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| Saraswati Puja Organized by 'Lonely Hearts Club' in 1976 |
विद्यार्थी जीवन में यदि
किसी देवी के आशीर्वाद की आकांक्षा सबसे अधिक रहती थी तो वो देवी सरस्वती ही थी। यद्पि हमारी शिक्षा एक कान्वेंट स्कूल में हुई तथापि बचपन में
सरस्वती पूजा के प्रति हम सबों का उल्लास सबसे अधिक रहा करता था।
संत जोसफ कान्वेंट स्कूल में सरस्वती पूजा के अवसर पर अवकाश रहता था। किन्तु इस कमी की भारपाई हम घर पर ही सरस्वती पूजा मना कर कर लिया
करते थे। पूजा से तक़रीबन एक माह पहले नवीन भैया द्वारा 'लोनली
हार्ट्स क्लब' के सभी सदस्यों की एक मीटिंग बुलाई जाती जिसमें सरस्वती पूजा मनाने से
सम्बंधित सभी पहलुओं पर वृहत विचार किया जाता था। 'लोनली हार्ट्स
क्लब' नवीन भैया के दिमाग की उपज थी। आस-पड़ोस के एक दर्ज़न
बच्चे इस क्लब के सम्मानित सदस्य थे। नाटकों का आयोजन, पिकनिक
मनाना, स्वतंत्रता दिवस, गाँधी जयंती एवं गणतंत्र दिवस पर विशेष आयोजन आदि इस क्लब
की सामान्य गतिविधियां थी। क्लब की मीटिंग गेराज में होते
जिसे 'ग्रीन रूम' का नाम दिया गया था। सरस्वती पूजा की मीटिंग
में चंदा से उगाही जाने वाली संभावित कलेक्शन पर वृहत चर्चा होती।
इस संभावित कलेक्शन के आधार पर पूजा के खर्चे का अनुमान लगाया जाता कि कितने
की मूर्ति लेनी होगी, कितने रुपये मंच की सजावट में लगेंगें, कितने का प्रसाद बनना
है और कितनी राशि इमरजेंसी फण्ड में रखनी है। भारत सरकार के
वित्त विभाग में काम करते हुए जब आजकल फिस्कल डेफिसिट की बातें सुनता हूँ तो बरबस उन
दिनों की यादें ताज़ा हो जाती हैं जब अपनी बजटिंग और खर्चे इतने चाक-चौबंद होते कि क्या
मजाल कहीं कोई कमी रह जाए। मीटिंग के बाद हर सदस्य की जिम्मेवारी
नियत कर दी जाती थी। किसे मूर्ति निर्माण की मॉनिटरिंग करनी
है, किसे मंच सजावट के सामान की खरीदारी और सज्जा करनी है और किसे प्रसाद के लिए फल
आदि खरीदना है- यह पहले से तय कर लिया जाता था। 'लोनली हार्ट्स
क्लब' में मैं, मेरी छोटी बहन और भाई की हैसियत 'दूध-भता' यानि जूनियर सदस्य की थी। हमें कोई बड़ी जिम्मेवारी नहीं दी जाती वरन हर समिति में सीनियर
की मदद को लगा दिया जाता था। पूजा के अवसर पर बुंदिया प्रायः
माँ बना देती जिससे हमारे खर्चे में कुछ कटौती हो जाती थी। इसी
प्रकार विसर्जन के लिए पारिवारिक व्यवसाय के किसी एक ट्रक से मूर्ति लेकर हम जवाहर
घाट जाते। इस प्रकार विसर्जन के खर्चे में भी हम कटौती करने
में सफल रहते थे। सबसे पहले चंदे की रसीद बुक का आर्डर दे
दिया जाता था ताकि चंदा उगाही के लिए अधिक से अधिक वक़्त मिल सके।
हालाँकि चंदे की अधिकतम राशि हमें उन पंद्रह या बीस ट्रकों से मिलती थी जो हमारे
वृहत पारिवारिक व्यापार में चलते थे। बाकी की राशि शहर के
चंद गणमान्य लोगों से मिलती थी जो पिताजी का सम्मान करते हुए हमें कभी निराश नहीं करते
थे और अच्छी राशि बतौर चंदा दे देते थे। पूजा का आयोजन अपने
ही घर पर सामने बरामदे में किया जाता। पूजा के दिन हम अपनी
कॉपी-किताबें सरस्वती देवी की मूर्ति के समक्ष रखते और प्रातः पंडितजी को बुला कर पूजा
संपन्न कराया जाता। हम बच्चे बड़ी लगन और विधि-विधान पूर्वक,
पंडितजी के निर्देशों का अक्षरश पालन करते हुए देवी सरस्वती की पूजा करते और देवी से
परीक्षा में हम पर अपनी कृपा बनाये रखने की चिरौरी करते। संध्या
आरती होती और फिर उस दिन के कार्यक्रम संपन्न हो जाते। संध्या
समय सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता और दर्शक होते क्लब के सदस्यों के अभिभावक। उस दिन माँ अच्छे-अच्छे पकवान बनाती। पूजा
के प्रसाद के बाद इस अवसर पर बने विशेष पकवानों से हम सब बच्चों का दिन बन जाता था। क्लब के सीनियर सदस्य रात्रि देवी सरस्वती के सामने ही बिताते। दूसरे दिन प्रातः पुनः पूजा और आरती के साथ विसर्जन की तैयारी
शुरू हो जाती। देवी सरस्वती के जयकारे के साथ सीनियर मेम्बरान
ट्रक पर मूर्ति को रख विसर्जन को जाते। हम जूनियर सदस्य 'बिना-पानी
की जय' के साथ देवी सरस्वती को विदा करते। बचपन में तो यह
भी नहीं पता था कि 'बिना पानी' का क्या तात्पर्य था। यह तो
बाद में पता चला कि यह वास्तव में 'वीणा-पाणी की जय' था जिसे हम नासमझ 'बिना-पानी’
कहते चहकते फिरते थे।

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