Saturday, 29 August 2020

जीवन के रंग- अपनों के संग- कहाँ गई वे बाल-पत्रिकाएं

 







इन दिनों कोरोना ने उन दिनों की यादें ताज़ा कर दी है जब हम युवा थे और हमारे शौक जुदा थे। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, मोबाइल और इंटरनेट के इस दौर में समाज में पढ़ने की प्रवृति में कमी आई हैइसका स्पष्ट प्रमाण है कि जहाँ आज हर चौक-चौबारे पर मॉल और पिज़्ज़ा बर्गर की दुकानें मिल जाती हैं वहां किताब की दुकान के लिए आपको कदाचित मीलों चलना पड़ जाएदिल्ली के रोहिणी क्षेत्र में केवल एक ही दुकानदार है जो फुटपाथ पर अपनी दूकान लगाता हैकिताबों और पत्रिकाओं को बेचने से ज्यादा उसका धंधा इन्हें उधार पर पढ़ने देने से चलता हैएक-चौथाई मूल्य पर वो नॉवेल उधार पर तीन से चार दिनों के लिए देता हैऐसे चार ग्राहक मिल जाए तो किताब का मूल्य निकल आता हैखरीद कर पढ़ने की प्रवृति में निश्चय ही कमी आई है और व्यक्तिगत लाइब्रेरी तो अब बीते जमाने की बात हो गई है

पढ़ने के प्रति उदासीनता की एक दूसरी वजह भी हैआजकल हर साहित्यिक कृति को छोटे परदे पर उतारा जा चुका हैकिसी भी भाषा में शायद ही ऐसी कोई साहित्यिक कृति होगी जिस पर आधारित टेली-सीरियल बनने से रह गए हों! बच्चों में जे. के. रोलिंग की सात शृंखला में लिखी हैरी पॉटर काफी प्रचलित हैकिन्तु इन सातों ही पुस्तकों पर फिल्में बन गई है और यह काफी लोकप्रिय भी हैभारतीय तिलिस्म की समस्त कहानियों यथा वैताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी आदि पर दूरदर्शन धारावाहिक बना चुका हैअस्सी और नब्बे के दशकों में ये काफी लोकप्रिय भी रहींजब सब कुछ देखने को मिल जाता है तब पढ़ने का क्या लाभ? किन्तु मेरी समझ से यह सोच गलत हैजब हम इन कहानियों को दादी अथवा नानी से सुनते थे अथवा स्वयं पढ़ते थे तो हमारी कल्पनाशक्ति हमें ऐसे मायावी संसार में ले जाता था जिसकी समस्त बारीकियों को हम स्वयं बुनते थेकिसी निर्देशक की सोच हमारी सोच नहीं बन पाती थीं जैसा आजकल हो रहा हैयह कल्पनाशक्ति ही हमारी मेधा को बढ़ाने में सहायक होता हैकिन्तु एकल परिवार व्यवस्था और प्रिंट मीडिया की कमी एक ऐसी रिक्तता स्थापित कर रहा है जो निश्चय ही बालमन के लिए सही नहीं हैआज के दौर में मुंशी प्रेमचंद अथवा सत्यजीत रे की लिखी कहानियां शायद ही कोई बच्चा पढ़ता होबाल-पत्रिकाओं की संख्या में भी भारी कमी आई हैकईं तो बाजार से गायब ही हो गईं हैंजब टेलीविज़न ने हमारे जीवन में इतनी पैठ नहीं बनाया था तब आम-मानस पत्रिका और उपन्यास पढ़ा करता थाटाइम्स ग्रुप का 'पराग', हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप का 'नंदन', दिल्ली प्रेस का 'चम्पक, चक्रपाणि एवं बी नागि रेड्डी का 'चंदामामा, और बंगाल का 'सन्देश' काफी लोकप्रिय बाल-पत्रिकाएं थींअफ़सोस आज 'चम्पक' एवं 'नंदन' को छोड़ सारी बाल-पत्रिकाएं अतीत का हिस्सा बन कर रह गई हैं1947 से लगातार छपने वाला 'चंदामामा' ने 2013 में दम तोड़ दियाइसी प्रकार साठ के दशक में शुरू हुई बाल-पत्रिका 'पराग' का संपादन एक समय हिंदी भाषा के वरिष्ठ लेखकों यथा सर्वेश्रवर दयाल सक्सेना, कन्हैयालाल नंदन, हरेकृष्ण देवसरे आदि ने किया थाकिन्तु यह पत्रिका एक दशक बाद ही बंद हो गईइसी प्रकार सत्यजीत रे के संपादन में सुप्रसिद्ध बंगाली पत्रिका 'सन्देश' के हिंदी संस्करण का भी प्रकाशन अब बंद हो चुका हैइसके अलावे 'दीवाना', ‘लोट-पोट’ आदि कुछ अन्य बाल-पत्रिकाएं थीं जो काफी दिनों तक प्रकाशित होती रहीं और फिर बंद पड़ गईंहम खुशनसीब थे कि हम उस दौर में पले-बढे जब बालपन में हमें इन सभी बाल-पत्रिकाओं को पढ़ने का सौभाग्य मिलाचित्र-कथा (कार्टून पुस्तकों) की बात करें तो 'अमर चित्र कथा', 'चाचा चौधरी, 'बिल्लू और बबली' के अलावे आर्चिज एवं टिनटिन के कार्टून के अलावे इंद्रजाल कॉमिक्स से प्रकाशित होने वाला 'फैंटम' एवं 'मैनड्रैक' शृंखला की कॉमिक पत्रिकाएं पढ़ते हुए जाने कितनी ही पीढ़ियां बचपन से युवावस्था में प्रवेश की होगीइसी प्रकार उन दिनों मेरठ 'बाल पॉकेट बुक्स' का गढ़ हुआ करता थान केवल जासूसी उपन्यास वरन सामान्य बाल उपन्यास भी उन दिनों खासा लोकप्रिय थाप्रायः सभी जासूसी उपन्यासों में युवाओं की जोड़ी होती थीं जो मुश्किल से मुश्किल केस को चटपट हल कर देती थीएस. सी. बेदी सृजित ‘राजन-इक़बाल’ हो अथवा, ‘रंगा-गंगा’ सीरीज- ये जासूसी उपन्यास अपने समय में खासे लोकप्रिय थेबचपन में यह कल्पना कर रोमांच हो आता था कि हम भी किसी भूतहा कोठी के रहस्य को सुलझा रहे हैंअंग्रेजी में एनिड ब्लायटन की जासूसी उपन्यास काफी लोकप्रिय थींयही हाल मिल्स एंड बून की रूमानी उपन्यासों का था

