![]() |
| बिशोधर अभ्रक खान पर पापा |
![]() |
| अमेरिकन ट्रेड जर्नल में झुमरी तिलैया के एक व्यापारी का इश्तेहार |
आज यदि हम अभ्रक के बाबत जानकारी इकट्ठा करना चाहें तो पाते हैं कि अभ्रक के
साथ-साथ बाल-मजदूरी की समस्या अनायास जुड़ गई है। इंटरनेट पर किसी भी साइट पर जाएँ, आपको ऐसे कई लेख मिल जाएंगें
जिससे पता चलता है कि आज अभ्रक खनन बच्चों के जिम्मे है। यह बहुत ही हृदयविदारक
है। यह देख-सुनकर दुख होता है। किन्तु यह सदा ऐसा नहीं था। अभ्रक नगरी के अतीत और
वर्तमान को पढ़ते हुए आप ऐसे कई तथ्यों से रु-ब-रु होंगें जो आपको निश्चय ही यह सोचने
पर विवश कर देगा कि कैसे विकास का चक्र इस क़स्बे में उल्टा घूम रहा है। तो पढ़ते
हैं पहले कल, यानि अतीत की यादें, और फिर होगी आजकल की बातें।
एक गीत बरबस याद हो आता है- ‘छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी, नए दौर में लिखेंगें मिलकर नई
कहानी- हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी’। झुमरी-तिलैया के संदर्भ में कल की बातों और यादों को
भूलना सर्वथा असंभव है-एक समृद्ध बुनियाद को वक़्त के दीमक ने किस प्रकार खोखला कर दिया, इस क़स्बे का इतिहास और वर्तमान, इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। एक
दौर था जब इस क़स्बे में हर कोई अभ्रक से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा था
और यह खनिज लाखों लोगों की रोजी-रोटी का आधार हुआ करता था। हर शहर, नगर अथवा क़स्बे की अपनी एक खास इस्म
(पहचान) होती है- जमशेदपुर-बोकारो लौह-नगरी है तो झरिया-धनबाद कोयला नगरी। इसी
प्रकार चार हज़ार वर्ग किलोमीटर में फैला माईका बेल्ट, जिसके अंतर्गत गिरिडीह, हजारीबाग, कोडरमा, नवादा, जमुई, गया और भागलपुर ज़िले आते हैं, के मध्य में अवस्थित
झुमरी-तिलैया की इस्म (पहचान) अभ्रक नगरी के तौर होती है। कभी यह छोटा सा क़स्बा
विश्व के मानचित्र पर अपनी उच्च कोटि के अभ्रक के लिए जाना जाता था। यहाँ के अभ्रक
के खदान कोडरमा सुरक्षित वन क्षेत्र में फैले थे। पचास के दशक में इस क्षेत्र में
सात सौ के करीब अभ्रक खान हुआ करते थे। कितनी ही कंपनियाँ अभ्रक खनन के काम में
लगी थी। रोजगार के हिसाब से देखा जाये तो प्रत्येक कंपनी दो-दो पालियों में खनन का
काम करवाती थी। प्रत्येक पाली में दस से पंद्रह मजदूर लगाए जाते थे। यानि पंद्रह
से बीस हज़ार मजदूर थे जिनके परिवार का गुजारा अभ्रक के भरोसे था। यह संख्या उन
मजदूरों की थी जो प्रत्यक्षतः अभ्रक खनन से जुड़े थे। अलावे इनके पूरे क़स्बे के गुज़र-बसर
का बुनियादी जरिया अभ्रक ही था। यहाँ के व्यापारी खनन के काम में आने वाले उपकरणों, औजारों और अन्य सामानों के
व्यापार में लगे थे। यहाँ के लोहार खनन में प्रयुक्त होने वाले औजारों को धार
लगाते थे। बढ़ई खदानों में प्रयुक्त होने वाले लकड़ी के मचान बनाते थे। यहाँ की
ग्रामीण औरतें अभ्रक खान से मिट्टी निकालने में प्रयुक्त होने वाली बेंत की
टोकड़ियाँ बनाकर बेचने में लगी थीं। यहाँ
के मैकेनिक अभ्रक खान के यंत्रीकरण से जुड़े विभिन्न उपकरणों की मरम्मत कर
गुज़र-बसर करते थे। गरज यह कि इस क़स्बे की समस्त आबादी अभ्रक पर निर्भर थी। अभ्रक
की चमक से सारा क़स्बा चमकता था। कोडरमा स्थित माईनिंग संस्थान में माइंस मैनेजर, मेट और अन्य कुशल और अर्ध-कुशल
कार्यों हेतु प्रशिक्षण दिया जाता था जहां कस्बे के पढे-लिखे बच्चे प्रशिक्षण पाकर
सिद्धहस्त होते थे और स्थानीय खदानों में नौकरी पाते थे। करमा में मजदूरों के लिए
एक विशिष्ट सुपर-स्पेसलिटी अस्पताल था जहां केवल मजदूर और उनके परिवार के सदस्यों
का इलाज़ होता था। करीब-करीब प्रत्येक प्रखण्ड में विद्यालय था जहां बच्चे पढ़ने
जाते थे।
कोयले की तरह अभ्रक के खदानों का कभी राष्ट्रीयकरण नहीं हुआ और इस खनिज का
खनन निजी क्षेत्र के जिम्मे ही रहा। सत्तर के दशक में बिहार माईका सिंडिकेट नामक सरकारी
उपक्रम द्वारा रजौली घाटी (ढाब थाम) में अवस्थित सपही अभ्रक खान पर काम हुआ किन्तु
