![]() |
| आम का बहार फोटो सौजन्य: श्वेता मेहता |
मौसम
करवट ले चुका है और गर्मी ने दस्तक दे दी है। यह मौसम है फलों के राजा आम का जिसका
हमें सदा बेसब्री से इंतज़ार रहा करता था। हममें
से ऐसे बहुत कम शरीफ़ रहे होंगें जिसने अपने बचपन में
परिवार के नाम और यश को ताख
पर रखकर आस-पास के बागान से चोरी कर कच्चे आम
नहीं खाये हों।
कम से कम मैं तो उन शरीफ़ बच्चों में से तो नहीं ही था। गर्मियों में स्कूल में
बारह बजे ही छुट्टी की घंटी बज जाती थी। गांधी स्कूल से घर आते हुए रास्ते में
पी.डब्लू.डी. के ऑफिस के पीछे का दीवार पड़ता था जिसके समानान्तर चलते हुए हम बाई-पास के पास मुख्य सड़क पर
आते थे। पीछे के इसी दीवार के अंदर
एक ओर था इन्सपैक्शन बंग्ला और दूसरी ओर था आम का बागान। बचपन से मैं ही
जरा स्थूल शरीर का था किन्तु मेरा छोटा भाई और दो –तीन अन्य मित्र बहुत चपल और
चंचल थे। बुट्टन या बूटना कद में था तो छोटा किन्तु था इतना चपल कि जब तक अन्य
साथी दीवार फांदने के उपक्रम ही कर
रहे होते तब तक वो पी.डब्लू.डी. की सात-आठ फीट ऊंची दीवार फांद जाता और पेड़
पर चढ़ पलक झपकते टीकोले (कच्चे आम) तोड़ कर दीवार की दूसरी ओर फेंकना शुरू कर देता।
दीवार की दूसरी ओर मेरा काम इनके
फेंके टीकोले चुनने और एक नज़र माली पर भी रखने का
था। माली के देखते ही हम रफू-चक्कर हो जाते। वो बूढ़ा माली डंडे लेकर दीवार तक आता
और ऊंचे स्वर में हमें भद्दी-भद्दी गालियां देता। हम भी जवाब देने में और उसे चिढ़ाने से नहीं चूकते, ‘बूढ़ा झामलाल पान खाये दाँत लाल, बीड़ी पिये आंत लाल’। जेनेरेशन नैक्सट क्या यह सोच भी सकती है और बतौर अभिभावक
क्या हम अपने बच्चों को ऐसी खुराफात अंजाम देने की छूट दे भी सकते हैं?
आम
को फलों का राजा कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है। एक यही फल है जो इतने नैसर्गिक स्वाद और खुशबू में विधमान हैं कि
सबों का स्वाद ले पाना तो शायद एक
जन्म में संभव ना हो- मौसम की शुरुआत बिजुवा
से होता था। इसकी छोटी गुठली और
भरपूर रस इसकी खासियत थी। सैकड़े के हिसाब से यह बेचा जाता था और बिना गिनती के इसे
खाया जाता था। बाल्टी में पानी कर इसे उसमें डाल दीजिये ऊपर का रस चुआ कर बाकी रस
का आनंद उठाइए। इसके बाद बाज़ार में बंबइया उतरता था जिसका स्वाद एकदम भिन्न हुआ करता था। इसी प्रकार कलकत्ता का
हिमसागर, लखनऊ का दशहरी, मालदा
का लंगड़ा, दीघा का दूधिया मालदा, सफेदा, सीपिया, गुलाबखास, आम्रपाली, चौसा, तोतापुरी, केसर और
कितने ही भिन्न-भिन्न प्रकार के आम-हर एक के रस की मिठास और गूदे का स्वाद एकदम
फर्क। अलफाँसो (हाफुस) के बारे में तो केवल सुना ही करते थे।
इस मौसम में माँ प्रत्येक वर्ष आम का अचार जरूर डालती और उसकी बड़ी हिफाजत करती।
ऐसे वैसे हाथों से अचार के बुयाम (बर्नी) को छूना मना रहता था। वर्षों का संचा
अचार एकदम ताज़ा बनाए रखती थी। अचार जितना ही पुराना होता वो उतना ही स्वादिष्ट
होता जाता। ज्यादा पके आमों का अमावट लगाती थी। इन सभी व्यंजनों का लाभ यह था कि
आम का मौसम जाने के बाद भी आम का मजा मिलता रहता था। कच्चे आम का ही गुडम्मा (गुड
में कच्चे आम को पका कर तैयार किया गया व्यंजन) बनाती थी। जब दिल नहीं चाहता तो
रोटी साथ गुडम्मा खाकर डिनर हो जाता था। दूध रोटी में आम कुच कर खाइये- जैसा द्वारकाधीश
को माता यशोदा उनके बचपन में खिलाती थी- ऐसा शाही भोजन कोई दूसरा न होगा।
पड़ोस में प्रिन्सिपल साहब रमाशंकर वाजपेईजी का घर था जिनके यहाँ आम का बागान
था। प्रत्येक वर्ष चाची नौकर के मार्फत टोकड़े में करके बागान
के रसीले आम हमारे घर अवश्य
भिजवाती। महानगरों में ऐसे सम्बन्धों
और सुविधाओं के बारे में तो केवल कल्पना ही कर सकते हैं। बाद में पापा ने बड़े शौक
से पीछे बागान में बाउंडरी से लगाकर आम के कुछ पेड़ लगाए जिनकी वो खूब तीमारदारी भी
करते थे – ‘वो कहा करते थे पेड़
पिछली पीढ़ी लगाती है और उसका फल अगली पीढ़ी पाती है- हर पीढ़ी को अपनी अगली पीढ़ी के
लिए कुछ ना कुछ करके ही धरती से रुखसत होना जाना चाहिए- जीवन की यही रीत है’- जीवन का यह मूल-मंत्र मैंने उनसे ही सीखा।

No comments:
Post a Comment