| श्रीजगनाथ मंदिर, पूरी |
आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि के दिन, रथयात्रा का पावन
त्यौहार मनाया जाता है। इसी दिन जगन्नाथ स्वरुप भगवान् श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा
और बड़े भाई बलभद्र के साथ रथ-यात्रा कर अपनी मासी घर जाते हैं। पार्थसारथी के इस
रथ को उनके ही भक्त खींचते हैं। इस कलियुग में समस्त ब्रह्माण्ड के खेवनहार का
सारथी बन कदाचित इंसान स्वयं को ईश्वर के समकक्ष
समझने की भूल कर बैठता है। इसी नासमझी से प्रेरित वो सर्वशक्तिमान, अजन्मा, और सर्वव्यापी ईश्वर के समान स्वयं को भी सर्वशक्तिमान समझने की भूल कर बैठता है। महत्वपूर्ण है कलियुग में इंसान अपनी इंसानियत बरक़रार रखे।
यह दिलचस्प है कि आज भगवान् अपने मासी के घर जाते हैं। कहते
हैं प्रचंड गर्मी में जब भगवान को स्नान पूर्णिमा के दिन स्नान कराया जाता है तब
उनकी तबियत ख़राब हो जाती है और अगले एक पखवाड़े उन्हें केवल खिचड़ी प्रसाद पर संतोष
करना पड़ता है। अतः एक पखवाड़े बाद श्री जगन्नाथ अपनी गुंदीचा मासी के घर रहने चले
जाते हैं जहाँ उनका स्वागत अच्छे-अच्छे लज़ीज़ पकवानों से होता है। हमारी संस्कृति
में तबियत ख़राब होने पर अथवा जलवायु परिवर्तन के लिए छुट्टियों में अपने मासी-मामा
अथवा ताई-बुआ के घर जाने की परंपरा रही है। हमारे जीवन के जितने भी महत्वपूर्ण
पड़ाव हो सकते हैं यथा- जन्म-मृत्यु, छठी-मुंडन, यज्ञोपवीत अथवा शादी व्याह - ये हम अपने बृहत् परिवार जिसे संयुक्त परिवार
भी कह सकते हैं के बीच ही मनाते हैं। संयुक्त परिवार की इसी परिपाटी का पालन करते
हुए प्रत्येक वर्ष भगवान् जगन्नाथ रथ यात्रा कर अपनी मासी के घर जाते हैं।
इस देश में छुट्टियाँ अपने परिवार और अपनों के बीच बिताने की संस्कृति रही है। इसके
बाद भी यदि समय बचा तो तीर्थाटन की सोचते हैं। देशाटन उसके बाद ही आता है। हालाँकि
अब इस सोच में भी बदलाव आ रहा है और लोग विदेशाटन तक कर आते हैं। आज हर परिवार से
कोई न कोई अपना विदेशों में जा बसा है। किन्तु हमारे पारंपरिक पारिवारिक
मूल्य अब भी इतने सशक्त हैं कि परदेस में बसे अपने बंधू-बांधव से मिलने की इच्छा
हम रोक नहीं पाते। ह्रदय में कहीं न कहीं विदेश में बसे अपने बंधू-बांधव से मिलने
की इच्छा तीव्र रहती है और हम विदेशाटन
करते हैं।
बचपन में गर्मी की छुट्टियों से पहले स्कूल में टीचर हर बच्चे से
अवश्य पूछा करती थी कि इन छुट्टियों में हम कहाँ घूमने जा रहे हैं। हर वर्ष हमारा
एक ही जवाब होता था- हज़ारीबाग अथवा पटना अपने ताई के घर-बड़की माँ, बड़ी माँ, मंझली माँ, संझली माँ, कंझली माँ, छोटी
माँ - सभी घर जाना होता था। यानी भगवान् प्रत्येक वर्ष गर्मी की छुट्टियों में
स्वास्थ्य लाभ के लिए मासी घर जाते थे और आज भी जाते हैं जबकि बचपन में हम नियमित