यह उद्यम लाभप्रद नहीं रहा। सरकार के राजस्व के लिए यह अधिक लाभप्रद था कि वो कोडरमा
वन क्षेत्र में स्थित खदानें लंबी अवधि के लीज़ पर देती थी और उस पर सैस लगा कर
राजस्व कमाती थी। वो इसलिए क्योंकि अभ्रक खनन हमेशा लाभ का व्यापार नहीं होता था।
कोयले की तरह अभ्रक धरती के गर्भ में सर्वत्र उपलब्ध नहीं होता वरन यह एक खास
प्रकार के पत्थर पेगमाटाइट के बीच तह, जिसे ‘बुक्स ऑफ माईका’ (Books of Mica) कहते हैं, में पाया जाता है। खनन के दौरान यदि इस पत्थर की धार
मिल गयी तो ठीक वरना हजारों फीट की खुदाई के बाद भी अभ्रक के दीदार नहीं होते। इस
खनिज के खनन में लगे कितने ही लोग करोड़पति बन गए तो कितने सड़क पर आ गए।
बचपन में अक्सर कोडरमा सुरक्षित वन क्षेत्र में स्थित खदान पर पापा के साथ
जाना होता था। पापा के साथ रहते हुए अभ्रक खनन एवं डीलरशिप के काम के बारे में
बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। ज़िंदगी के इन तजुर्बों की चर्चा फिर कभी। अभ्रक खदान
में उतरना एक तरह से धरती माँ के गर्भ में उतरना था। यह एक रोमांचक अनुभव होता था।
इस वन क्षेत्र में बिरहोर आदिवासी अक्सर मिल जाते थे। ये जंगल में ही बसेरा करते
थे। ये बहुत ही फूर्तीले होते थे और जंगली मुर्गे तक को दौड़ कर पकड़ लेते थे।
मुर्गे बेचकर ये बाज़ार से नमक खरीदा करते थे। कितनी ही दफा इनसे मुर्गे खरीद कर
हमने जंगल में वन-भोज का मज़ा लिया। कभी-कभी ये पानी के लिए माइंस में बने गोदाम पर
चले आते थे। जब हम इनसे मुर्गे की फरमाइश करते तब इनमें से कोई एक अपने साथी को एक
अजीब आवाज़ देकर पुकारता। इनके जिस किसी भी साथी के पास जंगली मुर्गा होता वो अपने
साथी की आवाज़ पर मुर्गा लेकर गोदाम पर चला आता। इनके बीच के इस कम्युनिकेशन स्किल
को समझना हमारे लिए असंभव था। बचपन में कभी इनकी लिपि को समझने का प्रयास भी नहीं
किया। न ही इनकी भाषा के बारे में तो कुछ कहा जा सकता है। रविवार के दिन लगने वाले
हाट में ये बिरहोर जड़ी-बूटियाँ बेचने आते जो काफी लाभप्रद थे। मालूम नहीं जंगल से
इन जड़ी-बूटियों को ये कैसे खोज निकालते थे। इससे भी अधिक विस्मय की बात थी कि
इन्हें इन जड़ी-बूटियों के औषधीय गुणों के बारे में जानकारी कैसे थी। एक सरकारी
आंकड़े के अनुसार 1941 में बिरहोरों की संख्या 2507 थी। अब मालूम नहीं ये आदिवासी
रहे भी अथवा नहीं। शायद ये अब इतिहास में दर्ज़ हो गए हों।
इंडिया लेबर ब्यूरो के 1958 के सर्वे के अनुसार झुमरी-तिलैया और इसके आस-पास
के तहसील यथा जयनगर, मरकच्चों, मसनोडीह, डोमचांच, सतगावा, कोडरमा में 163 कंपनियाँ माईका खनन एवं व्यापार में
कार्यरत थीं। ये सभी कंपनियाँ ऐसी थीं जिनका वार्षिक टर्नओवर करोड़ों में था। इन
फर्मों में मेसर्स इंदरचंद राजगढ़िया एंस संस प्राइवेट लिमिटेड (1880), केदारनाथ रामगोपाल एंड कंपनी
(1921), मदन लाल शर्मा की कंपनी शर्मा ब्रदर्स, लोकाइ (1929), छट्ठुराम-होरिलराम भदानी प्राइवेट कंपनी (1935), बिरधिचंद बंशीधर एंड संस (1935), एस. के. सहाना एंड संस प्राइवेट
लिमिटेड (1939), मेसर्स जेठमल भोजराज माईका फ़ैक्टरी (1944-45), माखन लाल संघाई की संघाई एंड कंपनी (1950), मेसर्स जालान एक्स्पोर्ट्स (1950), मेसर्स बी. एल. राजगढ़िया,
डोमचांच (1951), मेसर्स पचिसिया इंटरनेशनल (1956), डोमनराम तरवे एंड संस (1958), मेसर्स भागलपुर माईका डेव्लपमेंट सिंडिकेट, क्रिश्चियन माईका इंडस्ट्रीज़
लिमिटेड, मेसर्स टुपलाल राम एंड संस, मेसर्स बालकृष्ण केडिया एंड कंपनी, मेसर्स चिरंजीलाल
जुगलकिशोर एंड कंपनी, दारुका एंड कंपनी, जगन्नाथ जैन एंड कंपनी आदि प्रमुख थे। छट्ठुराम-होरिलराम
भदानी प्राइवेट कंपनी अपने जमाने की सबसे बड़ी कंपनी थी जिसकी कई सहायक कंपनियाँ
थी। इनमें प्रमुख थीं डोमचांच माईका कंपनी लिमिटेड, इंडिया माईका सप्लाई, कोडरमा माईका कंपनी, इंडिया माईका एंड माईकानाइट इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (1954)
आदि-आदि। इसके अलावे इस कंपनी की कई खदान ठेके पर दी हुई थी जैसे मेसर्स शारदा
माईका माईनिंग कंपनी आदि-आदि। कदाचित सभी फ़र्मों के नाम यहाँ कलमबद्ध करना मेरे
