Friday, 6 March 2020

जीवन के रंग- अपनों के संग- किंसुक, गुलाब, कचनार औ अनारन की डारन पै डोलत अंगारन के पुंज हैं-होली आयो रे!(10/03/2020)




ऑफिस आते जाते आजकल दिल्ली जैसे महानगर में भी पलास के लाल फूल दिख जाते हैं। ये बरबस झारखण्ड की याद दिला जाते हैं। होली के समय समस्त झारखण्ड पलास के लाल फूलों से पट जाता है- किंसुक (पलास), गुलाब, कचनार औ अनारन की डारन पै डोलत अंगारन के पुंज हैं- अनायास तुलसी रचित उत्तरकाल की ये पंक्तियाँ स्मरण हो आती हैं। 

कक्षा एक से सात तक हिंदी विषय की परीक्षा के प्रश्न-पत्र में जब भी 'मेरा प्रिय त्यौहार' पर निबंध लिखने को दिया गया तब त्यौहार के तौर पर होली को ही प्रिय त्यौहार के लिए चुना। होली पर निबंध लिखने के लिए पर्याप्त जानकारी बचपन से थी- बिना कुछ पढ़े। भक्त प्रह्लाद और होलिका दहन से शुरू कर भक्त प्रह्लाद पर हिरण्यकशिपु के अत्याचार और नरसिम्हा अवतार तक की सारी कहानी मुँहजबानी याद थी। समस्त जानकारी अनायास जेहन में आते चले जाते और हम फटाफट निबंध वाले प्रश्न को निबटा देते थे।

यह भी हकीकत है कि बचपन में होली के रंग में डूबने से पूर्व यदि इससे दहशत होती थी तो एक बार रंग जाने के बाद पिचकारी हाथों से छूटती नहीं थी। पहले पीतल की पिचकारियां आती थीं जो साल-दर-साल काम में आता था। फिर प्लास्टिक की पिचकारियां आने लगी। एक समय ऐसा भी आया जब पिचकारियों को छोड़ बाल्टी में रंग घोल कर लोगों को रंगों से सराबोर करने में अधिक मजा आने लग गया। यह इस बात का प्रतीक था कि हमने अपना बचपन पीछे छोड़ दिया था और अब हम किशोरावस्था में प्रवेश कर चुके थे। कुछ और वर्ष बीत गए जब हमने लोगों को पिचकारी अथवा बाल्टी से रंग में सराबोर करने के बजाय डीजल के 210 लीटर के डीजल ड्रमों में घुले रंग में डुबोया करने लगे। यह प्रतीक था कि अब हम किशोरावस्था को छोड़ व्यस्क हो चुके थे। अब वो समय आ गया है जब होली के हुड़दंग से दहशत होती है। कौन रंग छुड़ाने की जहमत करे। इससे बेहतर तो साफ़-सुथरे ही सही- यह प्रौढ़ावस्था का परिचायक है।

होली एक ऐसा पर्व है जिसमें किसी देवी अथवा देवता की पूजा नहीं की जाती और न ही कोई व्रत आदि रखा जाता है। चूँकि इस त्यौहार में पूजा और व्रत का कोई रिवाज़ नहीं होता, अतः इसमें शुद्धता, सुचिता एवं वैष्णवता का भी ध्यान नहीं रखा जाता। होली उन्मुक्तता का पर्व है। 'बुरा ना मानो होली है- इस वाक्य से सभी परिचित होंगें। यानि होली में कोई किसी का बुरा नहीं मानता। इसी वजह से होली हुल्लड़बाजी का पर्याय भी बन गया है। किन्तु बुरा न मानते हुए जब हम परस्पर भलाई की सोचते हैं तब दुश्मनी एवं बैर के भाव तिरोहित हो जाते हैं। लोगों का सारा वैमनस्य, रंग और गुलाल में घुल जाता है। परस्पर संबंधों को पुख्ता बनाती है होली। नए संबंध स्थापित करने वाला त्यौहार है होली। यह अवश्य कह सकते हैं कि वक़्त के साथ होली की इस परिभाषा में भी परिवर्तन हुए हैं तथापि अभिवावकों से बचपन में हमने होली से यही सबक सीखा।

