किराये के फ्लैट के बैठक में बैठा कोई उपन्यास पढ़ने में मशगूल था जब बालकनी में
चिड़ियों की चचाहट से ध्यान टूटा। इधर दिल्ली में केवल कबूतर और मैना के ही दर्शन
होते हैं। अतः इस कलरव को सुन मन प्रसन्न
हो गया। बालकनी में झाँक कर देखा तो पाया कि हमिंग बर्ड का एक जोड़ा केबल टी.वी. की
तार पर बैठ प्रेमालाप कर रहा है। मुझे अपनी ओर देखते ही वे वहाँ से उड़ गए। दूसरे दिन प्रातः स्नान के बाद गीला तौलिया
बालकनी में पसारने गया तो पंछियों के उसी जोड़े को बड़ा व्यस्त पाया। देखा वे दोनों
तार पर अपना घोंसला बनाने में व्यस्त हैं। मुझे ऑफिस जाना था अतः मैं उस ओर ज्यादा
ध्यान नहीं दे पाया। शाम जब वापस आया तो बेटी ने बताया कि दिन भर वो जोड़ा घोंसला
बनाने में व्यस्त रहा था। शाम तक दोनों ने बहुत हद तक घोंसले को अमली जमा पहना
दिया था। अगले दो दिन मेरी बेटी मुझे गृह-निर्माण की प्रगति का व्योरेवार सूचना देती
रही- यह भी बताया कि किस प्रकार उसके मदद की पेशकश को उस जोड़े ने तवज्जो नहीं दिया
था- उनकी अनुपस्थिति में वो रुई के कुछ फाहे और कपड़ों के कतरन बालकनी में रख आई थी
किन्तु उस जोड़े ने उन सामग्रियों का उपयोग नहीं किया था। इस बात से मेरी बेटी जरा
मायूस थी। ‘शायद यह जोड़ा कुछ अधिक ही स्वाभिमानी है। अतः वो तुम्हारी मदद नहीं स्वीकार
रहा’।– मैंने अपनी बेटी को पुचकारा।
बहरहाल घोंसला बनकर तैयार हो गया और मादा ने घोंसले में अपना स्थान ग्रहण
किया। सारा दिन नर आना जाना करता रहता या फिर सामने अशोक के पेड़ पर बैठा चहकता
रहता। मेरी बेटी इनकी गतिविधियों को निकट से देखने के लिए लालायित रहती, अतः वो वहीं बालकनी में बैठकर
पढ़ाई करने लग गयी थी। शुरू में उस जोड़े को मेरी बेटी का वहाँ बैठना थोड़ा नागवार
गुजरा था किन्तु जब उन दोनों ने देखा कि वो वहाँ से नहीं हट रही है तब नर में कुछ
ज्यादा ही हिम्मत आ गयी और वो मेरी बेटी की उपस्थिति में ही आना जाना करने लगा। ‘अब इसे तुम पर एतबार हो गया है।
उसे विश्वास हो आया है कि तुम उसे नुकसान नहीं पहुंचाओगी। अतः यह अब तुम्हारी
उपस्थिति में भी वो उन्मुक्त आना जाना करता है। धोखा देने की प्रवृति तो मनुष्यों
की ही होती है, पशु-पक्षियों की नहीं।’– मैंने अपनी बेटी को पखेरू मनोविज्ञान समझाया।
कुछ दिन बाद देखने में आया कि मादा का घोंसले से बाहर निकलना बंद हो गया है।
मतलब अब वो अंडे पर बैठी है। अब वो नर न केवल अपनी भोजन की व्यवस्था करता वरन मादा
के लिए भी भोजन लाता। मेरी बेटी की इच्छा पुनः उस जोड़े की मदद करने की हुई। कदाचित
नर के परिश्रम को देखकर उसका दिल पसीज गया था। अतः उस जोड़े को आराम देने की गरज से
पके चावल के कुछ दाने और पानी भरा एक कटोरा की व्यवस्था बालकनी के मुंडेर पर की
गयी। किन्तु इस बार भी उस जोड़े ने मेरी बेटी की मदद की इस पेशकश को ठुकड़ा दिया। ‘पंछी स्वावलंबी होते हैं। वे
अपनी व्यवस्था खुद करते हैं। मानव की तरह हर मामले में दूसरों पर निर्भर नहीं रहते’।– उसकी माँ ने उसे समझाया।
कुछ दिन और बीते तो मेरी बेटी को पुनः चिंता हुई कि कदाचित बिल्ली रानी उसके
अंडे हड़प करने न आ जाये। किन्तु मैंने उसे आश्वस्त किया कि ऐसा कुछ भी नहीं होने
वाला है। ‘तुमने देखा नहीं उस जोड़े ने घोंसला का ‘लोकेशन’ इस प्रकार चुना है कि बिल्ली का उस तक पहुंचना मुश्किल
होगा। हर अभिवावक अपने बच्चों के प्रति इतना ही चिंताशील होता है’।– मैंने पुनः अपनी पुत्री को
आश्वस्त किया।
दो सप्ताह बाद एक दिन सुबह मादा को अपने बच्चों को भोजन देते देख मेरी बेटी
की खुशी का पारावार न रहा। अब वो प्रत्येक दिन सुबह उठकर पहले उन चिड़ियों को देखने
जाती और उन्हें खुश देखकर स्वयं खुश होती। किन्तु इसके कुछ दिन बाद एक दिन सुबह उसने
पाया कि वो पूरा का पूरा परिवार ही उस घोंसले को छोड़ कर कहीं चला गया है। वो
घोंसला जिसे उस जोड़े ने इतनी मेहनत और लगन से बनाया था वो वीरान पड़ा है। उसके लिए
यह विस्मय की बात थी। ‘ये हम मनुष्य ही हैं जो ‘घर’ बनाने के बाद सारी उम्र उसकी चौकीदारी करने में बिताते
हैं किन्तु उसकी अगली ही पीढ़ी उस ‘मकान’ को आउट डेटेड करार कर नए मकान में चली जाती है अथवा
उसे बिल्डर को बेच मुनाफा कमा फ्लैट में शिफ्ट हो जाती है। तथापि नीड़ के प्रति यह
मोह हम मानवों में ही देखने को मिलता है, इन पक्षियों में नहीं। नीड़ की बस इतनी ही नियति है कि
उसका प्रयोग आश्रयसथल के तौर पर तब तक किया जाये जब तक अगली पीढ़ी अपने पैरों पर
खड़ी न हो जाये। फिर अगली पीढ़ी स्वयं अपना रास्ता चुने और आप वानप्रास्थ को अग्रसर
हों। किन्तु ऐसा होता नहीं है। हम कभी सांसारिक मोह-बंधन से उबर नहीं पाते जबकि एक
अदना सा पक्षी भी इस मोह-बंधन से परे है जैसा तुमने देखा। यही वजह है कि ये पक्षी उन्मुक्त
होकर जीवन जीते हैं जबकि हम संचय करते जीवन का आनंद उठाने से रह जाते हैं। इन
पक्षियों से हम समस्त मानव मूल्यों का व्यावहारिक ज्ञान पा सकते हैं।’- मैंने अपनी बेटी को
समझाया।