लिए संभव नहीं क्योंकि इनकी संख्या सैंकड़ों में थी और इतने सारे नाम इतने सालों के
बाद मुझे स्मरण भी नहीं हैं। इस चमकीले मायावी खनिज के खनन में जो सफल हुए वे तो
फ़लक पर अपनी अमिट छाप छोड़ गए किन्तु जो असफल हुए वे गर्दिश में ऐसे गुम हुए कि
पीछे कोई उनका नाम लेने वाला भी नहीं बचा।
इन रईसों की रईसी से संबन्धित ऐसी-ऐसी किंवदंतियाँ अभी भी सुनने को मिलती
हैं कि आप दांतों तले उंगली दबा लें। इनकी रईसी के किस्से पापा से अक्सर सुना करता
था। लखनऊ के नवाबों से भी अधिक नफासत और अदब के कायल यहाँ के रईस बॉम्बे फिल्म
इंडस्ट्री से लेकर दिल्ली के सियासती गलियारे तक में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने में
सफल रहे थे। चुनाव के समय राजनैतिक दलों की अथवा फिल्म निर्माण के दौरान
प्रोड्यूसर की पैसे से मदद करने में ये कभी पीछे नहीं रहे। जब अभ्रक का यह व्यापार
अपने यौवन पर था उस दौर में इस क्षेत्र में कितने ही ऐसे फ़र्म थे जिनके जलवों के
बारे में पचास से अस्सी के दशक में आप कल्पना भी नहीं कर पायेंगें- ऊंची-ऊंची
चारदीवारी के बीच आलीशान कोठियाँ, लंबे-चौड़े अहाते, फलों के बड़े-बड़े बागान, विदेशी कारों का काफिला, कोठियों में नौकरों और सेवकों की सेना, विभिन्न महानगरों में करोड़ों की
अचल संपत्तियाँ, विदेश-यात्राएं जहां हवाई-जहाज़ में न केवल ये रईस वरन
उनके अरबी घोड़े तक सफर करते थे- ये सब यहाँ के रईसों के लिए सामान्य था। मर्सीडीज़, पॉर्श,
बुईक्क, रॉल्स रॉयस और कितनी ही अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड की कारें
यहाँ के रईसों के पास हुआ करती थी। हमारे बगलगीर, जो औसत दर्जे के रईस थे, की कोठी पर
गाड़ियों के सात गैराज थे। उनके पास दो तो
फोर्ड का पिकअप वैन था जिनका उपयोग खदान से अभ्रक लाने में होता था।
एक रईस थे जिनपर देवी लक्ष्मी विशेष मेहरबान थी; अलबत्ता देवी सरस्वती की दृष्टि तनिक टेढ़ी थी। अपनी
कमाई का हिसाब-किताब रखने के लिए इन्होंने अपने साले साहब को नियुक्त कर रखा था।
वो साला साहब भी एक नंबर का धूर्त था। अपने बहनोई के आय-व्यय का हिसाब तो रखता ही
मौका देख तिजोरी से रुपये भी उड़ा लेता। उसके बारे में लोग कहते थे कि अमूक बाबू की
सेफवा माइंस से अच्छी कमाई हो रही है। सेफवा याने गोदरेज का सेफ जिसमें वो सेठ
अपने रुपये रखता था। एक दूसरे रईस थे जो रुपये को तौल कर सेफ के हवाले करते थे और
प्रत्येक मूल्य-वर्ग के रुपयों का हिसाब वजन से रखते थे। एक और जनाब थे, जिन्हें केटरपिलर खरीदने का शगल
(Hobby) था। यहाँ जिक्र तितली वाले
केटरपिलर का नहीं वरन सुप्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय केटरपिलर कंपनी द्वारा निर्मित
विभिन्न पृथ्वी-प्रस्तावक (EARTH MOVERS) मशीन यथा बुलडोज़र, डोज़र, क्राव्लर आदि का हो रहा है। इन मशीनों का उपयोग खदानों
में किया जाता था। बहुधा ये मशीन किराये पर लिए जाते थे। एक समय था जब इस कस्बे
में केटरपिलर कंपनी के सभी पृथ्वी-प्रस्तावक के ये एकमात्र मालिक थे। कलकत्ता, गिरिडीह अथवा आस-पास के किसी भी
शहर में कोई भी केटरपिलर बेच रहा हो ये खरीदने पहुँच जाते थे।
यहाँ के ये रईस तब भी अपनी कॉर्पोरेट सोश्ल रेस्पॉन्सिबिलिटी के प्रति सजग
थे। अपनी कमाई का एक अच्छा हिस्सा दान-धर्म के कार्यों में भी लगाया करते थे-
छट्ठुराम-दर्शनराम बालिका विद्यालय, छट्ठुराम-होरिलराम विद्यालय, जगन्नाथ जैन कॉलेज, जैन धर्मशाला और अन्य कई
धर्मशालाएँ, गोशालाएँ आदि आज भी इन रईसों के नाम पर इस क़स्बे में चल रहे हैं। इनके
बच्चे इन्हीं स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ते थे जिन्हें देख हम चमत्कृत होते थे।
खनन के बाद दूसरे वर्ग के व्यापारी जो इस खनिज के व्यापार में लगे थे वे
डीलर कहलाते थे। डीलर माईका माइंस के मालिकों से अभ्रक खरीदते और विभिन्न मानक आकारों
में इनकी कटनी-छटनी कर वर्गीकृत करते थे। बहुधा माइंस मालिक डीलर का काम भी करते
थे। साठ-सत्तर के दशक में कोडरमा- झुमरी तिलैया-गिरिडीह में इस व्यापार में लगे