इन सभी बाल-पत्रिकाओं को खरीद कर पढ़ने के लिए जितने पैसे की आवश्यकता थी बचपन में वो बहुधा हमारे पास नहीं हुआ करता थाबिरले ही कभी रुपये दो रुपये पापा से मिल जाया करते थेइस स्थिति से निपटने के लिए हम मित्रों ने एक लाइब्रेरी खोलने का निर्णय लिया ताकि हर कोई इस लाइब्रेरी में अपनी जेब-खर्च से पुस्तक खरीदकर योगदान देता रहे जिसे सभी साझा रूप में पढ़ पाएसामाजिक सहभगिता से यह हम बच्चों का पहला सरोकार थावो पत्रिकाएं जो अब तक किसी एक की 'संपत्ति' हुआ करती थी अब सार्वजनिक 'संपत्ति' थी, जिसका लाभ हर सदस्य उठा सकता थाअपनी निजी चीज़ें (किताबें और पत्रिकाएं), चाहे वे कितनी ही कम मूल्य की क्यों न रहीं हों, को अपने मित्रों से साझा करने के लिए जिस विवेक की आवश्यकता होती है उसके अंकुर इस लाइब्रेरी से ही पड़े  देवी मंडप रोड में इस लाइब्रेरी के ऑफिस का विधिवत उद्घाटन भी हुआ और इसे 'ओरिएंट लाइब्रेरी' नाम दिया गयाहमने इस लाइब्रेरी के मेंबर बनाये जिनके मेम्बरशिप फी से हम इस लाइब्रेरी को और अधिक समृद्ध करते गएआज भी मुझे लगता है हर प्रकाशन समूह को बच्चों के लिए एक बाल-पत्रिका अवश्य प्रकाशित करनी चाहिएसमाज के प्रति इन प्रकाशन समूह की यह कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी होनी चाहिए और इसे सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए

 

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