रूप से ताई - जिन्हें हम माँ के विभिन्न स्वरूपों से पुकारते थे, के घर ही जाते रहे। प्रत्येक वर्ष कहीं पहाड़ों पर अथवा किसी अन्य स्थान पर
चलने का आश्वासन मिलता अवश्य था किन्तु ये
आश्वासन कभी अमल में नहीं आये। न ही भगवान् ने मासी घर जाना छोड़ा और न ही हम ताई
घर।
गर्मी की एक माह लम्बी छुट्टियों में हम एक या दो दफे हज़ारीबाग जाते
जहाँ हम एक-एक कर तीनों घरों (बाद में लोहसिंघना में चौथा घर बना) में समय बिताते।
चाचा-चाची से आशीर्वाद लेते और बच्चों की टोली दिन भर धमा-चौकड़ी मचाती। हर घर से
खूबसूरत यादें जुडी हैं। संझले पापा के घर के टेरेस पर गार्डन झूला लगा था जिस पर
झूलने का आनंद उठाते। घर के पीछे कांग्रेस मैदान में खेलते। सामने ही रुक्मिणी
पुस्तकालय था। राधेकांत चाचा और मुरली चाचा के घर अगल-बगल ही थे। सामने बोडम तालाब
था जो हमारे लिए कौतुक का विषय हुआ करता था। बाद में लोहसिंघना में चौथा घर बना
जहाँ हम श्रीकांत चाचा से मिलने जाते। इन सब घरों में कुछ समानताएं भी थी। प्रायः
हर घर में आँगन अवश्य था। गाय और अल्सेशियन कुत्ते भी अवश्य होते। कुत्तों से हमें
डर लगता था किन्तु गायों और उसके बछड़ों के साथ खेला करते थे। हर घर में इतना कुछ
खाते-पीते कि शाम वापस तिलैया लौटने तक हम आकंठ भरे होते। इसी प्रकार अगले सप्ताह
पटना जाना होता जहाँ बड़े पापा और बड़ी माँ के घर जाते और वहां से दरियापुर जहाँ
छोटे दादा रहते थे और जहाँ पापा का बचपन बीता था। हर घर से सुनहरी यादें जुडी हैं
और हर घर कुछ न कुछ कहता प्रतीत होता है।
वक़्त बदल रहा है और बदले हुए वक़्त में गर्मी की छुट्टियों को मनाने
का अंदाज़ भी बदल रहा है। जो नहीं बदला है वह है भगवान् जगन्नाथ का छुट्टियां
बिताने का अंदाज़- वे आज भी परम्परा से वशीभूत छुट्टियां अपने परिवार के बीच ही
बिताना पसंद करते हैं। यही भारतीय संस्कृति की दृढ़ता का परिचायक है। भगवान् का
अपनी मासी घर जाना आज भी बदस्तूर जारी है। आज भगवान् जगन्नाथ एक पार पुनः अपनी बहन
और बड़े भाई के साथ गुंदीचा मासी के घर कुछ दिन बिताने जा रहे हैं। इन्हीं
स्मृतियों को संजोये आइए हम भी अपनों के साथ कुछ पल अवश्य बिताएं।
आषाढ़ शुक्ल दशमी को भगवान् जगन्नाथ मासी के घर से वापस अपने घर लौट आते हैं। इसके बाद देवशयनी
एकादशी आता है जब अगले चार
माह के लिए भगवान् वामन
अवतार के समय दानवीर राजा बली को दिए वचन को निभाते हुए उनके पास पाताल लोक में ठहरते हैं। इसे चातुर्मास कहते
हैं जब कोई धार्मिक कार्य नहीं किये जाते। यह खेती- खलिहानी का भी समय होता है जब
गृहस्थ धान की खेती-क्यारी में लगा होता है। कर्म की इस प्रधानता को भगवन भी
स्वीकारते हैं और शयन को चले जाते हैं। गौतम बुद्ध एवं भगवान् वर्द्धमान महावीर भी
चातुर्मास के समय योग-ध्यान में लीन हो जाते थे जबकि बाकी के आठ मास
धर्मचक्रपरिवर्तन के अपने प्रयास में ब्यतीत करते थे।
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