Sunday, 15 November 2020

जीवन के रंग- अपनों के संग: दसे दशहरा, बीसे दिवाली, छये छठ (14/11/2020)






बचपन में मां से अक्सर सुना करता था-
'दसे दशहरा, बीसे दिवाली छ्ये छठ'- दस दिन दशहरा का त्यौहार मनाने के ठीक बीस दिन बाद दिवाली आती है और दिवाली के छह दिन बाद छठ का पावन पर्व। दिवाली से छठ के बीच वर्ष में यह एक ऐसा समय होता है जब हम प्रत्येक दिन कोई न कोई पर्व मना रहे होते हैं- धनतेरस, छोटी दिवाली, दिवाली, बुढ़िया दिवाली, गोवर्धन पूजा, भाई-दूज, चित्रगुप्त पूजा, नहाए-खाये, खरना, संध्या अर्घ्य और अंत में प्रातः अर्घ्य के बाद ही त्योहारों का यह सिलसिला थोड़ा रुक कर - फिर कुछ दिन बाद गोशाला पूजा के साथ ही समाप्त होता है। हर त्यौहार से यादें जुडी हैं- मीठी ही मीठी खट्टी कुछ भी नहीं। इन वर्षों में इन त्योहारों को मनाने के तरीके में परिवर्तन हुए हैं- कुछ बेहतर के लिए, कुछ मात्र औपचारिकता निभाए चले जाने की गरज़ से, तो कुछ बदतरी की ओर! 

दुर्गापूजा के बाद से ही दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाती थी। घर की साफ़-सफाई का काम जो दुर्गापूजा के बाद शुरू होता वह दीपावली आने तक चलता रहता। पूरे घर में रंग-रोगन किया जाता और बारिश के दौरान घर के टूटे मुंडेरों, छज्जे एवं परकोटे आदि की भी मरम्मत की जाती। दोपहर वक़्त जब राज मिस्त्री और कुली को माँ खोराकी देती और वे खाना खाने पास के ढाबे में चले जाते तब हम उनकी गैर-उपस्थिति में वहां पड़ी कूची ले पुताई में लग जाते  पर यह सफाई कार्यक्रम घर तक ही सीमित नहीं रहता था। घर के पीछे बने गोहाल जो गायों और बैलों का स्थान था उसके खपरैल की भी मरम्मति की जाती थी और चौपायों के खुरों से टूटे फर्श को समतल किया जाता था। घर के चारो ओर के  बाउंड्री वाल की भी पुताई की जाती थी। घर के सामने के लॉन की भी सफाई होती और बेजरूरत घास-पतवार हटाकर क्यारियों में मौसमी फूलों के पौधों को लगाया जाता। प्रत्येक क्यारी के रख-रखाव की ज़िम्मेदारी एक-एक बच्चे का होता और प्रत्येक शाम हम अपनी-अपनी क्यारियों में पटवन करते। फूलों की इन क्यारियों और लॉन को अलग करती तिरछे पंक्तिबद्ध ईटों को हम लाल रंग से रंगते।

दीपावली के दिन तक रंग-रोगन का कार्य समाप्त हो जाता था और राज-मिस्त्री और अन्य मजुरागण अपना-अपना बक्शीश लेकर विदा होते। मगर विदा होने से पहले राज-मिस्त्री के हिस्से घर के आँगन में गीली मिटटी और ईटों को जोड़कर छोटा सा घरौंदा बनाने की भी ज़िम्मेदारी होती थी जिसे वे सहर्ष अंजाम देते थे। इसके रंग-रोगन का काम हम बच्चों के जिम्मे होता था। दिवाली के दिन लक्ष्मी-गणेश की पहली पूजा इसी घरौंदे में होता था।

