Saturday, 15 January 2022

‘तिले-तिले बढ़ोगे न’- मकर-संक्रांति का पर्व और माँ का यह प्रश्न (15/01/2022)


माँ की स्मृतियों को समर्पित यह ब्लॉग 

मकर राशि में सूर्य के प्रवेश को हिन्दू धर्म में मकर संक्रांति के पवित्र पर्व के रूप में मनाया जाता हैं। इस दिन से भगवान सूर्य उत्तरायन होते हैं। इस दिन से हिन्दू धर्म में पवित्र अनुष्ठान आरंभ हो जाते हैं। यह पर्व शुद्धता का प्रतीक पर्व है। बचपन में मकर संक्रांति की ढेर सारी मीठी-मीठी यादें जुड़ी हैं- मीठी-मीठी कहने से तात्पर्य है तिलकुट से। यह दिन दही-चूड़ा और तिलकुट को समर्पित था। ठंड के इस मौसम में भी माँ की ओर से सबों को प्रातः ही स्नान करने का निर्देश मिलता था जिसे हम येन-केन प्रकारेण निभाते थे। माँ दही-चूड़ा और तिल का प्रसाद भगवान जी के समक्ष भोग स्वरूप लगाती थी। इस अनुष्ठान से संबन्धित जो बात जेहन में बस गई वो यह था कि पूजा समाप्त कर माँ सभी बच्चों को पूजा कक्ष में अपने पास बुलाती थी। प्रसाद स्वरूप दही-चूड़ा के साथ तिल का कौर बनाकर एक-एक भाई बहन को स्वयं खिलाती और प्रश्न करती - तिले-तिले बढ़ोगे न?’ हम बच्चे हाँ में जवाब देते और फिर बाहर खेलने भाग जाते। बचपन में ईश्वर को साक्षी मानकर माँ के इस आग्रह के पीछे छिपे भाव से तब हम सर्वथा अनभिज्ञ था। किन्तु ईश्वर के समक्ष हुए इस संक्षिप्त प्रश्नोत्तर के बारे में जब आज सोचता हूँ तब स्पष्ट होता है कि इस आग्रह के पीछे एक माँ की ममता का भाव था जो ईश्वर से अपने बच्चों की दीर्घायु की कामना स्वरूप यह प्रश्न करती थी। यह भी जीवन का शास्वत सत्य है कि माता-पिता अपना सर्वस्व तिल-तिल कर होम कर देते हैं तब जाकर वे अपने बच्चों को तिल-तिल बढ़ते देख पाते हैं और अगली पीढ़ी अपना मुकाम बना पाती है। माता-पिता के बलिदान पर ही बच्चे अपनी महत्वाकांक्षाओं  की अट्टालिका खड़ी कर पाते हैं। किन्तु इस बलिदान में भी एक नैसर्गिक सुख है जिसे वे बलिदानी ही समझ सकते हैं।

मकर-संक्रांति के इस पावन पर्व पर जब सर्दी अपने चरम पर होती है, तिल का प्रयोग स्वास्थ्य  के लिए अत्यधिक लाभदायक है। पाचन-तंत्र साफ करने में, हड्डियों को मजबूती देने में तिल रामबाण का काम करता है। संभवतः शरीर की प्रतिरक्षा तंत्रों को मजबूती देने के लिए ही माँ बचपन में हमें तिल का प्रसाद देती रही होगी। आयुर्वेद में तिल के महत्व का बृहत वर्णन है। मकर संक्रांति के अवसर पर तिल से बने लड्डू और बर्फी, गज़क आदि खाने की पुरानी परंपरा रही है। गज़क नाम अरबी है जहां तिल का प्रयोग आम था। सर्दियों में तिल के तेल से खाना पकाने से बेहतर और कुछ नहीं हो सकता। यही वजह है कि तिल को जादुई भोजन माना जाता है और मकर संक्रांति में देश के विभिन्न क्षेत्रो में इसका प्रयोग भिन्न-भिन्न स्वरूपों में किया जाता है। मकर संक्रांति का पर्व राष्ट्र के विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न तरीके से मनाया जाता है जो हमारी इंद्रधनुषी संस्कृति का उम्दा उदाहरण है। बंगाल में सर्दी में तिल के अलावे खजूर के गुड़ जिसे नौलीन गुड़ कहते हैं का प्रचलन है। पंजाब में इसे लोहड़ी और माघी कहते हैं तो गुजरात में यह उत्तरायण कहलाता है। यहाँ खान-पान में तिल की चिक्की, और मूँगफली और गुड़ की चिक्की का प्रचलन है। मराठवाडा में तिल-गुड़ ध्या अणि, गोड़ गोड़ बोल –यानि तिल-गुड़ खाओ और मीठा-मीठा बोलो का चलन है। माताएँ पूरन-पोली बड़े जतन से बनाती हैं। उत्तराखंड में लोहड़ी घुघुतिया कहलाता है- घुघुति बसुती के खाना, दूध भात कु देलू माँ देली। उत्तर-प्रदेश में खिचड़ी का प्रचलन है। राजस्थान में इसे संक्रांत कहते हैं। असम में यह भोगाली बीहू हो जाता है (रंगाली बीहू रबी फसल की कटाई यानि चैत माह में और कंगाली बीहू अश्विन में मनाया जाता है)। एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का उद्घोष यदि राष्ट्र की एक आत्मा का भाव उत्पन्न करता है तो विभिन्न राज्यों में एक ही पर्व के भिन्न-भिन्न संस्करण देश की अनेकता में एकता के गौरवशाली इतिहास से हमारा परिचय कराती है और यह दर्शाती है कि जैसे शरीर विभिन्न अंगों के मेल से बनता है और शरीर के सभी अंग समान रूप से महत्वपूर्ण हैं उसी प्रकार राष्ट्र के विभिन्न राज्यों के पर्व-त्योहार और संस्कृति समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। यही हमारे राष्ट्र की पहचान है और इसी बहुआयामी और गौरवशाली इतिहास और ऐतिहासिक धरोहर पर हमें नाज़ है। यह विभिन्नता ही सम्पूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोता है जिसे वसुदेव कुटुंबकम से जाना जाता है।