होली की पूर्व-संध्या पर होलिका दहन के लिए बचपन में हम विशेष तैयारी करते। इस दिन न केवल आस-पास की झाड़ी-झुड़ी काट कर हम होलिका-दहन के स्थान पर जमा कर होलिका-दहन की तैयारी करते वरन दूसरे दिन होली के लिए रंग की भी तैयारी करते। यह वह समय होता है जब झारखण्ड में चहुंओर किंसुक (पलास ) खिल उठते हैं। 'फ्लेम ऑफ़ फारेस्ट' (जंगल की अग्नि) से धरती लाल हो उठती है। सुबह-सवेरे इसके फूल को चुन कर पानी में छोड़ देने पर दूसरे दिन सुबह जो गाढ़ा सिंदुरिया रंग तैयार होता वह बाजार में बिकने वाले किसी भी रंग से बेहतर था। यह रंग होली खेलने के काम आता था। यह रंग एकदम प्राकृतिक था। नौकरी के सिलसिले में जब भारतीय लाह अनुसन्धान संस्थान में काम करने का मौका मिला तब वहां भी इसी पलाश के फूल से बने अबीर से होली खेलना हुआ। 

बचपन में होली सदा सामुदायिक रूप से मनाया जाता था और न केवल रंग-गुलाल खेलने में वरन खान-पान भी सामुदायिक सहभागिता रहती थी। ऐसा देखा गया है कि पहाड़ी इलाकों में विशेष उत्सवों के मौके पर मांसाहार सामान्य है। झारखण्ड में होली 'शिकार-भात' (मटन चावल) के बिना अधूरी है। झारखण्ड में होली खाने-खिलाने और पीने-पिलाने का पर्व है। एकाएक स्थानीय मध 'हड़िया' की मांग भी इस समय बढ़ जाती है। झारखण्ड में यह स्थानीय संस्कृति एवं परंपरा से जुड़ा है। उन्मुक्त जीवन शैली झारखण्ड की आदिवासी जीवन का परंपरागत भाव है और यही उन्मुक्तता यहाँ होली के समय देखी जा सकती है- किन्तु इस उन्मुक्तता में अश्लीलता का कोई स्थान नहीं है। झारखण्ड का आदिवासी समाज खुला है -यहाँ युवाओं को पर्याप्त स्वतंत्रता मिली हुई है किन्तु आदिवासी समाज में कभी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं होता।

घर पर खान-पान में कहीं कोई बंधन नहीं था - 'शिकार-भात' (मटन चावल) होली के खानपान का सबसे महत्वपूर्ण आइटम हुआ करता था। इसके साथ ही हरे चने का बचका, झारखण्ड का विशेष धुस्का, चावल का छिलका, दही-बड़ा आदि होली के विशेष व्यंजन हुआ करते थे। पापा की दरियादिली इस पर्व पर कुछ ज्यादा ही देखने को मिलती थी। होली के अवसर पर वे उस क़स्बे के तमाम मित्रों को भोज का न्योता देते। इस अवसर पर मटन-पूड़ी और विभिन्न ब्रांड के मधपान की कमी नहीं रहती। यही वजह थी कि इस अवसर पर क़स्बे के सभी लोगों का घर पर आना-जाना लगा रहता। माँ दोपहर तक रसोई में जुटी रहती और नौकर दस्तरख्वान बिछाते रहते।


'बुरा न मानो होली है' ठीक तो है किन्तु जब इस 'ब्रह्म' वाक्य का दुरूपयोग होता है तब होली हुड़दंग में तब्दील हो जाती है। हुल्लड़बाजों को हुल्लड़बाजी करने का मानो लाइसेंस मिल जाता है। स्त्री चाहे वो साली हो अथवा भाभी- अपने जीजू अथवा पति के भाइयों से सावधान ही रहती है- कब कौन किस बहाने मर्यादाओं की सीमा लांघ जाए कहा नहीं जा सकता। जहाँ अन्य पर्व त्योहारों में साफ़-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है वहां होली मनाने के बाद सारा घर होली के रंग से यों अस्त-व्यस्त हो जाता था जैसे घर में बिगड़ैल सांढ़ घुस आया हो। इसे सँवारने में माँ को पुनः लगना पड़ता था। इस त्यौहार से बचपन में मेरी कोफ़्त की वजह यही थी।


 शाम हम सभी बुजुर्गों के चरण-कमल पर अबीर डाल कर आशीर्वाद लेते। बुजुर्ग-गण हमारे चेहरे पर अबीर लगा कर आशीर्वाद देते। ख़ुशी-ख़ुशी हम एक नए हिन्दू वर्ष (सम्वत) का आह्वाहन करते। इनमें से कितनी ही बातें अतीत के गर्भ में समां चुकी हैं। दिल्ली में आज बच्चों को होली के अवसर पर पानी के गुब्बारे फेंकता देखता हूँ तो यह मान लेता हूँ कि यही पीढ़ी का अंतर है जो समाज में क्रमश: आये बदलाव का सूचक है।





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