ऐसे हजारों डीलर रहे होंगें। प्रत्येक डीलर अपनी हैसियत अनुसार कम से कम दस से बीस
मजदूरों को काम देता था। ये मजदूर वास्तव में कुशल हस्त कलाकार थे जिन्हें अभ्रक
तराशने में महारथ हासिल थी। सर्वप्रथम माइंस से आए अभ्रक के अपरिष्कृत किनारों को
काट-छांट कर एक निश्चित आकार दे दिया जाता था। फिर यह देखा जाता था कि अभ्रक के
किसी टुकड़े के पृष्ठ का कितना भाग अक्षुण्ण है यानि कितने क्षेत्र पर सुई की नोक बराबर
भी कोई दाग अथवा प्रकृति प्रदत्त धब्बा नहीं है। दागविहीन अभ्रक का यह आयाम जितना
ही बड़ा होता वो उतना ही अधिक मूल्यवान होता। मानक तय करने के लिए तीन संस्थाएं
नामजद थीं- ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंर्ड्स, (Bureau of Indian Standards BIS), ब्रिटिश स्टैंर्ड्स इंस्टीट्यूट एवं अमेरीकन सोसाइटी
फॉर टेस्टिंग मटेरियल्स। जहां ब्रिटिश एवं भारतीय मानक स्प्लीटिंग पर आधारित थी
वहीं अमेरीकन मानक विजुवल क्वालिटी पर आधारित था। विजुवल क्वालिटी के अनुसार माईका
का वर्गीकरण क्लियर, स्टेन, फेयर स्टेन, हेविली स्टेन, स्पॉटेड, कॉपर स्टेन आदि में होता था। इसके अलावे अभ्रक के
नैसर्गिक रंग के आधार पर भी इसका वर्गीकरण होता है- रूबी रेड का मूल्य सफ़ेद अभ्रक
से अधिक होता था। चूंकि सोवियत रूस भारतीय अभ्रक का सबसे बड़ा आयातक देश था अतः
रूसी मानक के अनुसार भी अभ्रक की कटनी-छटनी की जाती थी। रूसी मानक के नाम आकार के आधार
पर रखे जाते थे। जैसे बावन-बासठ (52 by62; length to breadth in millimeter) आदि या फिर अंक के अनुसार वर्गीकृत किया जाता था
-एक नंबर से लेकर छ्ह सात नंबर तक। आकार के आधार पर अभ्रक का मूल्य पाँच रुपये
किलो से लेकर लाख रुपये किलो या इससे भी अधिक हो सकता था। किनारे परिष्कृत किए
दागविहीन अभ्रक के परतों को एक निर्धारित घनत्व के महीन फांक (slices) में छिल लिया जाता था जिसे
स्प्लीटिंग (Splittings) कहते थे। आयाम के अनुसार इसे विभिन्न नंबर में अलग-अलग रख
लिया जाता है। इस काम में लगे मजदूर इतने पारंगत होते थे कि एक नज़र में ही बता
देते थे कि अमूक अभ्रक किस नंबर का है और स्पिलटिंग के समय निर्धारित घनत्व का भी
बराबर ध्यान रखते थे। इन्हें मानक आकार के अनुसार वर्गीकृत कर अलग-अलग लकड़ी के
बॉक्स, जैसा सेव के बॉक्स होते हैं, में सजा लिया जाता था। डीलर की
गद्दी पर सामने डीलर बैठा केवल यह कार्य होता देखता था। बोरियों में भर कर लाये अभ्रक
की ये मजदूर दिन भर कटाई-छटाई करते और विभिन्न बॉक्स में सजाते चले जाते। मानक
आकार के अनुसार अभ्रक को पेटियों में पैक कर निर्यात के लिए ट्रकों से कलकत्ता पोर्ट
भेज दिया जाता था। बहुधा जिस अभ्रक का ऑर्डर मिलता उस आयाम के अभ्रक की मांग बढ़
जाती थी। पचास से अस्सी के दशक में झुमरीतिलैया में, जहां एक भी ढंग का होटल नहीं था, सोवियत रूस, चेक गणराज्य, जर्मनी, अमेरिका, इंग्लैंड, जापान आदि के व्यापारियों का
आना-जाना सामान्य था। जैसे गुड़ की मिठास पर मक्खियाँ खुद-ब- खुद भिनभिनाने चली आती
हैं वैसे ही किसी सुविधा के बगैर भी अभ्रक के व्यापार में लगे विदेशी व्यापारियों
का झुमरी-तिलैया आने का तांता लगा रहता था। एच. वी. विलकॉक्स, बोस्टन (अमेरिका), अशविल्ले माईका कंपनी, बिल्ट्मोर, अमेरीकन माईका वर्क्स, न्यूयॉर्क, वेस्टिंगहाउस इलैक्ट्रिक एंड
मैनुफेक्चुरिंग कंपनी, ईस्ट पिट्स्बर्ग, मिनरल एंड इन्स्युलेशन कंपनी, न्यूयॉर्क, हेनरिक ए. ब्रण्ड्ट, हैमबर्ग, एल्क्ट्रो वर्क्स-इसोला, जुरिक्ख, औचि एंड कंपनी, टोक्यो, एल. मूर एंड कंपनी, इंग्लैंड, स्टोर्र्स माईका कंपनी, लंदन, के अलावे सोवियत रूस, पूर्वी जर्मनी और चेक गणराजय के
सरकारी खरीदारों का भी झुमरी-तिलैया प्रायः आना जाना लगा रहता था। कलकत्ता से
गिरिडीह, झुमरीतिलैया होते हुए ये कलकत्ता से ही वापस अपने देश लौट जाते थे। और तो
और पचास के दशक में भी इस क़स्बे के व्यापारी इतने सजग थे कि अपने प्रोडक्टस यथा