इसके बाद माँ घर के सजावट में लग जाती। दिवाली के दिन घर के गेट पर केले के थम्भ लगाए जाते और छोटा सा तोरण द्वार बनाया जाता था जिसे बाजार के खरीद कर लाये गए कागज़ के रंग-बिरंगे झालरों से सजा दिया जाता था। नारियल की रस्सी एवं रंग-बिंरंगे कागज़ों से बना बंदनवार से घर के सामने के हिस्से को सजाया जाता। हमारे छोटे मामू एक सप्ताह पहले से ही बांस की खपच्चियों से कंदील तैयार करने में लगे होते थे जिसे रंग-बिरंगी पारदर्शी सेलोफेन पेपर से सजाया जाता और उसके अंदर एक बल्ब लगा दिया जाता था जिसके प्रकाशित होने से उसके रंग-बिरंगे प्रकाश से एक अलग ही समां बंध जाता था।

दिवाली से एक सप्ताह पहले ही रविवार को उस क़स्बे में लगने वाले साप्ताहिक बाजार-हाट से माँ दिवाली की अन्य सामग्रियों की खरीदारी किया करती थी- मिटटी के दीये, लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति, कुलिया-चुकिया, तीसी और सरसों के तेल, शुद्ध घी, दिए की बाती बनाने के लिए रुई,लावे और भुंजे आदि आदि। कुलिया-चुकिया मिटटी के उन छोटे-छोटे बर्तनों को कहा जाता था जिसका वास्तविक स्वरुप हर रसोई में उपलब्ध रहता है। हम बच्चों के जिम्मे माँ यह काम छोड़ती कि हम दीयों को पानी खिलाये ताकि वो ज्यादा तेल ना सोख ले। नारायण पंडितजी से पूछ कर माँ पूजा के शुभ मुहूर्त के बारे में पता करती थी और पंडितजी से पूजा सामग्री लिखवा कर पूजा की तैयारी भी शुरू कर देती थी।

दिवाली से दो दिन पहले धनतेरस के अवसर पर माँ रसोई में प्रयुक्त होने वाला कोई न कोई नया बर्तन खरीदती। कभी-कभी कोई आभूषण अथवा चांदी के सिक्के की भी खरीदारी करती थी। ऐसी खरीदारी हर घर में गृहणियां करती हैं और इसका स्वरुप आज भी नहीं बदला है। दिल्ली जैसे महानगरी में तो यह सम्पन्नता का प्रतीक त्यौहार है। छोटी दिवाली के दिन एक पुराने सूप पर पुराना दीया प्रज्वलित कर माँ घर के प्रत्येक कमरे यहाँ तक कि गोहाल घर में भी दिखाती और कहती जाती 'लक्ष्मी आये दरिद्रा जाए' फिर यम के इस दीये को घर के बाहर कुएं के जगत पर इस प्रकार रख आती कि इसकी लौ दक्षिणमुखी रहे।

दिवाली के दिन सुबह से ही माँ दिवाली के विविध व्यंजन तैयार करने में लग जाती थी। पापा ने घर पर ही गाय पाल रखा था। अतः दूध की कोई कमी नहीं थी। इस अवसर पर दूध के विभिन्न मिष्टान माँ स्वयं बनाती। खीर, दूध को ओट कर निकाले गए खोये के गुलाब जामुन और छेने की मिठाइयां और रसगुल्ले। अंत में बेसन के लड्डू और सूजी का हलवा। जहाँ तक मुझे याद है मिठाई के नाम पर बचपन में केवल जलेबी ही यदा-कदा बाजार से खरीदकर हमलोगों ने खाये होंगें, अन्यथा मिठाई के लिए हमने कभी बाजार का रुख नहीं किया। या फिर कभी बिरले जब घर पर यदि गाय न रही तभी बाजार से मिठाई खरीदा जाता था।

