिय भी
रहीं। जब सब कुछ देखने को मिल जाता है तब पढ़ने का क्या लाभ?
किन्तु मेरी समझ से यह सोच गलत है। जब हम इन कहानियों को दादी
अथवा नानी से सुनते थे अथवा स्वयं पढ़ते थे तो हमारी कल्पनाशक्ति हमें ऐसे मायावी संसार
में ले जाता था जिसकी समस्त बारीकियों को हम स्वयं बुनते थे। किसी
निर्देशक की सोच हमारी सोच नहीं बन पाती थीं जैसा आजकल हो रहा है।
यह कल्पनाशक्ति ही हमारी मेधा को बढ़ाने में सहायक होता है।
किन्तु एकल परिवार व्यवस्था और प्रिंट मीडिया की कमी एक ऐसी रिक्तता स्थापित कर रहा है जो निश्चय ही बालमन
के लिए सही नहीं है। आज के दौर में मुंशी प्रेमचंद अथवा सत्यजीत
रे की लिखी कहानियां शायद ही कोई बच्चा पढ़ता हो। बाल-पत्रिकाओं
की संख्या में भी भारी कमी
आई है। कईं तो बाजार से गायब ही हो गईं हैं। जब टेलीविज़न ने हमारे जीवन में इतनी पैठ नहीं बनाया था तब आम-मानस पत्रिका और उपन्यास पढ़ा करता था। टाइम्स ग्रुप का 'पराग', हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप का 'नंदन', दिल्ली
प्रेस का 'चम्पक, चक्रपाणि एवं बी नागि रेड्डी का 'चंदामामा, और बंगाल का 'सन्देश'
काफी लोकप्रिय बाल-पत्रिकाएं थीं। अफ़सोस आज 'चम्पक' एवं 'नंदन'
को छोड़ सारी बाल-पत्रिकाएं अतीत का हिस्सा बन कर रह गई हैं। 1947
से लगातार छपने वाला 'चंदामामा' ने 2013 में दम तोड़ दिया। इसी
प्रकार साठ के दशक में शुरू हुई बाल-पत्रिका 'पराग' का संपादन एक समय हिंदी भाषा के
वरिष्ठ लेखकों यथा सर्वेश्रवर दयाल सक्सेना, कन्हैयालाल नंदन, हरेकृष्ण देवसरे आदि
ने किया था।
किन्तु
यह पत्रिका एक दशक बाद ही बंद हो गई। इसी प्रकार सत्यजीत रे
के संपादन में सुप्रसिद्ध बंगाली पत्रिका 'सन्देश' के हिंदी संस्करण का भी प्रकाशन
अब बंद हो चुका है। इसके अलावे 'दीवाना', ‘लोट-पोट’ आदि कुछ
अन्य बाल-पत्रिकाएं थीं जो काफी दिनों तक प्रकाशित होती रहीं और फिर बंद पड़ गईं। हम खुशनसीब थे कि हम उस दौर में पले-बढे जब बालपन में हमें इन
सभी बाल-पत्रिकाओं को पढ़ने का सौभाग्य मिला। चित्र-कथा (कार्टून
पुस्तकों) की बात करें तो 'अमर चित्र कथा', 'चाचा चौधरी, 'बिल्लू और बबली' के अलावे
‘आर्चिज’ एवं ‘टिनटिन’ के
कार्टून के अलावे इंद्रजाल
कॉमिक्स से प्रकाशित होने वाला 'फैंटम' एवं 'मैनड्रैक' शृंखला की कॉमिक पत्रिकाएं पढ़ते
हुए जाने कितनी ही पीढ़ियां बचपन से युवावस्था में प्रवेश की होगी।
इसी प्रकार उन दिनों मेरठ 'बाल पॉकेट बुक्स' का गढ़ हुआ करता था। न केवल जासूसी उपन्यास वरन सामान्य बाल उपन्यास भी उन दिनों खासा
लोकप्रिय था। प्रायः सभी जासूसी उपन्यासों में युवाओं की जोड़ी
होती थीं जो मुश्किल से मुश्किल केस को चटपट हल कर देती थी। एस.
सी. बेदी सृजित ‘राजन-इक़बाल’ हो अथवा, ‘रंगा-गंगा’ सीरीज- ये जासूसी उपन्यास अपने समय
में खासे लोकप्रिय थे। बचपन में यह कल्पना कर रोमांच हो आता था कि हम भी किसी भूतहा कोठी के
रहस्य को सुलझा रहे हैं। अंग्रेजी में एनिड ब्लायटन की जासूसी
उपन्यास काफी लोकप्रिय थीं। यही हाल मिल्स एंड बून की रूमानी
उपन्यासों का था।
इन सभी बाल-पत्रिकाओं को खरीद कर पढ़ने के लिए जितने पैसे की
आवश्यकता थी बचपन में वो बहुधा हमारे
पास नहीं हुआ करता था। बिरले ही कभी रुपये दो रुपये पापा से
मिल जाया करते थे।
इस
स्थिति से निपटने के लिए हम मित्रों ने एक लाइब्रेरी खोलने का निर्णय लिया ताकि हर
कोई इस लाइब्रेरी में अपनी जेब-खर्च से पुस्तक खरीदकर योगदान देता रहे जिसे सभी साझा
रूप में पढ़ पाए। सामाजिक सहभगिता से यह हम बच्चों का पहला
सरोकार था। वो पत्रिकाएं जो अब तक किसी एक की 'संपत्ति' हुआ
करती थी अब सार्वजनिक 'संपत्ति' थी, जिसका लाभ हर सदस्य उठा
सकता था। अपनी निजी चीज़ें (किताबें और पत्रिकाएं), चाहे वे
कितनी ही कम मूल्य की क्यों न रहीं हों, को अपने मित्रों से साझा करने के लिए जिस विवेक
की आवश्यकता होती है उसके अंकुर इस लाइब्रेरी से ही पड़े। देवी मंडप रोड में इस लाइब्रेरी के ऑफिस का विधिवत
उद्घाटन भी हुआ और इसे 'ओरिएंट लाइब्रेरी'
नाम दिया गया। हमने इस लाइब्रेरी के मेंबर बनाये जिनके मेम्बरशिप
फी से हम इस लाइब्रेरी को और अधिक समृद्ध करते गए। आज भी मुझे
लगता है हर प्रकाशन समूह को बच्चों के लिए एक बाल-पत्रिका अवश्य प्रकाशित करनी चाहिए। समाज के प्रति इन प्रकाशन समूह की यह कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी
होनी चाहिए और इसे सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए।