माईका फ्लेक, माईका पाउडर, सिलवर्ड माईका केपेसीटर प्लेट, माईकानाइट (माईका की चादरें), माईका ट्यूब, माईका फोलियम, वी-कोन, माईका इलैक्ट्रिकल कोम्पोनेंट्स, ब्लाक माईका, माईका कंडेंसर, माईका वाशर, ट्रिमर माईका, फेब्रिकेटेड माईका, स्टोव माईका आदि का वे प्रचार-प्रसार
इन देशों से प्रकाशित होने वाले विभिन्न ट्रेड-जर्नल में किया करते थे। 1958 में
फ़ॉरेन कॉमर्स वीकली, अमेरिका में मसनोडीह की फ़र्म मेसर्स चंदरेश्वर प्रसाद
नारायण सिंह द्वारा प्रकाशित विज्ञापन यहाँ के व्यापारियों के हौसले की कहानी बयान
करता नज़र आता है। आज यह सुनने में भले
अविश्वसनीय लगे किन्तु यह सच है कि एक वक़्त था जब इस छोटे से क़स्बे में सबसे अधिक
टेलीफ़ोन कनेक्शन थे और सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय फोन काल्स भी इसी क़स्बे में आते
थे।(सूत्र: विकिपीडिया)
गद्दी पर बैठे ऐसे ही डीलरों ने समय बिताने के लिए रेडियो सीलोन और
विविध-भारती सुनना शुरू किया और फिर नित्य–प्रति इन रेडियो स्टेशनों में फरमाइशी
गीतों के पोस्ट-कार्ड भेजने शुरू किए जिसने झुमरी तिलैया को सारे विश्व में
प्रसिद्ध किया। यहाँ तक कि झुमरी तिलैया के रामेश्वर प्रसाद बर्नवल का साक्षात्कार
लेने एक दफा बी.बी.सी. की टीम झुमरी-तिलैया भी होकर गई। अभ्रक खनन की ही तरह अभ्रक
की कटाई-छटाई से भी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष बीस हज़ार से अधिक परिवारों का पेट पलता
था। दावे के साथ कह सकते हैं कि यह वो समय था जब उस कस्बे में हर हाथ को काम और हर
मुंह को निवाला मयस्सर था। उस क़स्बे के लिए वो समय बहुत ही उम्दा था। क़स्बे की
रौनक दीपावली को देखते ही बनती थी। सारा क़स्बा दुल्हन की तरह सज जाता था। प्रत्येक
हवेली में इतनी रौशनी की जाती कि अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता कि अमूक वर्ष किसने
अभ्रक खनन अथवा व्यापार में अधिकतम मुनाफा कमाया क्योंकि दीपावली पर किए जाने वाली
इस रौशनी को ही वार्षिक कमाई का पैमाना माना जाता था। गरीब से गरीब व्यक्ति भी
इतना समर्थवान था कि वो तीज-त्योहारों को खुशी-खुशी मना पाता था और इन खुशियों को
आपस में साझा कर पाता था। सब कुछ एक स्वपन की तरह था। झुमरी तिलैया का यह क़स्बा
अपने प्रसिद्ध कलाकंद के लिए भी जाना जाता था। आज के समय में उस दौर की यह अंतिम
निशानी अब भी बरकरार है। यहाँ का कलाकंद अपने स्वाद और मुलायमियत में लाजवाब है। छाबड़ा-स्वीट्स, आनंद विहार स्वीट्स, खाटुवाला स्वीट्स और आज के समय
में कान्हा स्वीट्स इस मिठाई को एक अलग पहचान देने में सफल हुए हैं। सादा और
केसरिया- दो फ्लेवर में मिलने वाला कलाकंद आपने जब तक नहीं चखा तब तक आप आप इसकी
खासियत से अनभिज्ञ ही रहेगें और आपको यह इल्म नहीं होगा कि आपने क्या खोया है।
अभ्रक नगरी का आज का कटु सत्य
कहते हैं सुख-दुख जीवन में लगा रहता है। वक़्त ने करवट बदला और झुमरी-तिलैया
की खुशियों को भी ग्रहण लगा जब 1980 में वन (संरक्षण) अधिनियम कोडरमा सुरक्षित वन
क्षेत्र में लागू हुआ। इस अधिनियम ने कोडरमा सुरक्षित वन क्षेत्र में अभ्रक खनन पर
रोक लगा दिया। खनन पट्टों के नवीनीकरण होने बंद हो गए और ज्यों-ज्यों पट्टे की
अवधि समाप्त होती गई त्यों-त्यों एक-एक कर माइंस बंद होते चले गए। अभ्रक का खनन कम
होते-होते बंद ही हो गया। एक समय ऐसा भी
आया जब एक भी माइंस कार्यरत नहीं रहा। कुछ खदान जो वन-क्षेत्र से बाहर थे वे भी इंडियन
ब्यूरो ऑफ माइंस और अन्य सरकारी दफ्तरों यथा डाइरेक्टर जनरल माइंस सेफ़्टी, ब्यूरो ऑफ माइंस सेफ़्टी, राजकीय खनन एवं भूतत्व विभाग, ज़िला वन अधिकारी, ज़िला खनन कार्यालय, आदि के बदलते मानकों का सख़्ती
से पालन ना कर पाने की वजह से बंद हो गए। एक व्यक्तिगत उदाहरण से इसे समझ सकते
हैं। वन (संरक्षण) अधिनियम ने यह व्यवस्था दी कि सुरक्षित वन क्षेत्र की सुरक्षा
की ज़िम्मेदारी सम्बद्ध माइंस मालिक का होगा- यानि यदि वन क्षेत्र में कटी हुई लकड़ी
अथवा जलावन की लकड़ियाँ पकड़ी गई तो इसकी जवाबदेही माइंस मालिक की होती थी। बहुधा
फॉरेस्ट गार्ड को देखकर आदिवासी अथवा ग्रामीण महिलाएं तो भाग जाते थे, किन्तु अदालत में केस माइंस