दिवाली की शाम से माँ दीयों में तीसी के तेल और बाती डालकर दीये तैयार करती और हम बच्चे इन्हें घर के बाउंड्री वाल और मुंडेरों पर सजाते जाते। फिर घी के दीयों की बारी आती जिसे हम घर के प्रत्येक कमरे में रखते जाते, यहाँ तक कि गोहाल और पंप-रूम में भी एक-एक दीया रखा जाता था। छुटकी, जो बहनों में सबसे छोटी थी और सबों की सबसे दुलारी थी, को पशुओं से विशेष प्रेम था। इस दिन हमारे घर के विश्वसनीय सेवक बिशुनधारी की मदद से वो गायों और बैलों को नहवा कर साफ़-सुथरा करवाती और उनके सींघों और खुरों की सरसों के तेल से मालिश करती थी जिससे वे चमक उठते थे। फिर इन पशुओं के गले में एक-एक घंटी और माला और मस्तक पर सिंदूर से टीका लगा इनका श्रृंगार पूरा करती - ऐसा लगता था ये पशु भी पर्व मनाने की पूरी तैयारी में हों जैसे।

सूर्यास्त के साथ ही दीयों को प्रज्वलित करने का काम होता। सारा घर जगमगा उठता था और इसके साथ ही जगमगा उठता था संपूर्ण वातावरण क्योंकि तक़रीबन यही समय होता था जब आस-पास के सभी घर दीयों के प्रकाश से जगमगा उठते थे। मुझे तो कभी-कभी लगता है कि ये दीये समाजवाद के सच्चे प्रतीक थे क्योंकि अमीर हो अथवा गरीब उन दिनों सभी लोग दीये से ही अपने-अपने घरों को प्रकाशमान करते थे। आज तो दीयों का चलन भी नहीं रहा। तब हमें दीयों की रौशनी का आनंद उठाने के लिए सिर उठाने की नौबत नहीं पड़ती थी जैसा अब बहुमंजिली अट्टालिकाओं की रौशनी देखने के लिए करनी होती है। तब सभी घर एक ही सतह पर होते थे। समाज का पैर धरती पर सुदृढ़ता से जमा था और सम्पन्नता में भी विनम्रता का भाव तारी होता था। तब समाज की तासीर ही ऐसी थी कि दिखावा कम था और सौहार्द अधिक। तब समाज के विभिन्न तबकों के बीच का अंतर इतना विशाल नहीं था जैसा अब है। लक्ष्मी-गणेश का आशीर्वाद प्रत्येक घर को इनायत थी। यह परिलक्षित होता था लोगों में संतोष की भावना को देखकर जो यह सुनिश्चित करते थे कि किसी की भी दिवाली हर्षोउल्लास के साथ मनाये बिना न बीते। लक्ष्मी-गणेश के आगमन को केवल धन की कसौटी पर कस कर नहीं आँका जाता था वरन यह सुख और शांति का प्रतीकात्मक पर्व था। इस सुख और शांति में जो ऐश्वर्य विधमान होता था वह धन के अति-संग्रह में नहीं। आज समाज में जिस प्रकार अति धन संग्रह का प्रचलन बढ़ गया है वही समाज में सर्वत्र फैले असंतोष और भ्रष्टाचार का कारक है- ऐसा मेरा व्यक्तिगत विचार है। करोड़पतियों की संख्या में वृद्धि हुई है, अमीर और गरीब के बीच की पाट चौड़ी हुई है और पर्वों को मनाने में सादगी का स्थान दिखावा ने ले लिया है।

बहरहाल मुख्य विषय पर पुनः आते हैं। दीये जल जाने के बाद इसके बाद घरौंदा पूजा होता था। घरौंदे को भी घी के दीयों से जगमगाया जाता और उसमें लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति को स्थापित किया जाता था। फिर घरौंदा लिखने का काम भी होता था। आँगन में जहाँ घरौंदा बनता था वहां की दीवार पर लक्ष्मी-गणेश की जयलिखने के बाद उसके नीचे समस्त भाई-बहनों के नाम लिखे जाते- कुल 32 नाम को लिखकर सूची पूरी होती थी। इन 32 नामों में हमारे पूजनीय पितामह के सारे पौत्र एवं पौत्रियों के नाम शामिल होते। नाम लिखने की यह परंपरा क्यों पड़ी इससे मैं वाकिफ नहीं हूँ पर यह किया जाता था। फिर तीनों बहनें लक्ष्मी-गणेश की पूजा करती, कुलिया-चुकिया भरती और पूजा की समाप्ति पर हम प्रसाद पाते। कुलिया-चुकिया भरने से तात्पर्य इसे खील बतासे लावे और भुंजे से भरना होता था।

