Thursday, 2 April 2020

जीवन के रंग- अपनों के संग- रामनवमी और महावीरी जुलूस (02/04/2020)

कनक भवन, अयोध्या में राम लाला की अद्भुत छवि 

नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥
मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥

पवित्र चैत्र का महीना था, नवमी तिथि थी। शुक्लपक्ष और भगवन का प्रिय अभिजीत मुहूर्त था। न बहुत सर्दी थी, न धूप थी। वह पवित्र समय सब लोकों को शांति देने वाला था जब भगवन प्रकट हुए।




चैत्र शुक्ल नवमी के दिन भगवान् राम के प्राकट्य पर रामनवमी के त्यौहार से कईं यादें जुडी हैं। वर्ष के महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक था रामनवमी का त्यौहार। दरअसल विक्रम संवत के नए वर्ष के आगमन के नवें दिन पड़ने वाले इस पर्व पर कईं आयोजन होते। यह वह दौर था जब ये त्यौहार ही सामाजिक सरोकार के सबसे मजबूत सेतु थे जिससे हर परिवार, समाज और देस से स्वयं को जुड़ा महसूस करता था। 




रामनवमी के अवसर पर हमें प्रातः ही तैयार होकर रहने का आदेश मिला रहता था। हम सब आदेशानुसार तैयार रहते और पापा के एक इशारे पर जीप पर लपक बैठते। यह सफर घर से लगभग बीस किलोमीटर दूर कोडरमा संरक्षित वन में अवस्थित बिशोधर अभ्रक खदान पर जा कर समाप्त होता। यहाँ पूजा की समस्त तैयारी रहती। पूजा के उपरांत खदान के ही शिव-मंदिर के सामने तुलसी-चौरा के साथ में पापा और खदान के उनके समस्त कर्मचारी- कुली, मेट, मैनेजर आदि महावीरी झंडा स्थापित करते। फिर रसमी तौर पर किसी नए पिट (माइनिंग पॉइंट)  पर गैंता लगाकर नए वर्ष में नए कार्य के शुभारम्भ की औपचारिकताएं निभाई जाती। पापा प्रत्येक कूली और कर्मचारी को बक्शीश देकर विदा करते। उस दिन माइंस पर छुट्टी रहती। घर वापस लौट कर घर के तुलसी-चौरा पर भी महावीरी झंडा स्थापित किया जाता। 

ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा॥- 

ध्वजा, पताका और तोरणों से नगर की सज्जा देखने लायक होती।




बगल के गाँव चंदवारा में इस अवसर पर चैती दुर्गा की प्रतिमा भी स्थापित की जाती थी जिसके दर्शन करने हम लोग जाते थे। किन्तु रामनवमी के अवसर पर सबसे मीठी यादें शाम के वक़्त निकलने वाले जुलूसों से जुड़ी हैं। श्री राम के अनुयायी श्री हनुमान के भक्त इस अवसर पर संध्या समय जुलूस निकालते थे। विशाल आकार के महावीरी झंडों के तले ये भक्त पुरे जोश ओ- खरोश से जुलूस निकालते जो उस क़स्बे के मुख्य सड़कों से होता हुआ हमारे घर पर आकर विसर्जित होता था। यह कार्यक्रम हमारे घर पर क्यों समाप्त होता था इसकी वजह तो मुझे नहीं मालूम पर इतना अवश्य था कि पापा इन कार्यक्रमों से गहरे जुड़े थे और प्रत्येक दल की तन-मन-धन से मदद करते थे। संभवतः यही वजह रही होगी कि ये जुलूस हमारे घर पर समाप्त होते थे। जब जय श्रीराम के नारों और नगाड़ों के थाप पर हनुमान भक्त तेल खिलाये लाठियां भांजते तब समां बंध जाता था। लाठी भांजना भी एक कला है। कुछ युवा तो इस कला में इतने निपुण होते कि हम दांतों तले ऊँगली दबा लेते। क्या मजाल कि किसी को चोट लग जाए। लाठी के साथ हवा में लहराते इन युवाओं को देखना अपने आप में एक रोमांचक अनुभूति था। तकरीबन सभी लठ्मारों को पापा से कुछ न कुछ इनाम अवश्य मिलता। लाठी के करतब दिखाने के चक्कर में घर के सामने के लॉन में लगे फूल-पौधे ध्वस्त हो जाते पर पापा ने कभी इसके लिए किसी को नहीं टोका। आज के दौर में यह लग सकता है कि पापा कट्टर हिंदूवादी रहे होंगें जिनका वरदहस्त स्थानीय हिन्दू संगठनों को प्राप्त था। किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं था। हिन्दू नव-वर्ष राम-नवमी की ही तरह इस्लाम नववर्ष पर मनाये जाने वाले त्यौहार मुहर्रम के अवसर पर निकलने वाले ताज़िये और जुलूस का ठहराव भी हमारे घर पर होता था। उसी लॉन पर क़स्बे के मुस्लिम युवा लाठी, तलवार और चाकू के करतब  दिखाते और पापा से इनाम पाते। यह जुलूस बगल के संत जोसफ स्कूल के पीछे अवस्थित कर्बला पर समाप्त होता था। आज जब इन स्मृतियों को संजोता हूँ तो इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि यह कहना आसान है कि हमारा देस विभिन्नता में एकता समेटे हुए है किन्तु अपने जीवन में इसे आत्मसात कर इसे अपना जीवन मूल्य बनाना हमने पापा से सीखा।



















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