मालिक पर चलता था। एक समय पापा पर ऐसे 17 केस दर्ज़ हो रखे थे जिसका निबटारा बाद
में ‘सेटिंग’ कर किया गया। बढ़ते सरकारी हस्तक्षेप और नियम कानून एवं
कदम-कदम पर सरकारी अमले से ‘सेटिंग’ करने की जहमत ने खदान मालिकों
का कमर तोड़ कर रख दिया। सोने की मुर्गी से थोड़ा-थोड़ा कर सोने का अंडा लेने की जगह
मुर्गी की गर्दन ही मरोड़ डाली गई। नतीजा यह हुआ कि कुछ कंपनियाँ तो बंद हो गयी, कुछ यहाँ से चली गयी और कुछ
अन्य व्यापार में संलग्न हो गई। बहुत कम ऐसे माइनर रहे जो इन विषम परिस्थितियों
में भी खनन के काम में लगे रहें। कोडरमा
ज़िला के आधिकारिक सरकारी वैबसाइट पर जाएँ तो आज की तारीख में केवल दो ही फ़र्म का
उल्लेख है जो अभ्रक खनन के काम में लगे हैं। डीलर का तो जिक्र भी नहीं है। इसी
प्रकार माईका के साथ पाये जाने वाले अन्य खनिजों में क्वार्ट्ज़, फेल्सपार, आदि के खनन में भी मात्र एक ही
फ़र्म कार्यरत है।
अभ्रक खनन में अपने हाथ जलाने के बाद बिहार सरकार ने खनन से अपने हाथ खींच
लिए थे किन्तु संसाधित (processed) अभ्रक के व्यापार और निर्यात में अपना दखल देने की
गरज से सरकार द्वारा 1973 में माईका ट्रेडिंग कार्पोरेशन (मिटको) की स्थापना की गई।
प्रत्येक डीलर के लिए यह अनिवार्य किया गया कि वे संसाधित अभ्रक की ट्रेडिंग और
निर्यात मिटको के माध्यम से ही करेंगें। सरकार को यह अंदेशा था कि निजी कंपनियाँ
सरकार की करों की चोरी कर रही हैं। सरकारी हस्तक्षेप ने भ्रष्टाचार के भी दरवाजे खोले।
ऐसा कई बार हुआ जब सरकारी बाबू की मदद से डीलर निम्न कोटी के अभ्रक को उच्च कोटी
में पास करवा कर बेचने में सफल रहे। किन्तु इसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ा जब विदेश
से कितने ही शिपमेंट वापस आ गए। सरकार के राजस्व को जबर्दस्त नुकसान हुआ किन्तु
किसी भी सरकारी कर्मचारी को दोषी करार नहीं किया गया। आज मिटको बंद पड़ी है। 1991
के बाद न तो ए.जी.एम. की बैठक हुई है और न ही कंपनी द्वारा तुलन-पत्र
(बैलेन्स-शीट) ही तैयार किया गया है। धीरे-धीरे डीलर के शटर भी गिरने लगे। बीसवीं
सदी के अंतिम दशक में अभ्रक-नगरी झुमरी-तिलैया में अभ्रक खनन, व्यापार और निर्यात का चमकता
सूर्य अस्त हो गया।
विकास का पहिया केवल थम जाता तब भी ठीक था। किन्तु थमने के बाद विकास का
पहिया इस क़स्बे में विपरीत दिशा में उल्टा घूमना शुरू किया। पचास से अस्सी के दशक
में अभ्रक के साथ मिट्टी में सने अभ्रक के छोटे-छोटे टुकड़े जिसे ‘ढिबरा’ कहते थे और जो किसी भी मानक
आकार से छोटे होते थे को उत्खनन के समय मिट्टी के साथ यों ही छोड़ दिया जाता था
क्योंकि उस दौर में इनका कोई मूल्य नहीं था। आज अभ्रक के इन्हीं छोटे-छोटे टुकड़ों को
बीनने के काम में गरीब बच्चे लगे हैं। इंटरनेट पर आपको ऐसे सैकड़ों लेख और रिपोर्ट
मिल जाएगें जिसमें ढिबरा चुनने के काम में लगे बच्चों का जिक्र है। एक वक़्त था जब
यहाँ के बच्चे भी सामान्य बच्चों की तरह स्कूल जाया करते थे। किन्तु अब विकास के
उलटे घूमते पहिये के नीचे इन बच्चों का बचपन कुचला पड़ा है। एक आंकड़े के अनुसार
चौदह वर्ष के कम उम्र के बाईस हज़ार बच्चे वर्तमान में इस काम में लगे हैं- यानि
उतने ही बच्चे जितने कभी यहाँ चल रहे खदानों में मजदूर रोजगार पाते थे। बहुधा चाल
ढह जाने से इन बच्चों की मृत्यु तक हो जाती है। किन्तु इसकी परवाह ना तो ये बच्चे
करते हैं और न ही इन बच्चों की परवाह प्रशासन करता है। यदि करता होता तो इंटरनेट
पर इतनी सूचना होने के बावजूद ये मासूम बच्चे किसी भी सूरत में इस काम में संलग्न न
रहने।
इन बच्चों द्वारा चुने गए ढिबरा को साफ-सुथरा कर प्रोसेसिंग प्लांट में
माईका पाउडर बनाया जाता है जिसे विदेशों में निर्यात किया जाता है जहां इसका उपयोग
कार पेंट और कॉस्मेटिक्स इंडस्ट्री में लिप-स्टिक एवं अन्य सौंदर्य प्रसाधन को
चमकीला बनाने में होता है। कॉस्मेटिक इंडस्ट्री में माईका का रासायनिक नाम ‘पॉटेश्यम एल्युमिनियम सिलिकेट (CI 77019) है और इस रसायन के नाम
