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| नन्हें नवाब |
आज ईद है। पिछले दिनों फेसबुक पर
एक पोस्ट के जरिये जब मेरी बहन ने ईद के अवसर पर पुरानी दिल्ली की तंग-गलियों की ईद के अवसर पर व्याप्त रौनक की तस्वीरें साझा की तो मेरे
मन-मस्तिष्क पर उस क़स्बे में मनाये ईद के त्यौहार की यादें एक पार पुनः ताज़ी हो
गई।
'रमजान के पूरे तीस
रोजों के बाद ईद आयी है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव
है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है,
आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी
संसार को ईद की बधाई दे रहा है।'
-मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचना
'ईदगाह' की इन्हीं पंक्तियों को पढ़ते
हमारा बचपन बीता है। ह्रदय पर इस कहानी और इन पंक्तियों का प्रभाव इसलिए भी अधिक
था क्योंकि बचपन में उस क़स्बे में पापा के कई अभिन्न मित्र और मददगार मुस्लिम
संप्रदाय से थे जहाँ हम पापा के साथ ईद के अवसर पर जरूर जाते थे- अपने मुस्लिम
मित्रों को ईद की मुबारकबाद देने। बचपन में गले मिलकर मुबारकबाद देने का एक तय
तरीका ईद के त्यौहार से सीखा।
ईद की ख़ुशी का वर्णन करते हुए
मुंशी प्रेमचंद लिखते हैं 'किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी
दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन
ईद की खुशी उनके हिस्से की चीज है।'- इसी तर्ज़ पर बचपन में
मैंने पापा को हर वर्ष जुमा अलविदा का रोज़ा करते अवश्य देखा है। पूरे साल में ऐसे
दो ही अवसर होते थे जब वे उपवास रखते थे- एक शिवरात्रि पर और दूसरा जुमा-अलविदा का
रोज़ा। सेहरी तो नहीं करते थे किन्तु इफ्तार में सामुदायिक रूप से भाग लेते थे-
नमाज़ी टोपी पहने बिना। कहने का मतलब यह कि जुमा अलविदा का रोज़ा और इफ्तार उनके लिए
एक राजनैतिक दिखावा नहीं वरन एक आस्था का विषय था और वे उसी आस्था से जुमा अलविदा
का रोज़ा रखते थे जिस आस्था से वे शिवरात्रि के अवसर पर उपवास रखते थे अपने इष्टदेव
शिव को प्रसन्न करने के लिए। इन यादों को और कुरेदता हूँ तो पाता हूँ प्रातः न उठने वाले पापा को प्रत्येक रविवार सुबह चर्च में होनेवाले मास
के लिए संत जोसफ स्कूल के हमारे टीचर्स को स्वयं जीप चलाकर चर्च ले जाते हुए। इसी
प्रकार इकतीस अक्टूबर चौरासी को इंदिरा गाँधी की निधन के दूसरे दिन उस क़स्बे
(झुमरी-तिलैया) की सडकों पर मैंने उन्हें शांति-मार्च करते हुए भी देखा है। उन्हें
सबका साथ प्राप्त था क्योंकि मेरा मानना है कि उनपर सबों का विश्वास था। यह साथ और
यह विश्वास उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा था उनका जीवन दर्शन था। यह उनकी सहज
जीवन शैली थी जो अनायास उनके व्यक्तित्व में समाया था। इसके लिए उन्हें कभी
अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ा क्योंकि यही साथ और विश्वास ही उनके व्यक्तित्व का
सच था आज की तरह कोई स्वार्थगत मुखौटा नहीं। 'वसुदेव
कुटुम्बकम' के यही संस्कारगत बीज उन्होंने बचपन में हमारे
कोमल मन-मस्तिष्क में भी बोये जो आज एक विशाल वट-वृक्ष का रूप ले चुका है। यही वजह
थी कि जहाँ रामनवमी के अवसर पर महावीरी झंडा के जुलूस का समापन हमारे घर के सामने
के मैदान में होता, वहीं मुहर्रम के ताज़िये का जुलूस भी हमारे
घर पर प्रदर्शन के बाद ही बगल में संत जोसफ स्कूल के पीछे बने कर्बला पर जाकर
तिरोहित होता था। यह स्वीकार करने में आज मुझे जरा भी गुरेज़ नहीं है कि बचपन में
पापा द्वारा पढ़ाये 'सेक्युलरिज़्म' के
इस व्यवाहरिक पाठ पर मुझे आज भी गर्व है।
मिल के होती थी कभी ईद भी दिवाली भी
अब ये हालात हैं कि डर-डर के गले मिलते हैं।
बहरहाल सियासी ‘सेक्युलरिज़्म’ को परे रखते हुए हम वापस ईद का
त्यौहार मनाने के तौर-तरीको पर आते हैं। यह वह अवसर होता था जब हम पापा के साथ
क़स्बे के चंद गणमान्य मुस्लिम घरों में ईद-मुबारक देने जाते थे -हाकिम साहब और
रमजान अली शाह कुछ ऐसे ही घर थे। पापा के गया वाले साथी नौशाद अली ईद के अवसर पर
कुछ न कुछ सौगात अवश्य भेजते थे। इसी तरह हज़ारीबाग के हाफ़िज़ुर रहमान, जो कुछ समय स्थानीय विधायक भी रहे, के दौलतखाने से
भी ईद का न्योता अवश्य आता था। ईद के अवसर पर हम इन घरों में जाते और तमाम लज़ीज़
व्यंजनों का लुत्फ़ उठाते- बिरयानी, केसर पुलाव, कोरमा, गोश्त, कबाब, शीर खुरमा और न जाने क्या-क्या। अंत में मीठी सेवइयां पाते जो हमें विशेष
प्रिय थी।
पापा क़स्बे के अपने समस्त मुस्लिम
अंसारों (मददगारों) को इस अवसर पर 'ईदी' अवश्य देते - जीप मैकेनिक शीराज़ मिस्त्री, जीप
ड्राइवर चिमटू, टिप-टॉप टेलर मास्टर मल्लन मियां, मुर्गी बेचने वाले ज़ीनत मियां, गोश्त बेचने वाले
इजराइल मियां और नईम मियां, सब्ज़ी और फल बेचने वाले खटीक
बादल मियां, रिक्शा वाला शेख राशिद, बचपन
में कितनी ही बार अपने हाथों की करतब से हमारे मोच को ठीक करने वाले शेख दिलावर
खान आदि आदि। इतने वर्षों बाद आज के हालातों को देखते हुए कभी-कभी जेहन में ये
सवाल उठता है कि क्या यह महज़ इत्तेफ़ाक़ था कि ये सभी शख्स मुस्लिम संप्रदाय से थे।
आज मुझे यह इत्तेफ़ाक़ नहीं लगता। सबको साथ लेकर चलना उनका जीवन-दर्शन था जिसका
प्रत्यक्ष प्रमाण था वो छोटा सा क़स्बा जहाँ अपने जीवन-काल में सबको साथ लेकर चलने
में वे खासे सफल भी रहे।
ये अपनी यादें मैंने संभाली हैं,
जैसे ईदी हो मेरे बचपन की।

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