दिवाली का वर्णन बिना पटाखे पूरा नहीं होता। पर इससे पहले घर पर पूजा के बाद पापा के साथ हम सभी बच्चे जीप से उस क़स्बे का एक चक्कर लगाते थे और क़स्बे की रौशनी का मजा लेते थे। किसी-किसी सहयोगी व्यापारियों के प्रतिष्ठानों पर भी पापा के साथ ही जाना होता जहाँ एक दूसरे को दिवाली की शुभकामनाएं दी जाती। इसी समय पापा से जिद्द कर हम पटाखे खरीदवाते। हालाँकि हमारे बुजुर्गों का मानना था कि पटाखे खरीदना पैसे में आग लगाने के समान था और पैसे का इससे बेहतर दुरूपयोग और कुछ नहीं हो सकता। पर हम बच्चों का मन रखने के पापा कुछ पटाखे रस्मी तौर पर अवश्य खरीद कर हमें देते थे और फिर घर वापस आ जाते। फिर ऊ-डेरा (बगल वाला घरजो हमारे 'ताऊजीजिन्हें हम ‘बाउजी’ कहते थेका था) बाबूजी और बड़ी माँ से मिलने और उनका आशीर्वाद लेने जाते। घर पर हम अपने हिस्से के पटाखे धीरे-धीरे छोड़ते इस इंतज़ार में कि दूसरों के पटाखे पहले ख़त्म हो जाए। यह क्रम तब तक चलता जब तक कि माँ हम सबों को खाना खाने की हाँक नहीं लगाती। रात दस्तरखान में पनीर की सब्जी से लेकर मौसमी सब्जियां होती जो घर के पीछे के खेत की होती थी। इसका लाजवाब स्वाद अब भी मन-मस्तिष्क पर तारी है। दिवाली ही वह अवसर होता था जब घर के पीछे के खेत के मेढ़ों की भी साफ़-सफाई होती थी जिसे गोहट काटना कहते थे। सर्दियाँ अपने आने की दस्तक दे देती थी और सर्दियों में उगाये जाने वाली मौसमी सब्जियों से बागान खिल-खिल जाता था। छठ आते-आते ललका आलू, रूई के फाहे से सफ़ेद गोभी, मीठे मटर-छिम्मी, खुशबूदार मेथी और धनिया और चटक स्वाद वाले टमाटर से शाकाहारी खाने की लज्जत कई गुना बढ़ जाती थी। वो स्वाद आज सब्जियों में मयस्सर नहीं जो खाने की ललक को बढ़ा देती थी। दिल्ली में हम आज आर्गेनिक फार्म उत्पादों के बारे में सुनते हैं पर उस दौर में सब्जियों में आज की आर्गेनिक सब्जियों से अधिक स्वाद था।

दिवाली की दूसरी सुबह हम सुबह-सवेरे उठ कर लॉन में ऐसे पटाखे ढूंढते थे जो पिछली रात फूटने से रह गए थे। ओस से भीगी घास पर पड़े ऐसे पटाखे भी भीग जाते थे जिन्हें हम सारे दिन धूप दिखाकर ठीक करते थे। बूढी दिवाली पर हम इन्हीं बचे पटाखे को छोड़ते थे।

  


1 comment:

  1. बचपन से ही सैनिक स्कूल और फिर फ़ौज में जाने के करण बहुत ख़ुशियों से अनभिज्ञ रह गया लेकिन कुछ झिलमिल यादें हैं।
    पढ़कर दिल आनंदित एवम् पुलकित हुआ। कुछ खोया कुछ पाया।
    तुम्हारी लेखनी सदेव हृदय के मर्म को छू जाती है।
    हमारी शुभ कामना है की ये कलम सदेव चलती रहे।

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