पर अभ्रक पाउडर का इस्तेमाल प्रसाधन उद्योग में धड़ल्ले से हो रहा है। लश, लो-रियल, जर्मन फर्मास्यूटिकल कंपनी मर्क, फिलिप्स, एच. एंड एम. चनेल, बी.ए.एस.एफ. आदि ऐसी कई
कंपनियाँ हैं जो इस बात का प्रमाण तो लेती है कि उनके द्वारा प्रयुक्त माईका पाउडर
में बाल-मजदूर नहीं लगे हैं। किन्तु यह समानान्तर व्यापार केवल कागज़ के चंद टुकड़े
पर लिए गए प्रमाण-पत्र के आधार पर धड़ल्ले से चल रहा है। इसी तरह कार में प्रयुक्त
होनेवाले मेटेल्लिक पेंट में अभ्रक का इस्तेमाल किया जाता है। इन बच्चों द्वारा
चुने गए ढिबरा से बना माईका पाउडर आज भी विदेश निर्यात हो रहे हैं। यही वजह है कि
आज की तारीख में अपने देश में जितना अभ्रक उत्पादन हो रहा है उससे अधिक इसका
निर्यात हो रहा है, जिसे पुराने स्टॉक का मानकर स्वीकार कर लिया जाता है।
किन्तु यह सोचने वाली बात है कि बीस वर्षों बाद भी क्या पुराना स्टॉक बना हुआ है? पुराने समय में माईका पाउडर का
व्यापार नहीं के बराबर होता था। इस तथाकथित ‘पुराने’ स्टॉक की दुहाई देकर अवैध तरीके से ‘खनन’ किए गए ढिबरा का निर्यात खुलकर हो रहा है।
दूसरी ओर हजारों की संख्या में अभ्रक खदानों एवं परिसंस्करण के कार्य में
लगे मजदूर जब बेरोजगार हो गए तब इन्होंने महानगरों का रुख किया। आज इंटरनेट पर जिस
‘अभ्रक खनन’ की चर्चा होती है दरअसल वो ‘ढिबरा’ है जिसे एक समय में यहाँ के
खदान मालिक वैसे ही बिसरा देते थे जैसे आज यहाँ के मजदूरों को उनके प्रांत ने
बिसरा दिया है। अभ्रक खदान बंद पड़ने के बाद बड़ी संख्या में यहाँ से मजदूरों का
पलायन हुआ जिन्हें दिल्ली, बॉम्बे और पंजाब में ठौर मिला। इसे वक़्त के उलटे चलते
पहिये का कमाल कहें अथवा व्यवस्था की असफलता का भीषण कुचक्र कि ये मजदूर ‘लोकल’ से ‘नेशनल’ तो हो गए किन्तु अपने ही देश में ‘प्रवासी’ कहलाए। आज यही ‘प्रवासी’ मजदूर सारे देश में मारे-मारे
फिर रहे हैं और इन पर जमकर राजनीति भी हो रही है। मीडिया के लिए ये स्कूप हो सकता
है किन्तु विश्व-प्रसिद्ध अभ्रक नगरी की आबरू को तार-तार होता देख अवर्णनीय दुख
होता है क्योंकि इसी क़स्बे से ही मेरी बचपन की समस्त यादें जुड़ी हैं।
जहां गरीबों का यह हाल हुआ वहीं यहाँ का व्यापारीवर्ग भी विकास के उलटे चलते
पहिये का शिकार हुआ है। एक समय माइंस ऑनर (खदान के मालिक) अथवा निर्यातक कहलाना
गर्व की बात होती थी। आज इनमें से कई माइंस ऑनर एवं निर्यातक छोटे-मोटे व्यापार कर
किसी प्रकार अपनी जीविका निर्वहन कर रहे हैं। आज भी इस क़स्बे में विदेशियों का आना
होता है किन्तु ये विदेशी एक दूसरी तरह की तिजारत में लगे हैं- ये विदेशी वस्तुतः
विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं और जर्नल के प्रैस रिपोर्टर एवं फॉटोग्राफर हैं
जो यहाँ की गरीबी का दास्तां-ए-ब्याँ कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि पाने के
इच्छुक हैं। ये विदेश से आकर यहाँ की गरीबी की तस्वीर उतारते हैं जिनकी विदेशों
में अच्छी मांग है। मई 2019 में अमेरीकन पत्रकार लेक्सी लेबसेक ने यहाँ आकर एक लेख
लिखा जिसका शीर्षक था ‘द मेकअप इंडस्ट्रीज़ डार्केस्ट सीक्रेट इज़ हाईडिंग इन
योर मेकअप बैग।’ यह लेख इंटरनेट पर उपलब्ध है जिसे 94,23,761 व्यूज़ मिल चुके हैं। इसी ‘गिद्ध प्रवृति’ से वशीभूत प्रायः सभी देसी-विदेशी
समाचार-पत्र और पत्रिकाओं के संवाददाताओं का यहाँ आना लगा रहता है। वे यहाँ आकर इन
बेबस और गरीब बच्चों की फोटो खीचते हैं और ‘सेन्सेशनल’ समाचार लिखकर नाम कमाते हैं। उन्हें इन बच्चों पर कोई
दया नहीं आती। वे इनकी कोई विशेष मदद भी नहीं करते। किसी की गरीबी की तस्वीरों का
यों सार्वजनिक प्रदर्शन कर अपनी पत्रकारिता का दुकान चमकाने से भी इन्हें गुरेज
नहीं। आज इस क़स्बे की इज्ज़त सरेआम नीलाम हो रही है और हम मूक बैठे हैं।
कुछ अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संस्थान बच्चों के लिए काम कर रही है किन्तु
यह पर्याप्त नहीं है। पेरिस की ‘रेसपोनसीबल माइका इनिसिएटिव’ का ध्येय 2021 तक ढिबरा व्यवसाय
को शिशु-मुक्त करने का है जिसे अब बढ़ा कर 2022 कर दिया गया है। नीदरलैंड की संस्था
‘टेरे डेस होम्मस इंटरनेशनल
फ़ाउंडेशन’ ने सभी डच कंपनियों से यह आग्रह किया है कि वे अपने सप्लाई-चेन को शिशु-मुक्त
करें। टॉमसन राइटर्स फ़ाउंडेशन द्वारा कराये गए एक सर्वेक्षण में भी इस अवैध धंधे
की पुष्टि की गयी है और यह बात उभर कर सामने आई कि सरकार के पास इस धंधे को बंद
कराने की कोई कारगार योजना भी नहीं है। मेरा मानना है कि इन संस्थाओं को ‘ग्राउंड ज़ीरो’ पर उतर कर काम करने की आवश्यकता
है। इन विदेशी गैर सरकारी संस्थाओं से जुड़ी ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ केवल सहायता
राशि देकर अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। इसे इस अवैध व्यापार में लगे
बच्चों से प्राप्त माईका पाउडर का इन कंपनियों द्वारा जाने-अंजाने इस्तमाल के एवज़ में
रिश्वत कह सकते हैं कोई वाजिब मुआवजा नहीं। यदि ये विदेशी गैर-सरकारी संस्थाएं यों
ही अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटती रहीं तो फिर ऐसे अपील और सर्वेक्षण थोथे साबित
होंगें और इनका कोई प्रभावी असर नहीं होगा। दूसरी ओर एक नैतिक मुद्दा यह भी है कि इन
संस्थाओं द्वारा इस क़स्बे के गरीब बच्चों और उनके लाचार माता-पिता के फोटो अपने
वैबसाइट पर डालने से क्या प्रयोजन सिद्ध होता है? क्या इन गरीब और मज़लूम बच्चों की मदद ऐसे फोटो
वैबसाइट पर डाले बिना नहीं की जा सकती? क्या यह जरूरी है कि हम इन्हें अपनी गरीबी का नुमाइश
करने दें तभी हम इनसे मदद की अपेक्षा करें? मेरी नज़र में यह केवल इस कस्बे की गरीबी की सार्वजनिक
नुमाइश है और हमें इन संस्थाओं से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।
इस समस्या को सुलझाने में अलबत्ता सरकार अवश्य सक्षम है। केवल इच्छा-शक्ति
की कमी है। जिस प्रकार सरकार ने वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 का सख्ती से पालन कर
अभ्रक खदानों को बंद करवाया उसी सख्ती से सरकार को ढिबरा उद्योग से बाल-श्रमिकों
की भागीदारी को दंडनीय अपराध घोषित कर कड़े कदम उठाने पड़ेंगें। किन्तु इसके साथ ही
साथ सरकार को इनकी शिक्षा और अन्य सुविधाओं की समुचित व्यवस्था भी करनी होगी। आज
जब सरकार ‘प्रवासी’ मजदूरों की समस्या से जूझ रही है वहाँ उसका ध्यान इस
समस्या की ओर दिलाना मुश्किल अवश्य है किन्तु असंभव नहीं। क्षेत्र के जनमत को इस
मुद्दे पर एक होकर सरकार के समक्ष अपनी बात रखनी होगी। तभी कुछ ठोस निकल कर आएगा। यह
ज़िम्मेदारी यहाँ कार्यरत कुछ देसी गैर सरकारी संस्थाएं यथा ‘कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन
फ़ाउंडेशन, चाइल्ड इन नीड इंस्टीट्यूट, रांची, सवेरा फ़ाउंडेशन, समर्पण एवं गाँव कनेक्शन आदि भी उठा सकती है। इस
क्षेत्र में छ सौ के करीब गाँव हैं जहां यह समस्या मुंह बाए खड़ी है। इतने गाँव की
समस्या का निवारण कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है।
हर शहर, क़स्बा आपसे कुछ कहता है। इसे वो ही सुन सकता है जो उस
शहर अथवा क़स्बा से भावनात्मक रूप से जुड़ा रहा हो। आज यह बेहद खूबसूरत क़स्बा
झुमरी-तिलैया अपनी टीस बयान कर रहा है जिसे सुनना और सुनकर उसका निवारण करना हर उस
बंदे की ज़िम्मेदारी है जिसने अपने जीवन के हसीन पल यहाँ की वादियों में बिताए हैं-
चाहे अब वे यहाँ बसते रहे हों अथवा नहीं।
मेरा शहर मेरा गीत
जहां झूम झूम मन गाता था: शहर अपना था , शहर झुमरी तिलैया था
अभ्रक के आयने
में,
देखता हूँ अपने शहर का अक्स
पल पल बदलता,
आज गुमनामी में खोया
फिर भी निरंतर बढ़ता
निरन्तर बदलता।
बॉम्बे की चकाचौंध से दूर
पर फ़िल्मी दुनिया के पास,
अपने फिल्म प्रेमियों से था मशहूर
शहर अपना था
शहर झुमरी तिलैया था।
रेडियो सीलोन
और विविध भारती के फरमायशी गानों
के कार्यक्रमों की जान था।
जहां झूम झूम मन गाता था,
वादियों में सरगम था, सुरताल था,
झूमने को झुमरी, लय ताल को तिलैया था।
फ़िल्मी गीतों में बसते थे कभी जहां लोगों की जान
शहर अपना था
शहर झुमरी तिलैया था।


No comments:
Post a Comment